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अस्तित्व के संघर्ष के साथ बढ़ता शरणार्थी संकट

कुछ देश शरणार्थी अथवा पलायनकर्ता को न चाहते हुए भी उनको पहले की तरह बसने में सहायता करते हैं और कुछ देश उन्हें घुसपैठिया कह कर भगाने के बारे में विचार करते हैं। कुछ देशों के विराटमना होने से मामला नहीं सुलटेगा। सभ्यताओं के टकराव के सभ्यतापूर्वक हल की गुंजाइश ही इस संतप्तता से बचा सकती है। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं ‘मुहाजिरों’ को रिहायश तो मुहैया करा सकती हैं, पर वतन की सरजमीं नहीं।

जयपुरJun 20, 2024 / 07:15 pm

Gyan Chand Patni

नवनीत शर्मा
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में अध्यापनरत
‘अपनी माटी’ की संकल्पना शायद घुमंतु जीवन के अवसान के साथ ही शुरू हुई होगी। इसी संकल्पना के विस्तारण ने अपनी गली, मोहल्ला, गांव, देस-परदेस की अवधारणाओं को जन्म दिया। बसने के लिए एक खोह या कंदरा भी घर के नाम से सुशोभित होती है और कोई घर अपने निवासियों को नहीं निकालता और यदि निकालता है तो उसे सीमांत पर ले जाकर पलायन करने को मजबूर करता है। पलायन का शब्द और संगीत दोनों ही वीभत्स भाव पैदा करते हैं। पलायन के साथ ही व्यक्ति न केवल बेघर हो निराश्रित हो जाता है, साथ ही वैयक्तिक नागरिकता खो शरणार्थी के सर्वनाम में तब्दील हो जाता है। शरणागत की रक्षा करने वालों की प्रशंसा में अनेकों वीरगाथाएं हैं पर शरणागत होना हमेशा ही एक अभिशाप रहा है। अपना और अपनों की जीवन रक्षा के लिए किया गया पलायन हमेशा रणछोड़ बनाता है, कमजोर नहीं। 
दुनिया भर में अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई हमेशा ताकत और वर्चस्व से तय हुई, जिसमें अल्पसंख्यक और हाशिये के लोग या तो हताहत हुए अथवा पलायन करने को मजबूर हुए। इस समय दुनिया भर में लगभग बारह करोड़ ‘वैध’ शरणार्थी हैं। इनमें अवैध शरणार्थियों की संख्या नहीं जोड़ी जा सकती क्योंकि उन्हें कोई नहीं गिनता, न पलायन को मजबूर करने वाला देश, न ही शरण देने वाला देश। ये शरणार्थी तो वे हैं जो राजनीतिक, धार्मिक, भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, भाषायी, नस्लीय, जातीय, रंग, यौनिकता इत्यादि चिह्नित भेदों की वजह से पलायन करते हैं। अपने ही देश में ‘परदेसी’ होने की व्यथा हम ने कोरोना काल में सड़कों पर पैदल चलते देखी है। जीवन, सुरक्षा और बेहतर कल की आस लिए सैकड़ों लोग अपने घरों से भागते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा उस पीढ़ी का है जो अभी १८ बरस की भी नहीं हुई। ये वे नाबालिग हैं जिन पर वैध वयस्क नागरिक होने से पहले ही शरणार्थी होने का ठप्पा लग जाता है। इस आबादी में बहुत-से अबोध तो देश और भूगोल के बीच अंतर भी नहीं कर पाते। १२ करोड़ विस्थापितों में लगभग ६८ प्रतिशत अपने ही देश में इस दंश से पीडि़त हैं तो लगभग चार करोड़ राष्ट्र के स्तर पर शरणार्थी हैं। ६० लाख की जनसंख्या राजनीतिक शरणार्थी के दर्जे के लिए कतार में है और ५० लाख लोग अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं।
जिस दुनिया में पूरी आबादी की तुलना में दोगुनी बंदूक की गोलियों का निर्माण और खपत हो, वहां कौन कब तक परलोक से यहां शरणार्थी है, कहा नहीं जा सकता। इन शरणार्थी-विस्थापित लोगों को घुसपैठिया करार देकर एक अलग तरह की राजनीति भी जन्म लेती है जिससे एक अलग तरह का उग्र राष्ट्रवाद पनपता है। लडऩा हमेशा पर्याय रहा है भागने का, भागना विपर्यय है और मानवजीवन की मानवरचित विद्रूपता भी। नदी की बाढ़ की चपेट से भागे हुए व्यक्ति और युद्ध की चपेट से भागे हुए व्यक्ति में एक बड़ा अंतर होता है। बाढ़ का उन्माद उतर सकता है, युद्ध और विभेदीकरण का उन्माद केवल स्वरूप बदल सकता है, मिटता नहीं है। पलायन को मजबूर व्यक्ति की खलनायक के प्रति हिंसा और नफरत पनपती है और हिंसा प्रतिहिंसा को जन्म देती है। यह खलनायक प्राय: भिन्न देश, धर्म, रंग, नस्ल, जाति, भाषा के होते हैं और पलायनकर्ता केवल उस खलनायक से ही नहीं अपितु उसकी पूरी सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ लडऩे का भाव रखता है। पलायन से अभिशप्त व्यक्ति अपनी वैयक्तिक नागरिकता की खोज में हर सामूहिक अस्मिता या पहचान का परस्पर विरोध करता है।
शरणार्थी व्यक्ति अवसाद, कुंठा, प्रतिकार इत्यादि मनोभाव लेकर नई जमीन की तलाश में होता है। धान और आदमी में शायद यही अंतर है। धान का बेहन लगता है जबकि अपनी जड़-जमीन से उखाड़ा हुआ व्यक्ति कहीं और नहीं पनप पाता, क्योंकि उसके सपनों का भूगोल उसे वह जलवायु नहीं देता जहां से वह पलायन करके निकला था। शरणार्थी बच्चों के सपने में उसके वर्तमान और उसके मां-बाप के अतीत के देश-जलवायु में फर्क होता है जो उसे कहीं का स्पष्ट सपना नहीं देखने देता। कुछ देश शरणार्थी अथवा पलायनकर्ता को न चाहते हुए भी उनको पहले की तरह बसने में सहायता करते हैं और कुछ देश उन्हें घुसपैठिया कह कर भगाने के बारे में विचार करते हैं। कुछ देशों के विराटमना होने से मामला नहीं सुलटेगा। सभ्यताओं के टकराव के सभ्यतापूर्वक हल की गुंजाइश ही इस संतप्तता से बचा सकती है। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं ‘मुहाजिरों’ को रिहायश तो मुहैया करा सकती हैं, पर वतन की सरजमीं नहीं।

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