भारत-नेपाल रिश्तों पर नोटबंदी की छाया

भारत-नेपाल रिश्तों पर नोटबंदी की छाया

Dilip Chaturvedi | Publish: Jan, 06 2019 02:46:05 PM (IST) विचार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के पड़ोसी राष्ट्र नेपाल के साथ रिश्तों में नजदीकियां बढ़ाने के लिए तीन बार यात्रा कर चुके हैं, लेकिन नवंबर 2016 में भारत में लागू की गई नोटबंदी समेत कई मुद्दे आपसी संबंधों में सहजता को बहाल करने में बाधा बनते रहे हैं।

शोभना जैन, वरिष्ठ पत्रकार

नोटबंदी ने पड़ोसी देश नेपाल के साथ भारत के द्विपक्षीय रिश्तों में भी उथल-पुथल मचा दी है। हाल ही नेपाल द्वारा भारत के बड़े नए नोटों को अपने यहां मान्यता नहीं दिए जाने के फैसले से दोनों देशों के संबंधों को 'सहज' किए जाने के प्रयासों को बड़ा झटका लगा है, जिसका प्रतिकूल असर द्विपक्षीय राजनयिक संबंधों के साथ-साथ पर्यटन और व्यापार पर भी पड़ेगा।

नेपाल ने हाल ही एक सरकारी आदेश के जरिए भारत के नए 2 हजार रुपए, 5 सौ रुपए और 2 सौ के नोट के चलन पर पाबंदी लगा दी है। दरअसल दो वर्ष पूर्व 8 नवंबर 2016 को भारत में सरकार ने बड़े नोटों की नोटबंदी लागू की थी। उसके बाद 2,000, 500 और 200 रुपए के नए नोट छापकर प्रचलन में लाए गए थे। तब से इस बात की चिंता जताई जा रही थी कि भारत में काम करने वाले नेपाली श्रमिकों और नेपाल जाने वाले भारतीय पर्यटकों को इस से भारी दिक्कत होगी, और सवाल खड़े हुए थे कि वहां चल रही 'बड़ी भारतीय मुद्रा' को कैसे बदला जाए, इसका कोई हल कैसे निकाला जाए।

भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापार सहयोगी है और उसे अधिकतर उपभोक्ता सामान की आपूर्ति करता है। नए निर्देशों के मुताबिक नेपाल सरकार ने भारत के सौ रुपए तक के नोटों को प्रचलन में रहने दिया है, ताकि गरीब और कमजोर वर्ग को असुविधा न हो।
भारत के परंपरागत, प्रगाढ़ मित्र माने जाने वाले नेपाल के साथ संबंध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भी हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों मेें रिश्तों में रह-रह कर 'असहजताÓ देखने को मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रिश्तों में नजदीकियां बढ़ाने के लिए तीन बार नेपाल की यात्रा भी कर चुके हैं, पर कई मुद्दे इस सहजता को बहाल करने में बाधा बनते रहे हैं।

इस बार फौरी चिंता का विषय यह करंसी का मुद्दा बना है। नेपाल, जहां भारतीय मुद्रा का इस्तेमाल आधिकारिक तो नहीं, अलबत्ता व्यावहारिक प्रचलन काफी ज्यादा है, भारतीय मुद्रा के विकेन्द्रीकरण के बाद उस कदम का असर वहां पडऩा स्वाभाविक था। हकीकत यही है कि नेपाली रुपए के बाद भारतीय मुद्रा वहां सबसे ज्यादा चलन में है। इसी के चलते इन क्षेत्रों में भारत के विमुद्रीकरण के फैसले का फौरी असर पड़ा।

नेपाल का सवाल है कि भारत अपने पुराने नोट क्यों नहीं बदल रहा है। इस मामले के निस्तारण के लिए नेपाल ने कई बार भारत से आग्रह किया, दोनों देशों के बीच कई समितियां भी बनीं, लेकिन संकट का समाधान नहीं हो पाया। दरअसल, मुद्दा जटिल और पेचीदा है। काला धन, नकली करंसी और पाक गुप्तचर एजेंसी आइएसआइ द्वारा नकली भारतीय करंसी को बाजार में भारी मात्रा में लाए जाने के इतिहास से चौकस भारत सतर्कता से आगे जरूर बढ़ रहा है, लेकिन निश्चित तौर पर इस जटिल मुद्दे को सुलझाने मे हुई देरी से हमारे रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं। इससे चीन को भी नेपाल में अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में मदद मिलेगी। वैसे भी नेपाल की ओली सरकार की चीन से बढ़ती घनिष्ठता सर्वविदित है।

