कदम फिर वहीं के वहीं

कदम फिर वहीं के वहीं
Opinion news

Shankar Sharma | Publish: Feb, 09 2016 11:12:00 PM (IST) विचार

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन को एक महीने से अधिक बीत चुका है लेकिन राज्य में सरकार के गठन मसला अब भी अटका हुआ है

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन को एक महीने से अधिक बीत चुका है लेकिन राज्य में सरकार के गठन मसला अब भी अटका हुआ है। हालात फिर वहीं के वहीं हैं, जहां से शुरू हुए थे।

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख और मुफ्ती मोहम्मद की बेटी महबूबा मुफ्ती असमंजस में हैं कि फिर से भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई जाए या नहीं? क्या विपरीत नजरिया रखने वाली भाजपा के साथ मिलकर सरकार चलाना उनकी पार्टी और राज्य के हित में होगा ?  भाजपा कितनी उत्सुक है, गठबंधन सरकार के लिए ? यदि मामला नहीं सुलझा तो क्या जम्मू-कश्मीर को फिर से चुनाव झेलना पड़ेगा? इस परिस्थिति में किसे होगा फायदा और किसे हो सकता है नुकसान ? ऐसे ही सवालों पर पढि़ए स्पॉटलाइट में जानकारों की राय...

अब साझेदारी की गेंद महबूबा के पाले में
उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार
देखा जाए तो जम्मू-कश्मीर में ऐसी सरकार बनी जिसमें तीनों क्षेत्रों जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख के लोगों को बहुत उम्मीदें थीं।  लेकिन इन उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश ही नहीं हुई।  भले ही  यह कम दिनों की सरकार थी लेकिन इसकी योजनाओं को देखकर ऐसा कभी नहीं लगा कि उसमें कुछ करने की ललक है। दो बिल्कुल उल्टी सोच वाली पार्टियों ने साथ चलने का फैसला किया था। 

राजनीतिक बंदियों की रिहाई का मसला हो या मानवाधिकार हनन का मसला या फिर विभिन्न मसलों पर जम्मू, श्रीनगर घाटी और लद्दाख के लोगों से सीधे संवाद करने का। कहीं कुछ भी शुरू होता नजर नहीं आया। जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ से तबाही के बादका मलबा आज तक उठाया भी नहीं गया। जिस वजह से वहां बाढ़ आई, उसे हल करने के लिए जल स्रोतों का पुनरुद्धार करने की बात हुई थी, उस पर कोई काम नहीं हुआ। एक और विनाशकारी बाढ़ आने का अंदेशा अब भी बना हुआ है। लोगों में विश्वास जागृत करने की जो बात महबूबा मुफ्ती कर रही हैं, उसके लिए सरकार के पास ठोस नीति या कार्यक्रम नहीं था।

हिचक के कारण ये
जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने में दो बड़े कारणाों से पीडीपी की हिचकिचाहट दिख रही है। एक तो यह कि पीडीपी नेता महबूबा को लग रहा है कि उनके दिवंगत पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद भाजपा से गठबंधन करने का फैसला पीडीपी के घाटी में राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के खिलाफ था। दूसरा यह कि महबूबा को भी लगता है कि सईद के मुख्यमंत्रित्वकाल में भाजपा के सहयोगी के तौर पर पीडीपी कुछ नहीं कर पा रही थी। उल्टे गठबंधन में रहते हुए भाजपा ही निर्देश दे रहीं थी। ऐसे में उसके साथ गठबंधन टूट भी जाए तो कोई हर्ज नहीं होगा।

कांग्रेस थी बेहतर
जब पीडीपी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई थी तो उस समय मुफ्ती साहब अपने फैसले स्वतंत्र रूप से ले सकते थे। इस बार तो  वे जैसे ही फैसले लेते थे, उन पर अंकुश लगने लगता था। कांग्रेस के साथ सरकार चलाते हुए मुफ्ती मोहम्मद ने हीलिंग टच पॉलिसी (घावों पर मरहम लगाने की नीति) की शुरुआत की थी। उस दौर में कांग्रेस को भले वह अच्छी नहीं भी लगी हो लेकिन उसका कांग्रेस ने विरोध भी नहीं किया। सच पूछिए तो इस हीलिंग टच पॉलिसी से ही जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य हुए।

अब रोष का माहौल
मुफ्ती मोहम्मद को लेकर घाटी में जो पहले मोहब्बत का माहौल था, वह भाजपा के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने से जनता के रोष में बदल गया। जब उनका जनाजा निकला तो लोगों की कम संख्या भी इस ओर इशारा करती है । ये बातें महबूबा ने समझते हुए माना है कि उनकी पार्टी से गलतियां हुई हैं और इसका खमियाजा पार्टी भुगत सकती है। यही वजह है कि देरी हो रही है।  ऐसा लगता है कि भाजपा यदि उनकी शर्तों पर सरकार बनाने को तैयार हो, तभी वे सरकार बनाएंगी, अन्यथा कोई गुंजाइश नजर नहीं आती।

