हैदराबाद के बदले कश्मीर और पटेल की सोच

हैदराबाद के बदले कश्मीर और पटेल की सोच

Manoj Sharma | Updated: 01 Jul 2018, 05:42:27 PM (IST) विचार

फिर से चर्चा में आए कश्मीर मुद्दे पर बेस्ट सेलिंग ऑथर व वर्ल्‍ड इकोनॉमिक फोरम ग्लोबल यंग लीडर हिंडोल सेनगुप्ता का पत्रिका के लिए विशेष आलेख।

हिंडोल सेनगुप्ता
(कई पुरस्कारों से सम्मानित लेखक हैं। आठ पुस्तकें छप चुकी हैं। सरदार पटेल पर इनकी पुस्तक आने वाली है।)

 

भारत का एकीकरण सरदार वल्लभ भाई पटेल का बड़ा सपना था। उन्होंने 1946 में ही के.एम. मुंशी को लिखा था : ‘हमने देश के सामने खड़े विनाश को सफलतापूर्वक टाल दिया है। इतने बरसों में पहली बार किसी भी रूप में पाकिस्तान की संभावना को साफ शब्दों में खारिज कर दिया गया है।’ उनका इशारा किस ओर था? यहां वे 1946 में कैबिनेट मिशन के बयान की बात कर रहे थे।
यह उनकी सदिच्छा थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। तब पटेल ने अगला काम अपने हाथ में लिया- भारत गणराज्य को एक करने का काम यानी ब्रिटिश भारत को 500 से ज्यादा रियासतों के साथ मिलाना। पटेल से पहले माना जाता था कि यह काम तकरीबन नामुमकिन है।
उन्होंने 1947 तक तीन को छोड़कर तकरीबन सभी रियासतों का विलय कर डाला था- कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद। कश्मीर की आबादी मुस्लिम बहुल थी, लेकिन राजा हिंदू था। जूनागढ़ और हैदराबाद की आबादी हिंदू बहुल थी, लेकिन यहां के राजा मुस्लिम थे।
यह सच है कि सितंबर 1947 तक पटेल हैदराबाद के बदले पाकिस्तान से कश्मीर का सौदा करने के पक्ष में रहे, लेकिन इसकी वजह बहुत सहज थी- उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि अभी-अभी आजाद हुए भारत के लिए अपने बीचोबीच एक विदेशी राज्य के साथ सह-अस्तित्व में रह पाना मुश्किल होगा।
हैदराबाद में निजाम की शह पर रजाकर मिलिशिया के हाथों हिंदुओं के कत्लेआम की लगातार आ रही खबरों ने उन्हें सैन्य कार्रवाई के लिए मजबूर किया। एक और बात जिसका जिक्र शायद कभी नहीं किया जाता, वो यह है कि निजाम ने चेकोस्लोवाकिया से तीन मिलियन पौंड की लागत से हथियार खरीद का ऑर्डर दिया था। एक बहुत बड़ा नरसंहार आसन्न था। जाहिर है पटेल को ऐसे में निर्णायक होना पड़ा।
नेहरू हैदराबाद में सैन्य कार्रवाई नहीं चाहते थे। राजाजी उनके समर्थन में थे। जब भारतीय फौज ने ऑपरेशन पोलो शुरू किया, तब 13 सितंबर, 1948 को पटेल ने राजाजी से कहा, ‘मैं नहीं चाहता कि आने वाली पीढ़ियां मुझे कोसें कि जब इन लोगों के पास अवसर था, तब इन्होंने कार्रवाई नहीं की और भारत के दिल में इस नासूर को जान-बूझ कर पलने दिया। एक ओर पश्चिमी पाकिस्तान तो दूसरी ओर पूर्वी पाकिस्तान- इनका इरादा अखिल इस्लामिक राज कायम करने का है कि ये दिल्ली आकर दोबारा मुगल साम्राज्य खड़ा कर दें। एक बार हम हैदराबाद में घुस गए तो यह काम राज्य के मंत्रालय का हो जाता है। आखिर कब तक आप और पंडितजी (नेहरू) राज्यों के मंत्रालयों का अतिक्रमण करते रहेंगे?"
