तकनीक के सहारे तोड़ रहे संक्रमण की चेन

भारत के आरोग्य सेतु एप की तरह दुनिया के देशों में आधुनिक तकनीक पर आधारित ऐसे ही एप कोरोना के खिलाफ लड़ाई में कारगर हथियार साबित हो रहे हैं। इस दिशा में लगातार काम चल रहा है।

By: shailendra tiwari

Updated: 24 Jun 2020, 04:30 PM IST

- योगेश कुमार गोयल, टिप्पणीकार

विश्व भर में कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए विभिन्न देशों द्वारा अलग-अलग तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों में आधुनिक टैकनॉलॉजी का इस्तेमाल करते हुए कई देशों की सरकारों द्वारा विभिन्न मोबाइल एप के द्वारा करोड़ों लोगों की पल-पल ट्रैकिंग किया जाना भी प्रमुख रूप से शामिल है। विश्व बैंक की दक्षिण आर्थिक केन्द्रित रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि कोरोना के प्रसार की निगरानी के लिए डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है तथा बड़े पैमाने पर आबादी को शिक्षित करने और संक्रमण को ट्रेस करने में ये तकनीकें मददगार हो सकती हैं। भारत में कोरोना पर नियंत्रण पाने के लिए जहां ‘आरोग्य सेतु एप’ का इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं दुनिया के कई अन्य देश भी ऐसी ही अलग-अलग तकनीकों के सहारे कोरोना पर लगाम कसने के प्रयासों में जी-जान से जुटे हैं। सिंगापुर तथा ताइवान में सार्वजनिक स्थानों पर मोबाइल एप तथा क्यूआर स्कैन कोड के जरिये नए आगंतुकों की सतत निगरानी की जा रही है जबकि चीन के कई शहरों में हेल्थ कोड सिस्टम का प्रयोग किया जा रहा है, जिसमें कलर कोड के माध्यम से कोरोना संक्रमण के खतरे के स्तर का पता लगाया जाता है।


आधुनिक तकनीकों पर आधारित इस तरह के एप कोरोना के खिलाफ लड़ाई में कारगर हथियार साबित हो रहे हैं। जिस प्रकार कोरोना संक्रमण का पता लगाने के लिए भारत में आरोग्य सेतु एप को इस्तेमाल किया जा रहा है, उसी प्रकार चीन सरकार द्वारा ‘हैल्थ कोड’ को प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य किया गया है। उसके उपयोग के लिए मोबाइल फोन में मौजूद क्यूआर कोड का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके जरिये लोगों की ट्रैवल हिस्ट्री तथा स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में जानकारी जुटाई जाती है। क्यूआर कोड को बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट पर, किसी ऑफिस में जाने से पहले स्कैन करना होता है। एप से कनेक्ट होने वाला यही क्यूआर कोड ही प्रत्येक चीनी नागरिक को हेल्थ कार्ड के रूप में दिया जाता है। यह हेल्थ कोड प्राप्त करने के लिए लोगों को अपना नाम, पासपोर्ट नंबर, राष्ट्रीय पहचान नंबर, फोन नंबर, पिछले कुछ दिनों में कोरोना संक्रमितों से सम्पर्क इत्यादि कुछ महत्वपूर्ण निजी जानकारियाँ साझा करनी पड़ती हैं और अपनी पिछली यात्राओं का विवरण देना होता है। सुखद संकेत यह हैं कि चीन सहित कुछ देशों में तकनीक के सहारे कोरोना पर नियंत्रण पाने के इस तरह के प्रयास काफी हद तक सफल भी हो रहे हैं।
चीन ने भले ही पूरी दुनिया को ऐसे मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां कोरोना जैसी महामारी के समक्ष बड़े से बड़े शूरमा भी हांफ रहे हैं लेकिन अपने देश में कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए उसने अपनी ही तकनीकों के सहारे सफलता पाई है।