दरअसल, पाक गुप्तचर एजेंसी आइएसआइ द्वारा नकली भारतीय मुद्रा नेपाल से भारत में भेजे जाने और उन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए किए जाने की वजह से भारत सरकार के आग्रह पर 2014 तक 500 और 1,000 के बड़े नोट प्रतिबंधित कर दिए गए थे। अगस्त 2015 में इसे फिर वापस ले लिया गया, जिस से भारत से नेपाल जाने वाले भारतीय 25,000 रुपए तक के 500, 1000 रुपए तक के नोट ला सकते थे।

एक अर्थशास्त्री के अनुसार, दरअसल यह मुद्दा इतना सामान्य नहीं है जितना कि दिखाई दे रहा है। कालाधन, नकली करंसी जैसे कितने ही जटिल मसले हैं, अलबत्ता इनका हल प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए था और बेवजह की कड़वाहट से बचा जाना चाहिए था। नोटबंदी से नेपाल ही नहीं, भूटान भी बड़े स्तर पर प्रभावित हुआ था, क्योंकि वहां भी भारतीय मुद्रा का इस्तेमाल आम है। नेपाल तथा भूटान की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर भारतीय रुपए से प्रभावित होती है, जो कि दोनों देशों के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा प्रतिशत है।

एक तरफ जहां नेपाल के विपरीत भूटान में भारतीय रुपए का चलन आधिकारिक है, वहीं नेपाल में सामान्य तौर पर इसे रिटेल स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है। भूटान के साथ जहां मसले का समाधान कर लिया गया है, वहीं नेपाल के साथ इसके समाधान में देरी होने से नेपाल ने पिछले माह फैसला किया, जिसके तहत वहां सौ रुपए तक के नोट के चलन को छोड़कर न कोई भारत की मुद्रा रख पाएगा, और न ही कोई कारोबार कर पाएगा। ऐसा करना अपराध की श्रेणी में माना जाएगा। पिछले साल भी नेपाल ने भारत के नए नोटों पर पाबंदी लगाई थी, लेकिन इस साल भारतीय प्रधानमंत्री जब नेपाल जाने वाले थे, तो सद्भावना दिखाते हुए उसे वापिस ले लिया गया था।

कुल मिलाकर प्रतिबंध से सीमावर्ती क्षेत्र के व्यवसायियों एवं देशी-विदेशी पर्यटकों में खलबली मची हुई है। नेपाल में भारी संख्या में पर्यटक आते-जाते रहते हैं। फैसले का न केवल उन पर्यटकों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, बल्कि नेपाल का खुदरा बाजार भी प्रभावित होगा।

भारत के विभिन्न शहरों के लोग भारतीय मुद्रा के साथ नेपाल जाते हैं और आसानी से सामान खरीदकर लाते हैं। अब उन्हें 100 या इससे छोटे नोट का इस्तेमाल करना होगा। नेपाल, वर्ष 2019 को पर्यटन वर्ष के रूप में मना रहा है। नेपाल में सर्वाधिक पर्यटक भारत से ही जाते हैं। देशी-विदेशी पर्यटकों से नेपाल की अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार मिलता है और प्रतिबंध से पर्यटन उद्योग और पर्यटकों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। एक आर्थिक विशेषज्ञ के अनुसार, भारत और नेपाल के बीच खुला बॉर्डर है। हालांकि यह नेपाल का आंतरिक मामला है, लेकिन यह निर्णय जन भावना के दृष्टिकोण से ठीक नहीं। हाल ही संसद के उच्च सदन में भी सांसदों ने इसे लेकर चिंता जताई और विदेश मंत्रालय के जरिए कारणों की पड़ताल पर जोर दिया।

(समसामयिक विषयों विशेषकर विदेश मामलों पर निरंतर लेखन।)

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