जैसा खावे अन्न...

अन्न का अर्थ न तो मात्र भोजन है, न ही 'कैलोरी' है। अन्न ब्रह्म है। हमारा जनक है। मन, बुद्धि, शरीर और आत्मा का सबका अपना-अपना अन्न है। सूर्य हमारा पिता है। हमारे बीज सूर्य से चलकर, वर्षा और औषधि-वनस्पतियों के माध्यम से अन्न रूप में शरीर में पहुंचते हैं। जठराग्नि में आहुत होकर शरीर का निर्माण करते हुए पुन: शुक्र-रज रूप नए बीज रूप में पैदा होते हैं। तब क्या इस अन्न को कैलोरीज में नाप सकते हैं?

Shri Gulab Kothari

19 Mar 2020, 12:26 PM IST

गुलाब कोठारी

अन्न का अर्थ न तो मात्र भोजन है, न ही 'कैलोरी' है। अन्न ब्रह्म है। हमारा जनक है। मन, बुद्धि, शरीर और आत्मा का सबका अपना-अपना अन्न है। सूर्य हमारा पिता है। हमारे बीज सूर्य से चलकर, वर्षा और औषधि-वनस्पतियों के माध्यम से अन्न रूप में शरीर में पहुंचते हैं। जठराग्नि में आहुत होकर शरीर का निर्माण करते हुए पुन: शुक्र-रज रूप नए बीज रूप में पैदा होते हैं। तब क्या इस अन्न को कैलोरीज में नाप सकते हैं?

शुक्र निर्माण के आगे और ओज एवं मन का निर्माण होता है। इनमें क्रमश अन्तरिक्ष और चन्द्रमा के तत्त्व काम आते हैं। इसी निर्माण में कर्मफलों का प्रभाव जुड़ता है। अहंकृति, प्रकृति और आकृति बनती हैं। वर्ण की उत्पत्ति होती है। अन्न की भी अहंकृति, प्रकृति (सत्व, रज, तम) एवं आकृति होती है। हर योनि का अपना अन्न है। गीता के 17 वें अध्याय (7) में कृष्ण कह रहे हैं-'आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रिय:।' अर्थात्-भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का ही प्रिय होता है। उसके यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। यह सिद्धान्त केवल मनुष्य मात्र पर लागू नहीं होते, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक लोक के प्रत्येक प्राणी पर लागू होते हैं। देवताओं के भी प्रकृति और वर्ण होते हैं, असुरों के भी अन्न इसी सिद्धान्त पर उपलब्ध होते हैं। और अन्न के साथ अन्न की यह कहावत भी लागू होती है कि-जैसा खावे अन्न, वैसो होवे मन। मन के अनुरूप ही कामना पैदा होगी और वैसे ही कर्म और फल।

अब प्रश्न उठता है कि यदि फल कोरोना वायरस जैसा है, तब अन्न का आकलन कैसे हो? हालांकि विज्ञान के कई पहलू भी सामने आए-जैसे, हर एक सौ वर्ष बाद महामारी अथवा प्राकृतिक आपदा का प्राकट्य। पृथ्वी के एक ही लांगिटï्यूड पर स्थित शहरों में सर्वाधिक जान-माल का नुकसान हुआ। दूसरी ओर तुलनात्मक आंकड़ा हमारी राज्य की सड़क दुर्घटनाओं से भी कम बहुत कम है। किन्तु भय का वातावरण इतरा गहरा गया है कि विश्व के सारे संसाधन इस ओर मुड़ गए। बड़े-बड़े मुद्दे गौण हो गए। इस भय का कारण है लोगों के शरीरों में रोग निरोधक क्षमता की अल्पता। सभी पश्चिमी देशों में एक सा वातावरण है। भले ही मृत्यु दर घटी हो, उम्र लम्बी हुई हो।

विज्ञान के आविष्कारों पर बढ़ती निर्भरता, विकसित देशों की कमजोरी बन बैठी है। शिक्षा और समृद्धि भी इनमें कारक पहलू रहे हैं। सभी विकसित देशों में अन्न का स्वरूप बदल गया है। कोई स्वयं को प्रकृति का अंग मानने को तैयार ही नहीं है। 'मैं और मेरी जिन्दगी, बस! तू कौन?' पत्ते को जैसे पता ही नहीं कोई जड़ भी है उसकी। किसी वृक्ष का अंग भी है। यह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अन्न है। पत्ता स्वयं के लिए जीएगा तो कीड़ा लग जाएगा। पीला पड़कर पेड़ से अलग हो जाएगा।