वहां दो एप सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहे हैं वी चैट तथा एलीपे। इन्हीं का उपयोग उसने कोरोना संक्रमण का विस्तार रोकने में किया। हेल्थ कोड स्कैनिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हुए उसने ऐसी मोबाइल ट्रैकिंग प्रणाली विकसित की, जिसके जरिये वहां कोरोना की चेन को तोड़ा गया और अभी भी कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए वहां इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। कोरोना पर नियंत्रण पाने के बावजूद वहां अभी भी लोगों की प्रत्येक गति विधि उनके मोबाइल की स्क्रीन पर दिखने वाले रंगों से ही तय होती है। जिसके मोबाइल में इस एप में हरा रंग रहता है, वहां उसे कुछ भी करने की छूट है लेकिन अगर स्क्रीन पर यह रंग लाल नजर आता है तो ऐसे व्यक्ति की तमाम गतिविधियों पर तुरंत अंकुश लग जाता है और मेडिकल टीम उसे जांच के लिए अस्पताल ले जाती है, जहां उसे 14 दिन क्वारंटीन में रखा जाना अनिवार्य है। अगर एप में पीला रंग रहता है तो ऐसे व्यक्ति के लिए सात दिन की क्वारंटीन अवधि अनिवार्य है।

प्रत्येक व्यक्ति के शरीर के तापमान और उसकी ट्रैवल हिस्ट्री के आधार पर ही उसे एक कलर कोड दिया जाता है, जिससे तय होता है कि उस पर कोई प्रतिबंध लागू होंगे या नहीं। लोग कहां आए या गए और क्वारंटीन के दौरान प्रतिदिन उनकी स्थिति कैसी रही, उसके अनुसार ही एप पर कलर कोड जनरेट होता है। यह कलर कोड प्रांतीय सरकारों के पास पहुंचता है। चीन में मोबाइल पेमेंट के लिए विख्यात ‘अलीपे’ के अनुसार चीन के 200 शहरों में लोग इस एप का इस्तेमाल कर रहे हैं।


हांगकांग में चीन से आने वाले लोगों की लोकेशन पर नजर रखने के लिए व्हाट्सअप का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए लोगों को एयरपोर्ट पर ही निर्देश दे दिए जाते हैं कि वे अपनी लोकेशन सेटिंग को सदैव ऑन रखें। क्वारंटीन में रखे जाने पर ऐसे लोगों के घर से बाहर निकलते ही प्रशासन को तुरंत सूचना मिल जाती है। अमेरिका तो इस समय कोरोना की सबसे बड़ी मार झेल रहा है, इसलिए वहां भी अधिकांश अमेरिकी कोरोना से बचने के लिए विभिन्न एप की मदद ले रहे हैं। वहां कोरोना के लक्षणों की पहचान करने वाले एप को लोगों द्वारा बड़ी संख्या में डाउनलोड किया जा चुका है।

विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक यह सर्वाधिक डाउनलोड की जाने वाली एप की लिस्ट में भी शामिल हो चुकी है। ऐसी एप के बारे में एप बनाने वालों का मनाना है कि इससे लोगों को पता चलेगा कि कुछ लोगों में कोरोना संक्रमित होने की ज्यादा संभावना क्यों होती है। इससे यह जानकारी भी मिलेगी कि किन क्षेत्रों में कोरोना ज्यादा फैला तथा आम सर्दी-जुकाम से यह कैसे अलग है।
दक्षिण कोरिया दुनिया का पहला ऐसा देश है, जिसने कोरोना से निपटने के लिए बहुत पहले ही तकनीक का सहारा लिया, जिसका उसे काफी फायदा भी मिला। उसे देखते हुए ही दुनिया के कई देशों ने इस ओर तेज गति से कदम बढ़ाए।

