...तो फिर कैसे मिलेगा न्याय?( प्रकाश टांटिय/ विवेक तन्खा/एन. एन. माथुर)

...तो फिर कैसे मिलेगा न्याय?( प्रकाश टांटिय/ विवेक तन्खा/एन. एन. माथुर)
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Shankar Sharma | Publish: Jun, 29 2016 11:41:00 PM (IST) विचार

अदालतों में जजों के पद स्थापन को लेकर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच विवाद थम नहीं रहा। हैदराबाद उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालतों में जजों के स्थानांतरण

अदालतों में जजों के पद स्थापन को लेकर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच विवाद थम नहीं रहा। हैदराबाद उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालतों में जजों के स्थानांतरण से नाराज तेलंगाना की निचली अदालत के जजों का कहना है कि आध्र प्रदेश से तेलंगाना की निचली अदालतों में स्थानांतरण से उनकी पदोन्नति पर फर्क पड़ेगा। प्रतिक्रियास्वरूप उच्च न्यायालय ने अनुशासनहीनता के आरोप में अब तक कुल 11 जजों को निलंबित कर दिया। इसके विरोध में तेलंगाना जजेज एसोसिएशन के 200 जज 15 दिन के सामूहिक अवकाश पर चले गए। न्यायिक कार्य ठप होने से जनता परेशान है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने भी इनकी मांग का समर्थन करते हुए दिल्ली में धरने पर बैठने की बात कही है। आरोप-प्रत्यारोपों के दौर में सवाल यह उठता है कि क्या यह न्यायपालिका से अधिक राजनैतिक मुद्दा बन गया है? क्या जजों का सामूहिक अवकाश पर जाना उचित है? आखिर, कैसे मिलेगा जजों और जनता को न्याय?


आम आदमी का ही ज्यादा नुकसान

यह एक सामान्य प्रक्रिया है कि जब भी राज्यों का विभाजन होता है तो कॉडर स्ट्रेग्थ का भी विभाजन होता है। यह केवल न्यायिक सेवा में ही नहीं बल्कि राज्य की दूसरी सेवाओं में भी किया जाता है। इससे पहले भी जब राज्यों का विभाजन हुआ है तो इसी तरह से कॉडर स्ट्रेंग्थ का विभाजन हुआ है। चाहे वह उत्तराखण्ड हो या फिर झारखण्ड। किस कॉडर का किस तरह से विभाजन होना है इसका फॉर्मूला बनाया जाता है। ने केवल इतना बल्कि राज्यों की संपत्तियों व दायित्वों का भी इस दौरान विभाजन किया जाता है।

आम तौर पर इस तरह का विवाद हो ही जाता है कि अमुक कॉडर या संपत्ति का विभाजन अमुक राज्य में कम या ज्यादा हुआ। ऐसा तब होता है जब विभाजन की प्रक्रिया ठीक से नहीं अपनाई जाए। लेकिन कोई कमी रहती है तो उसके सुधार की गुंजाइश भी रहती है। तेलांगना में जजों के पदस्थापन को लेकर जो बात उठाई जा रही है वह सम्बन्धित जजों की अपनी समस्या हो सकती है। लेकिन मेरी राय में हड़ताल और धरना-प्रदर्शन और अवकाश पर जाने जैसी बातों में इसका समाधान नहीं निकलने वाला।

किसी भी आंदोलन का कोई प्रजातांत्रिक तरीका हो और प्रजातांत्रिक तरीके से ही उसका हल निकाला जाए यह ज्यादा जरूरी है।  मेरा मानना है कि इस तरह के मसलों के समाधान के लिए सम्बन्धित राज्यों को अपना -अपना पक्ष मजबूती से रखना चाहिए। जजों का कौनसा कॉडर कहां और कैसे जाए इसके बारें में बहस होनी चाहिए। यह सार्वजनिक मंचों पर सभाओं के जरिए हो सकती है। ऐसी बहस के बाद कोई ठोस नतीजा निकले तो उससे कोई इनकार भी नहीं करेगा।

 एक सवाल यह भी उठाया जाता रहा है कि क्या छोटे राज्यों के लिए अलग से हाईकोर्ट की जरूरत होनी चाहिए? यह सम्बन्धित क्षेत्र की आर्थिक, राजनीतिक व भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। हम देख रहे हैं कि त्रिपुरा, मणिपुर, झारखण्ड जैसे छोटे राज्यों में भी उच्च न्यायालय है। वहीं हरियाणा व पंजाब राज्य एक ही हाईकोर्ट से काम चला रहे हैं। यही स्थिति महाराष्ट्र व गोवा की भी है जहां अलग हाईकोर्ट की जरूरत नहीं पड़ी।

