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विचारधाराओं के बीच है चुनाव, व्यक्तियों के बीच नहीं

यशवंत सिन्हा देश के राष्ट्रपति बने, तो केंद्र सरकार के रबर स्टांप तो कतई नहीं बनेंगे, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था बढ़ेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा।

Published: July 18, 2022 06:45:46 pm


श्रीनिवास
बी.वी.
अध्यक्ष, राष्ट्रीय युवक कांग्रेस

राष्ट्रपति चुनाव पार्टियों या किसी व्यक्ति विशेष के बीच नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं के बीच है। एक तरफ राजग प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू हैं, तो दूसरी तरफ संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा। यह वाकई हास्यास्पद है कि भाजपा एक तरफ राष्ट्रपति पद के लिए आदिवासी उम्मीदवार का श्रेय ले रही है, दूसरी ओर वन अधिकार अधिनियम, 2006 को खत्म कर रही है। अगर जंगल ही नहीं बचेंगे, तो आदिवासी कैसे बचेंगे? और उनके संरक्षण के लिए योजनाएं और कानून नहीं होंगे, तो रायसीना में एक आदिवासी राष्ट्रपति को प्रतिनिधित्व देने का ढकोसला क्यों? ऐसा ही कुछ वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाते समय राजग ने किया था। उन्हें दलितों का चेहरा बताया गया था, लेकिन आजाद भारत में दलितों के ऊपर सबसे ज्यादा अत्याचार पिछले 8 सालों में हुए।
दूसरी तरफ संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा एक मजबूत और निर्भीक दावेदार हंै। उन्होंने वित्त मंत्री और विदेश मंत्री के तौर पर देश का प्रतिनिधित्व किया है। वे खुलकर देश के वर्तमान हालात पर अपने विचार रखते आए हैं। खुद सिन्हा यह बात बेबाकी से कहते आए हैं कि जब सारी संवैधानिक संस्थाएं, एजेंसियों और मीडिया तक पर सवाल उठ रहे हों, तब रायसीना में किसी रबर स्टांप की नहीं, बल्कि देश के विचारों को आवाज देने वाले मजबूत राष्ट्रपति की जरूरत है। मेरा मानना है कि यशवंत सिन्हा इसके लिए सर्वथा उपयुक्त उम्मीदवार हैं; ऐसे उम्मीदवार जो पहले भारतीय जनता पार्टी में ही थे। वे भाजपा के टिकट पर सांसद बने और भाजपा नीत केंद सरकार में मंत्री भी बने, लेकिन बाद में वे तृणमूल कांगे्रस में शामिल हुए। इससे साबित होता है कि भाजपा से उसके गंभीर नेताओं का ही मोह भंग हो रहा है।
टीएमसी में शामिल होने के बाद उनको पार्टी ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। टीएमसी में शामिल होने की वजह बताते हुए सिन्हा ने जो बात कही वह विचारणीय है। उन्होंने कहा कि देश दोराहे पर खड़ा है। हम जिन मूल्यों पर भरोसा करते हैं, वे खतरे में हैं। यह कोई राजनीतिक लड़ाई नहीं है, बल्कि लोकतंत्र बचाने की लड़ाई है।
स्पष्ट है कि यशवंत सिन्हा की यही निर्भीकता संयुक्त विपक्ष को पसंद आई है। साफ है कि यदि वे देश के राष्ट्रपति बने, तो केंद्र सरकार के रबर स्टांप तो कतई नहीं बनेंगे, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था बढ़ेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा। इसका फायदा यह होगा कि केंद्र सरकार की मनमानी पर अंकुश लगेगा। राष्ट्रपति के तौर पर देश को यशवंत सिन्हा के अनुभव का बहुत फायदा मिलेगा, क्योंकि वे विदेश मंत्री के साथ देश के वित्त मंत्री भी रह चुके हैं। सबको पता है कि ये दोनों ही क्षेत्र बहुत महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं और इन क्षेत्रों से जुड़े निर्णयों में थोड़ी भी चूक देश के लिए घातक साबित हो सकती है। निश्चित रूप से राष्ट्रपति के रूप में यशवंत सिन्हा जैसी शख्सियत का चुनाव देश को विकास की ओर अग्रसर करेगा। ये चुनाव किसी पार्टी का नहीं, बल्कि देश का है। ऐसे में सांसद और विधायक देश की आवाज सुनें।
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