हालात का दोषी कौन?
मुझे लगता है कि इन हालातों के लिए भाजपा और पीडीपी ही दोनों दोषी हैं। मुफ्ती मोहम्मद का  जल्दबाजी में पैसला था  भाजपा के साथ गठबंधन करके  सरकार बनाने का।  भाजपा की धारणा जम्मू-कश्मीर के मामले में सांप्रदायिक नजरिये की है। वह कश्मीर समस्या को केवल हिंदुत्व के नजरिये से ही देखती है, हिंदुस्तान के नजरिये से नहीं देखती।  यह बेमेल खिचड़ी है। अब तो गेंद पीडीपी और महबूबा के ही पाले में है। यदि भाजपा उनकी शर्तों पर तैयार है तो सरकार बनेगी।  अन्यथा नहीं।


यह प्रजातंत्र का अनादर
सैयद अतहर देहलवी अंजुमन मिन्हाजे रसूल
जम्मू -कश्मीर विधानसभा के पिछले चुनाव में भी यह महत्वपूर्ण नहीं था कि कौन हारा या कौन जीता। सबसे अहम मुद्दा था कि जम्मू-कश्मीर की जनता ने पहली बार फ्रंट लाइन पर आकर, दुनिया को सबूत दिया कि उसे प्रजातंत्र, भारतीय व्यवस्था में और भारत की चुनाव प्रणाली में यकीन है।

जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आने वाली पार्टी पीडीपी और केन्द्र में सत्तारूढ़ उससे अलग सोच रखने वाली पार्टी भाजपा ने अलग नजरिया होते हुए भी जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाना तय किया। तो उम्मीद की जा रही थी कि पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सहयोग लेते हुए जम्मू-कश्मीर के विकास की नए सिरे से इबारत लिखेंगे। मुफ्ती साहब के निधन से यह उम्मीद अब फीकी पड़ती दिखने लगी है।

समन्वय की कमी
जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा गठबंधन को तकलीफ उस समय होने लगी जब दोनों दलों के नेताओं ने अपने बयानों से  गठबंधन पर आघात शुरू कर दिए। दोनों दलों के शीर्ष नेताओं में तो समझ-बूझ और तालमेल जरूर रहा लेकिन दूसरे दर्जे के नेता हालात को संभाल नहीं पाए। कहीं न कहीं ऐसा लगने लगा कि यह गठबंधन टूट रहा है। ऐसी बयानबाजियों से ही यह लगने लगा था कि अब दोनों दलों का संबंध खत्म होते जा रहे हैं।

हमें एक बात समझ में आनी चाहिए कि चुनाव के जरिए जम्मू-कश्मीर की अवाम ने किसी नेता या किसी पार्टी विशेष से ज्यादा भारतीय प्रजातंत्र में विश्वास जताया था। लोगों को समझना होगा कि प्रजातंत्र में नेताओं को अपनी खुशी भूलकर आम जनता की भावना का सम्मान करना होता है। यह बात जितनी जल्दी नेताओं को समझ में आए बेहतर है। वरना  कहा जा सकता है कि सरकार बनने में जितनी अधिक देरी हो रही है, वह प्रजातंत्र और चुनाव प्रणाली के साथ जम्मू-कश्मीर के लोगों का अनादर है।

जुदा है सबकी राय
अब यदि गठबंधन बना है तो उसमें विश्वास तो रखना ही चाहिए। अब यदि पीडीपी नेता महबूबा कहती हैं कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम का उल्लंघन हो रहा था, धारा 370 के मसले पर जुदा राय है, नेता लोग बयानबाजी करते हैं तो स्थितियां खास नहीं बदली नहीं हैं। पीडीपी अब भी वही नजरिया रखती है जो पहले रखती थी।  और भाजपा अब भी वही नजरिया रखती है जो पहले रखती थी लेकिन प्रजातंत्र में भावना का अनादर करना ठीक नही। पहले सरकार तो बनाएं, ये मसले तो बाद में भी हल हो सकते हैं। यदि जल्द ही ऐसा नहीं किया गया तो जम्मू-कश्मीर को ही नहीं बल्कि इन दोनों पार्टियों को भविष्य प्रजातंत्र के अनादर का की सजा भुगतनी पड़ेगी।

विश्वास जगाना होगा
सवाल यह है कि क्या वजह रहीं कि जो लोग दोनों दलों में की गठबंधन सरकार में विश्वास जता रहे थे, वे अचानक संविधान और प्रजातंत्र के विरोधी हो गए? हमने पहले ही कहा था कि कश्मीरी पंडितों को न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत सरकार में शामिल किया जाना चाहिए।