आपसी सहमति जरूरी
देखा जाए तो जब दो राज्यों में हाई कोर्ट व जजों के पदस्थापन को लेकर कोई विवाद होता हो तो यह नितांत स्थानीय मसला होता है। इस बारे में दोनों राज्यों की सरकारों व हाईकोर्ट के बीच प्राथमिक सहमति हो तो बेहतर है। यह आंदोलन किन परिस्थितियों में हो रहा है इसकी तो मुझे ज्यादा जानकारी नहीं और न ही मुझे इस बारे में कोई टिप्पणी करनी है लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि जजों के आंदोलन से आम आदमी को नुकसान नहीं होना चाहिए। आम फरियादी को इस बात से कोई वास्ता नहीं होता कि अदालतों में कोई आंदोलन क्यों हो रहा है? उसकी चिंता तो इतनी ही रहती है कि वह पेशियों के चक्कर में बेवजह परेशान नहीं हो। वस्तुत: आंध्रप्रदेश व तेलांगना दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को केन्द्रीय कानून मंत्री व उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के सम्मुख सभी तथ्य रख इसका त्वरित समाधान निकालने की राह खोजनी होगी ताकि लोग परेशान न हों।


यह है मामला
तेलंगाना में करीब 200 जज अपने निलंबित सााथियों की बहाली की मांग को लेकर 15 दिन की सामूहिक छुट्टी पर चले गए। हैदराबाद हाईकोर्ट ने अनुशासनहीनता के आरोप में पहले दो व अब नौ और जजों को निलंबित कर दिया।  इन पर न्यायिक अधिकारियों के आवंटन के खिलाफ आंदोलन के दौरान अनुशासनहीनता का आरोप है।

बर्दाश्त के बाहर
राज्य सरकार का रुख 'अस्वीकार्य एवं बर्दाश्त से बाहर है। नए उच्च न्यायालय का गठन  आंध्रप्रदेश तथा तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के हाथ में है। डी.वी.सदानंद गौडा,केन्दीय कानून मंत्री

केन्द्र पर आरोप
आंध्रप्रदेश के विभाजन के बाद उच्च न्यायालय के विभाजन के मुद्दे पर केन्द्र 'असंवेदनशील' है और मेरे पिता एवं तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव इसके खिलाफ दिल्ली में विरोध प्रदर्शन से भी नहीं हिचकेंगे।- के. कविता, टीआरएस सांसद


इस विवाद का हल सजा देना तो नहीं

यह बहुत ही दुखद बात है कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में जजों के आवंटन को लेकर तीखे विवाद की परिस्थिति बन गई। न्यायपालिका में हड़ताल का होना तो किसी की भी कल्पना से परे है। न्यायपालिका कभी भी हड़ताल पर नहीं जाती। केवल एक बार ही हरियाणा-पंजाब उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के रवैये के कारण एक दिन कामकाज रोका गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने उसे भी अच्छी नजर से नहीं देखा था। इसीलिए यह सुनकर बेहद अजीब लग रहा है कि न्यायपालिका में हड़ताल भी हो रही है।

जजों की समस्याएं सुनें
क हीं न कहीं संवाद की समस्या जरूर है। ऐसा लगता है कि हमारी व्यवस्था में कुछ ऐसी बात छूट गई जिसमें तेलंगाना में निचली अदालत के जजों की समस्याओं की ओर ध्यान ही नहीं दिया गया। नए राज्य के गठन के दौरान उच्च न्यायालय को लेकर जो भी नियम बनाए गए होंगे, उसमें कुछ खामी रह गई है। उच्च न्यायालय में प्रशासनिक विभाग ने निचली अदालतों के जजों की परेशानियों पर ध्यान ही नहीं दिया।  उन्हें समझने की कोशिश ही नहीं की गई। वरना इतनी बड़ी नाराजगी रखते हुए हड़ताल पर जाने जैसा कदम कोई नहीं उठाता। यह हाईकोर्ट के प्रशासनिक विभाग की बौद्धिक असफलता ही कही जा सकती है।

राजनीतिक रंग भी
उच्च न्यायालय को चाहिए कि वह निचली अदालतों के जजों की परेशानियों को समझे। अपने अहम को छोड़कर उनसे सीधे बात करे। इस बात को समझना चाहिए कि ये जज अकसर हड़ताल पर चले जाने वाले लोग नहीं है। उन्हें सजा देकर सुधारने की कोशिश की बजाय समाधान की ओर आगे बढऩा चाहिए। अन्यथा, मुद्दा और अधिक उलझता चला जाएगा। तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने भी इस मामले को राजनीतिक रंग देना शुरू कर दिया है। उनकी आदत है कि वे हर बात में राजनीति करते हैं। वे सिर्फ पार्टी तोड़कर अपनी राजनीति चलाना चाहते हैं, उन्होंने हमेशा ऐसा ही किया है।