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस नजरिये से सहमत थे। उन्होंने कहा, एक आजाद देश अपने बीचोबीच एक विदेशी राज्य को नहीं रख सकता। हैदराबाद का विलय भारतीय संघ में होना ही होगा, बलपूर्वक या जबरदस्ती नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से। ‘पटेल इस बात को अच्छे से समझते थे कि हैदराबाद का ऐसा कोई भी इरादा नहीं था।’
इन्हीं परिस्थितियों में पटेल हैदराबाद को बचा ले जाने के लिए कश्मीर का सौदा करने को तैयार हुए। उस वक्त वे हैदराबाद को भारतीय संघ के लिए कहीं ज्यादा बड़ा खतरा मान रहे थे।
जूनागढ़ में हालांकि जो हुआ, उससे यह धारणा बदल गई। जूनागढ़ के नवाब चुपचाप पाकिस्तान के साथ जा मिले और जिन्ना ने इसे चुपचाप स्वीकार भी कर लिया। फिर नवाब अपने राज्य को अधर में छोड़कर और अपनी एक बेगम व कुछ कुत्तों को अकेला छोड़कर भाग निकले।
पटेल ने जब देखा कि जिन्ना को एक हिंदू राज्य का अधिग्रहण करने में कोई संकोच नहीं है, जबकि यह विभाजन के बुनियादी सिद्धांत के ही खिलाफ था, तब वे कश्मीर को लेकर और ज्यादा अड़ गए। उन्होंने ठान लिया कि कश्मीर की एक इंच जमीन नहीं देनी है।
बलराज कृष्ण ने पटेल पर अपनी किताब में लिखा है कि चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के प्रमुख एयर मार्शल थॉमस एम्हस्र्ट से नेहरू ने कहा था, ‘अगर सारे फैसलों का दारोमदार मेरे ही कंधों पर हो, तो मैं कश्मीर की इस छिटपुट स्थिति को पाकिस्तान के साथ खुली जंग में तब्दील कर देना बेहतर समझूंगा... एक ही बार में इस मसले को निपटा देते हैं, फिर इस महाद्वीप को एकजुट कर के चैन से रहते हैं।’ इस तरह की बात उन्होंने पहली बार नहीं की थी।
पटेल ने राजेंद्र प्रसाद को 1949 में बताया था, ‘कश्मीर का भी हल निकल गया होता, लेकिन जवाहरलाल ने सैन्य टुकड़ियों को (कश्मीर के पहले युद्ध में 1947-48 के दौरान) बारामूला से डोमेल तक जाने ही नहीं दिया। उसे उन्होंने पूंछ की ओर भेज दिया।’
एक बहस इस बात पर है कि पटेल ने कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के नेहरू के फैसले का समर्थन किया था या नहीं। नहीं, ऐसा कतई नहीं था। देखिए, पटेल 1948 के आखिरी दिनों में क्या कह रहे हैं, ‘हमने देखा है कि उस संगठन के पास जाने के चक्कर में कश्मीर में हमने क्या कीमत चुकाई है... छह माह तक पाकिस्तान के नुमाइंदों ने दुनियाभर में हमारी छीछालेदर की। और वे लोग जिन्होंने न तो कभी भारत देखा है और न ही इस समस्या को समझते हैं, वे हमारे मामले की सुनवाई करने लगे। आखिरकार उन्होंने संघर्ष विराम का प्रस्ताव रखा। हमने प्रस्ताव मान लिया, दूसरे पक्ष ने नहीं माना। इसके बावजूद हम जहां थे वहीं हैं। अगर हमें सैन्यबल के सहारे ही इसे निपटाना है और संयुक्त राष्ट्र कुछ भी कर पाने में सक्षम नहीं है तो बेहतर होगा कि सुरक्षा परिषद का नाम बदलकर असुरक्षा परिषद रख दिया जाए।’
कश्मीर के बारे में सरदार पटेल के विचारों की सच्चाई यही है। बाकी पटेल पर मेरी आगामी पुस्तक में आप पढ़ सकते हैं जिसका नाम है ‘दि मैन हू सेव्ड इंडिया’।

 

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