आज का शिक्षित मानव स्वयं को शरीर मानकर ही जीता है। दिमाग के लिए शरीर मनोरंजन का साधन है। बुद्धि विज्ञान की प्रतिनिधि है। सारा अन्न, शरीर का भी, हम मशीनों के माध्यम से, बासी करके, सड़ा-सड़ाकर खाते हैं। जहां हमारे यहां ताजा अथवा धारोष्ण दूध पीने की परम्परा रही है, विकसित समाज महीने भर बाद तक डेयरी का दूध पीता है। क्रीम से बना बटर, बटर ऑयल, पनीर खाता है। पाउडर मिल्क और न जाने कितने जानवरों का दूध मिलाकर पीता है। आज तो नकली, सिन्थेटिक दूध, मावा भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। गायें भी उन्नत किस्म की, जो हमारे भूगोल में स्वस्थ नहीं रह सकती, आज गौशालाओं में सज रही हैं। इसी दूध की चॉकलेट छह माह तक खाई जा सकती है। भले ही दूध का रासायनिक स्वरूप बदल गया हो। ऊपर से सिन्थेटिक प्रिजर्वेटर, बदबू को ढंकने के लिए।

आधुनिक अन्न ने तो हमारे यहां पर ही कैंसर ट्रेन चला दी। प्रत्येक जमीन का क्षेत्र अपने प्राकृतिक बीजों को ही सींच पाता है। विकसित देशों में अन्न लगभग विषाक्त ही हो जाता है। फिर दूध की तरह ब्रेड भी फ्रीज में-कितने-कितने दिन? मांस-फ्रीज में-कच्चा, कितने-कितने-दिन? क्या यह भोजन रोग निरोधक क्षमता को बढ़ा सकता है? यही हाल फलों और सब्जियों का भी है। कितने नकली रंग, बीज, दूध बढ़ाने की तरह इंजेक्शन और भी न जाने क्या-क्या। पकाने के लिए तो कार्बाइड आम बात हो गई।

नब्बे के दशक का एक वाकया है। राजस्थान में भीषण अकाल पड़ा था। केन्द्रीय अध्ययन दल दौरे पर आया। बाड़मेर-जैसलमेर सहित प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर दल जयपुर आया। यहां अखबार वालों से बात की। जांच टीम के एक सदस्य ने कान में कहा-मदद तो आपके राज्य को मनचाही मिल जाएगी लेकिन लिख कर दे सकता हूं कि, जनहानि आपके यहां बिलकुल नहीं होगी। क्यों, के उत्तर में उन्होंने कहा कि, 'वहां का आदमी जो बाजरा खाता है, वह इतनी ताकत देता है कि, उसे खाने वाले को कोई संक्रमण लग ही नहीं सकता। वह संक्रमण पर भारी पड़ेगा। संक्रमण उसे ही लगेगा जो उस खाने को भूल गए।'

ये सारे अन्न के आभूषण व्यक्ति को शरीर में धारण करने अनिवार्य हो गए हैं। बिना किसी महामारी के भी हम कैंसर के खेत खा रहे हैं। एक-दो दशक बाद यह सबसे बड़ी महामारी प्रमाणित हो जाने वाली है। इस शरीर में कहीं और कुछ भी छूट गया तो सारा विकास का किला ढह जाएगा। कोरोना आज यही कर रहा है। बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है। इतिहास गवाह है कि विश्व में बड़ी महामारियां तभी फैली हैं जब हमने उनकी गम्भीरता को समय पर नहीं समझा और लापरवाही बरतते रहे। कोरोना के प्रसार रोकने के लिए हमें युद्ध स्तर पर जुटना होगा। जरा सी चूक मानवता के लिए भारी साबित हो सकती है।

हम विकास के मार्ग पर इतना आगे निकल चुके हैं कि पिछला चौराहा कहां छूट गया, याद नहीं है। कहां से हमने यह नया रास्ता पकड़ लिया। भारत के अमीर भी विकसित दिखाई देना चाहते हैं। भारतीय नहीं दिखना चाहते। तब उस स्तर की आबादी को भी इसी ट्रेन में यात्रा करनी पड़ेगी। इस देश का मध्यम और निम्न वर्ग अभी ट्रेन से दूर है। अमीर को जागना है। धन साथ भी नहीं जाएगा और बीमारी का निमित्त बन गया तो शत्रु ही है।

भारतीय जीवन शैली मर्यादा की है। प्रकृति से सामंजस्य बनाए रखने की है। देवता-अतिथि को खिलाकर प्रसाद खाने की है। इस व्यवस्था में वायरस के घुसने की जगह नहीं है। संस्कृति और सभ्यता में यही अन्तर है। सभ्यता देश-काल के साथ बदल जाती है। संस्कृति में सम (ब्रह्म या ईश्वर) तथा कृति (प्रकृति) साथ रहते हैं। प्रकृति कितनी भी बदल जाए, जब तक ब्रह्म का अंग है, तब तक संतुलित ही रहेगी। सृष्टि का अहित संभव ही नहीं है। प्रकृति को चुनौती देना ही महामारी को निमंत्रण देना है।

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