अलग उच्च न्यायालय ही होगा समाधान
तेलंगाना में न्यायाधीशों और वकीलों के विरोध का समाधान केंद्र सरकार के हाथ में है और वह समाधान है - अलग हाईकोर्ट की स्थापना। पर केंद्र सरकार इस कदम से बचना चाह रही है। जब भी राज्य में विभाजन होता है तो 'स्टेट रीऑर्गनाइजेशन एक्ट' के तहत प्रावधान है कि न्यायपालिका में पैदा हुई ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार पहल करे।

शुरू करें मशविरा
हमारे केंद्रीय कानून मंत्री का बयान पढ़ा, उन्होंने कहा है कि तेलंगाना में अलग हाईकोर्ट बनाने में केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है। पर मैं उनके इस बयान से इत्तेफाक नहीं रखता।  चूंकि 'स्टेट रीऑर्गनाइजेशन एक्ट' के तहत केंद्र सरकार ही तेलंगाना जैसी स्थिति के लिए पहल करती है। न्यायपालिका बाद में आती है। कानून मंत्रालय संबंधित राज्य के मुख्य न्यायाधीश और मुख्यमंत्री से परामर्श करता है। फिर आखिरी निर्णय केंद्र सरकार का ही होता है। जब राज्य का विभाजन ही केंद्र सरकार ने किया है तो अलग हाईकोर्ट का निर्णय वह क्यों नहीं कर सकती? कानून मंत्रालय का काम है कि वह इस दिशा में तय प्रक्रिया शुरू कर बताए कि दोनों राज्यों का संयुक्त हाईकोर्ट रहेगा या अलग-अलग।

उदाहरण सामने हैं
अतीत में जब बिहार से पृथक होकर झारखंड बना तो अलग झारखंड हाईकोर्ट बना। इसी तरह मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग हुआ तो छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और उत्तरप्रदेश से उत्तराखंड बना तो वहां भी हाईकोर्ट अलग हो गया। यानी यह विषय हमारे सामने स्पष्ट है। जब राजस्थान हाईकोर्ट में जयपुर बेंच कायम हुई तो केंद्र सरकार ने ही उसका नोटिफिकेशन जारी किया। इसी तरह तेलंगाना में भी केंद्र सरकार की ही भूमिका अहम है।

उसे इस मसले को गंभीरता से लेना चाहिए। कानून मंत्रालय को स्टेट रीऑर्गनाइजेशन एक्ट के तहत तेलंगाना हाईकोर्ट के बारे में सलाह मशविरा कर निर्णय लेना चाहिए।

केंद्र सरकार अभी शिथिलता दिखा रही है। अगर इस मसले को केवल राज्य पर छोड़ दिया गया तो वह सही निर्णय नहीं होगा। कोई सही समाधान भी नहीं निकलेगा। जब तेलंगाना का अस्तित्व ही आंध्रप्रदेश से टकराव और झगड़े के बाद बना है तो आसान समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती।

ऐसे निकलेगा रास्ता
यूपीए सरकार (जिसने तेंलगाना निर्माण किया था) के विपरीत मौजूदा केंद्र सरकार पूर्ण बहुमत में है। उसे भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई)  तेंलगाना और आंध्र के चीफ जस्टिस से सलाह मशविरा करना चाहिए। जब तेलंगाना ही केंद्र सरकार ते देन है तो वहां जरूरी संस्थाओं की स्थिति भी केंद्र सरकार को ही तय करनी होगी।

इस मामले में केंद्र सरकार और सीजेआई, ही पहली अथॉरिटी हैं। कानून मंत्रालय को सीजेआई से कंसल्टेशन शुरू करना होगा। उनसे राय मांगी जाए कि उनका अलग हाईकोर्ट के बारे में उनका क्या विचार है। सीजेआई इस बारे में एक कमेटी बना सकते हैं। कानून मंत्रालय को इस मसले को कैबिनेट में ले जाकर मंजूरी लेनी होगी। कानून मंत्री दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री और वहां के चीफ जस्टिस से बात कर समाधान की ओर बढ़ें।

जड़ में ही झगड़ा था
पंजाब और हरियाणा अलग हुए तो कोई झगड़ा नहीं था। आपसी सहमति से चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश माना और हाईकोर्ट भी वहीं रखा। पर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश झगड़कर अलग हुए हैं, इसलिए वहां अलग हाईकोर्ट बनाना ही समाधान है। इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। जब झारखंड़, छत्तीसगढ़ उत्तराखंड में अलग हाईकोर्ट बने तो तेलंगाना में क्यों नहीं बनना चाहिए। मेरे विचार से दोनों राज्यों के लिए दीर्घकालिक और स्थायी समाधान अलग हाईकोर्ट बनाना ही होगा।
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