दक्षिण कोरिया के रोग नियंत्रण और रोकथाम केन्द्र ने एक मोबाइल एप से नियंत्रित होने वाली कोविड-19 स्मार्ट प्रबंधन प्रणाली (एसएमएस) तैयार की थी। इसके अलावा क्वारंटीन किए गए लोगों पर नजर रखने के लिए स्मार्ट रिस्टबैंड का भी इस्तेमाल किया गया है। दक्षिण कोरिया ने व्हाट्सअप जैसा ही एक ऐप बनाया है, जो किसी व्यक्ति के कोरोना संक्रमित हो जाने पर आम दिनचर्या से अलग गतिविधियां करते पाए जाने पर तुरंत अलर्ट देता है। वहां ‘कोरोना मैप’ नामक एक ऐसी एप सक्रिय है, जो प्रशासन को सूचना देती है कि कोरोना से प्रभावित व्यक्ति किन-किन लोगों से मिला और किस रूट से कहां-कहां गया। इस एप के इस्तेमाल से वहां के व्यक्ति उन स्थानों का पता कर सकते हैं, जहां कोरोना से संक्रमित कोई व्यक्ति भर्ती हुआ हो।

इसमें मरीज की लोकेशन से लेकर उसके अस्पताल की जानकारी और वो कब से पीडि़त है, ये सभी जानकारियां भी मिल जाती हैं। दक्षिण कोरिया में ‘कोरोना 100एम’ नामक जीपीएस आधारित एक और एप का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इस एप की विशेषता यह है कि यह लोगों को 100 मीटर की दूरी से ही कोरोना वायरस के बारे में अलर्ट करने में सक्षम है। यह एप उपयोगकर्ता को उसकी लोकेशन के 100 मीटर के दायरे में संक्रमित व्यक्ति की जानकारी देता है।


जर्मनी में एप्पल तथा गूगल की मदद से कोरोना संक्रमण की ट्रेसिंग की जा रही है और एप यूजर्स का डाटा उनके फोन में ही सेव करने के बाद सरकार को अपडेट दिया जा रहा है। आस्ट्रेलिया में कोरोना संक्रमितों को ट्रैक करने के लिए ब्लूटूथ के सिग्नल पर आधारित ‘कोविड सेफ’ एप इस्तेमाल हो रही है। इसके जरिये संक्रमित व्यक्ति के डेढ़ मीटर की रेंज में आने वाले सभी लोगों को ट्रैक किया जाता है। इजरायल में भी कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए एप का इस्तेमाल कर कांटैक्ट ट्रेसिंग की जा रही है और इसके लिए लोगों के मोबाइल डाटा पर नजर रखने के लिए अस्थायी कानून भी पारित कर दिया गया है।

रूस में लोगों की गतिविधियों का पता लगाने के लिए क्यूआर कोड लागू किया जा चुका है। ब्रिटेन में लंदन के किंग्स कॉलेज अस्पताल के शोधकर्ताओं द्वारा बनाया गया एप ‘सी-19 कोविड सिम्पटम्स ट्रैकर’ अलर्ट देता है कि कहां कोरोना संक्रमण का खतरा है। इसके अलावा एप के जरिये मरीज स्वयं अपने लक्षण भी बता सकता है। इसी प्रकार कोरोना संक्रमितों की ट्रेसिंग के लिए ऑस्ट्रिया में ‘स्टॉप कोरोना’ एप तथा साइप्रस में ‘कोव ट्रेसर’ एप का उपयोग किया जा रहा है।


सिंगापुर में भी कांटैक्ट ट्रेसिंग स्मार्टफोन एप के जरिये अधिकारी कोरोना मरीजों का आसानी से पता लगा सकते हैं। वहां ‘ट्रेस टूगेदर’ एप के जरिये कोरोना संक्रमितों को ट्रैक करने का प्रयास किया जा रहा है। एप के जरिये सरकार के पास उपयोगकर्ता का पूरा डाटा रहता है, जिससे आसानी से पता चल जाता है कि वह कब एप का इस्तेमाल करने वाले दूसरे उपयोगकर्ता के सम्पर्क में आया और कितनी देर तक उसके सम्पर्क में रहा। इस एप पर कोई भी व्यक्ति उन स्थानों का पता कर सकता है, जहां संक्रमण का खतरा ज्यादा है। वहां इस एप की मदद से ऐसे लोगों को ट्रैक करने में सफलता भी मिली, जो बाद में कोरोना संक्रमित पाए गए। यह एप उपयोगकर्ता की लोकेशन को ट्रैक करते हुए ब्लूटूथ से एप के दूसरे उपयोगकर्ताओं के सम्पर्क में आने का रिकॉर्ड रखता है।


