महामारी में अंत्येष्टि की गरिमा का सवाल

शवों का गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार का प्राथमिक कर्तव्य परिवार के सदस्यों का है। महामारी या अन्य कारणों यह जिम्मेदारी राज्य द्वारा निभाई जाती है, तो मृत व्यक्ति को लेकर धार्मिक मान्यताओं की रक्षा की जाना चाहिए।

 

By: shailendra tiwari

Updated: 24 Jul 2020, 03:42 PM IST

आर.के.विज, छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी

कोरोना संक्रमण से मौत का शिकार हुए लोगों के शवों के अंतिम संस्कार के सोशल मीडिया पर जारी कुछ वीडियो ने झकझोर दिया है। संक्रमित व्यक्तियों के शवों का निस्तारण गरिमापूर्ण किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसे मौके पर परिजन भी दूर हो जाते हैं। दरअसल, एक मृत शरीर का अंतिम संस्कार ऐसा पवित्र कार्य है जो भारतीय लोकाचार में अनादि काल से चला आ रहा है। एक मृत व्यक्ति के सम्मानजनक तरीके से, बिना विलंब किए अंतिम संस्कार करने का दायित्व समाज और मृतक दोनों का है।

कोविद -19 रोगियों के, अनिच्छित उपचार और शवों के निपटान के बारे में समाचार रिपोर्टाें पर प्रकाश डालते हुए, एक पत्र पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लिया। मद्रास उच्च न्यायालय ने भी स्थानीय लोगों की एक भीड़ द्वारा कोविद-19 से मरने वाले डाॅक्टर की अंत्येष्टि में बाधा डालने के बाद एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि दफनाने के लिए रोगग्रस्त व्यक्ति को उसके अधिकार से वंचित किया गया है। एक अन्य हालिया मामले में (मई 2020 में), बाॅम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि एक सभ्य दफनाने के अधिकार को जीवन के अधिकार के एक पहलू के रूप में मान्यता प्राप्त है और यहां तक कि ऐसी महामारी की स्थिति में भी किसी व्यक्ति से यह अधिकार नहीं छीना जा सकता है। अदालत ने कहा कि इस विषय पर कोई वैज्ञानिक शोध नहीं है कि कोरोनवायरस, संक्रमित शवों के माध्यम से फैलता है।

कोविद -19 दिशा-निर्देश
मार्च 2020 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी ‘‘कोविद -19 डेड बाॅडी मैनेजमेंट के दिशा-निर्देश’’ कहते हैं कि रिश्तेदारों द्वारा शव को देखना, और धार्मिक अनुष्ठानों जैसे धार्मिक लिपियों से पढ़ना, पवित्र पानी को छिड़कने सहित अन्य अंतिम संस्कार की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, मृत शरीर के स्पर्श, स्नान, चुंबन, गले आदि की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ‘भस्म’ कोई जोखिम को जन्म नहीं देती, इसलिये अंतिम संस्कार करने के लिए एकत्र की जा सकती है। दिशा-निर्देश यह भी स्पष्ट करते हैं कि शव को या तो रिश्तेदारों को सौंप दिया जाएगा या उसे शवगृह में ले जाया जाएगा। इसलिये, वर्णनात्मक दिशा-निर्देशों के बावजूद, शवों के साथ छेड़छाड़ करना अन्यायपूर्ण और अवैधानिक है।

डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देश इस विषय पर अधिक उदार हैं। वे कहते हैं कि मृतक को तैयार करने वाला व्यक्ति जो शव के धोने, सफाई करने या ढकने का कार्य करे उसे शरीर के संपर्क के लिए दस्ताने पहनने चाहिए। हालांकि, मृतक का चुंबन नहीं लेना चाहिए। कोविद -19 से मरने वाले लोगों को दफनाया जा सकता है या उनका अंतिम संस्कार किया जा सकता है।

भारतीय कानून-
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1923 में मृत्यु के बाद किसी व्यक्ति की वसीयत के निष्पादन का प्रावधान है। 1994 के ट्रांसप्लांटेशन आफ ह्यूमन आर्गन्स एक्ट के प्रावधानों को छोड़कर, ऐसे अधिकार किसी भी आरोपी या दोषी व्यक्ति के लिए भी बरकरार हैं। राज्य ऐसे शवों के निपटान के लिए बाध्य है जो अन्य जीवित प्राणियोें की सुरक्षा के लिए खतरनाक हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की तय मिसालें-
किसी मृत शरीर के गरिमापूर्ण निपटान का मुद्दा नया नहीं है। रामशरण (1989) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जीवन के अधिकार में वह सब शामिल होगा, जो किसी व्यक्ति के जीवन को अर्थ देता है, उसकी परंपरा, संस्कृति, विरासत और उस विरासत का संरक्षण। परमानंद कटारा (1995) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति व्यक्त की कि गरिमा और न्यायपूर्ण उपचार का अधिकार केवल एक जीवित व्यक्ति को ही नहीं बल्कि उसकी मृत्यु के बाद उसके शरीर को भी मिलता है।

समाज की भावनाओं का सम्मान-
शव की सभ्य अंत्येष्टि या दाह संस्कार धार्मिक मान्यताओं के सम्मान और अहसास को बनाए रखता है। गरिमापूर्ण निपटान करने का प्राथमिक कर्तव्य परिवार के सदस्यों का है। महामारी या अन्य कारणों से यदि यह जिम्मेदारी राज्य द्वारा निभाई जाती है, तो मृत व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं की रक्षा की जाना चाहिए। न्यायालयों ने पहले से ही संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी व्यक्ति के मृत शरीर के शवदाह या अंत्येष्टि को मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा माना है। यह ‘मानवीय गरिमा के अधिकार’ का हिस्सा है। इसलिए यह आवश्यक है कि संविधान की भावना और समाज की धार्मिक भावनाओं को सम्मानजनक तरीके से संरक्षित किया जाए।

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