कोरोना से जंग में संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए गूगल तथा एपल जैसी दुनिया की प्रख्यात टैक कम्पनियां भी मैदान मेें कूद चुकी हैं। दोनों कम्पनियों ने स्मार्टफोन के लिए एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है, जो कांटैक्ट ट्रेसिंग में मदद करने के साथ यूजर्स को भी सूचित करेगा कि वे कोविड-19 संक्रमित व्यक्तियों के सम्पर्क में आए हैं या नहीं। एपल तथा गूगल द्वारा मिलकर एक ऐसा विशेष प्लेटफॉर्म ‘एक्सपोजर नोटिफिकेशन एपीआई कांटैक्ट ट्रेसिंग’ भी लांच किया जा चुुका है, जिससे कोरोना संक्रमितों का पता लगाना आसान हो जाएगा। यह प्लेटफॉर्म ऐसे लोगों के सम्पर्क में आने वालों को चेतावनी भेजेगा। 22 देश तथा अमेरिका के कई राज्य इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने की इजाजत मांग चुके हैं।

किसी भी देश की सरकार ही अपनी एप को इस प्लेटफॉर्म से जोड़ सकती है और इसका इस्तेमाल सरकार तथा उसका स्वास्थ्य विभाग ही कर सकता है। एपल तथा गूगल का कहना है कि प्राइवेसी और सरकार द्वारा लोगों के डाटा को इस्तेमाल करने से बचाना उनकी प्राथमिकता है। दरअसल यह सिस्टम ब्लूटूथ सिग्नल के जरिये ही काम करेगा और इसमें यूजर्स की निजता भंग होने से बचाने के लिए जीपीएस लोकेशन तथा उसके डाटा के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक रहेगी। हालांकि यह केवल एक प्लेटफॉर्म है, कोई एप नहीं और इसे दुनियाभर की स्वास्थ्य एजेंसियां अपने एप के साथ जोड़ सकती हैं। एपल के सीईओ टिम कुक के मुताबिक यह तकनीक स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए कोरोना संक्रमितों की पहचान करने में मददगार साबित होगी। वैसे भारत के इलैक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अभिषेक सिंह का कहना है कि भारत का आरोग्य सेतु एप इससे कहीं ज्यादा समृद्ध है।


मैप्स की मदद से गूगल अब ऐसी व्यवस्था भी बना रहा है, जिससे यूजर्स जान सकेंगे कि किस सड़क पर अथवा बिल्डिंग में कितनी भीड़ है ताकि लोग वहां जाने को लेकर निर्णय कर सकें। सरकारें इसका उपयोग यह जानने में कर सकती हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग का सही तरीके से पालन हो रहा है या नहीं। पहले से ही दुनियाभर में करोड़ों यूजर्स की गतिविधियों को ट्रैक करती रही गूगल, फेसबुक तथा ऐसी ही कुछ जानी-मानी कम्पनियों की मदद से अब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी ‘माई हैल्थ’ नामक एक एप बना रहा है।

इस एप की मदद से डब्ल्यूएचओ बताने में सक्षम हो सकेगा कि कहां-कहां बीमारियां फैल चुकी हैं और कहां फैलने वाली हैं। बहरहाल, दुनियाभर में लाखों लोगों की जान ले चुके कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है लेकिन कई स्थानों पर इसके लिए उपयोग रही एप के जरिये डाटा और निजता की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में तकनीक के सहारे कोरोना पर प्रहार करने के लिए विभिन्न एप का इस्तेमाल करते हुए डाटा और निजता की सुरक्षा को लेकर भी तमाम सरकारों द्वारा अपेक्षित कदम उठाए जाने चाहिएं।

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