ऐसा नहीं हुआ। कम से कम राज्यसभा में तो उन्हें प्रतिधित्व करने का मौका मिलता तो उनको अपनी बात कहने का मौका तो मिलता। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि वे मुफ्ती ने कभी यह जाहिर नहीं किया कि वे जम्मू-कश्मीर में अकेले सरकार चला रहे हैं। वे हमेशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साथ लेकर आगे बढ़ते रहे। लेकिन, भाजपा के कुछ नेताओं ने हालात बिगाडऩे में कसर नहीं रखी। 

उदाहरण के तौर पर भाजपा के राम माधव के पास समन्वय का दायित्व रहा लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी सोच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोच के आगे बौनी थी।  इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना चाहिए। उन्हें पीडीपी के नेताओं को बुलाकर बात करनी चाहिए। उन्हें लोगों में विश्वास जगाना चाहिए। यह विश्वास पीडीपी नहीं पूरी जम्मू-कश्मीर को अवाम में जगाना पड़ेगा। उन्होंने कहा था कि वे अच्छी सरकार देंगे और अपनी बात पर कायम रहने के लिए उन्हें सरकार बनवाने में पहल करनी चाहिए। यह देश और कश्मीर के हित में होगा। ऐसा नहीं हुआ तो भाजपा और पीडीपी दोनों दलों को भविष्य के चुनाव में भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।


पहले क्यों नहीं लगा गठबंधन बेमेल
प्रो. नूर अहमद बाबा कश्मीर विवि
गत वर्ष  25 फरवरी को जब भाजपा और पीडीपी ने मिलकर सरकार बनाई तो राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे अलग-अलग नजरिए से देखा था। कुछ ने इसे बेेमेल गठबंधन तो कुछ ने हिन्दुस्तान व कश्मीर की राजनीति के लिए मील का पत्थर बताया था। पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद के इंतकाल के बाद  संवैधानिक संकट तो राज्यपाल शासन लगाने से फिलहाल टल गया है।

अजीब स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री बनने के लिए कोई पहल ही नहीं कर रहा। न ही कोई जोड़-तोड़ के प्रयास कर रहा। इतना साफ है कि साझे में सरकार चला चुकी भाजपा व पीडीपी दोनों ही एक-दूसरे से आशंकित हैं। जब कश्मीर विधानसभा चुनावों के नतीजे निकले थे तब वहां सरकार बनने का कोई और दूसरा बड़ा विकल्प था ही नहीं। ऐसे में जब घाटी में पीडीपी और जम्मू में भाजपा को अच्छी सीटें मिलीं तो मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में सरकार बनाने का ही मुफीद फैसला था

तब देानों की मजबूरी
इसे भाजपा की मजबूरी भी कह सकते हैं कि उसे वैचारिक मतभेदों के बावजूद पीडीपी के साथ हाथ मिलाने को मजबूर होना पड़ा। तब देानों ही राजनीतिक दलों के लिए कश्मीर की सरकार में शामिल होने के आकर्षण थे। भाजपा तो इस बहाने घाटी में भी अपना जनाधार बढऩे की उम्मीद लगाए हुई थीं वहीं पीडीपी को लगता था कि दिल्ली में भाजपा की सरकार होने से उसे कश्मीर को विशेष आर्थिक मदद दिलाने में आसानी रहेगी।

मुफ्ती सईद के मुख्यमंत्री रहने के दौरान ही पीडीपी यह महसूस करने लगी थी कि इस गठबंधन को उसको विशेष फायदा नहीं हुआ है। उल्टे धारा 370 जैसे उन मसलों को और तेजी से उठाया जाने लगा है जिनकी वकालत भाजपा और अन्य हिन्दूवादी संगठन करते रहे हैं। पीडीपी शुरू से ही घाटी में सेना की मौजूदगी का विरोध करती रही है।

उसका यह भी मानना है कि खास तौर से उन इलाकों से तो सेना को हटा लिया जाना चाहिए जहां अब आतंकी गतिविधियां कम हो गई है। पीडीपी को ऐसा लग रहा है कि भाजपा से हाथ मिलाने के बाद वह जनाधार खोती जा रही है। एक मायने में इसको सही भी मान लिया जाए तो बड़ा सवाल यह है कि वहां की जनता क्या पीडीपी को एक साल सत्ता में रहने के बाद अब माफ कर देगी। वजह कुछ भी हो, भाजपा के लिए भी वैसा ही सवाल है कि आखिर साल भर तक उसको यह गठबंधन बेमेल क्यों नहीं लगा।

अंतर्विरोध बढ़ा
मेरा मानना है कि भाजपा और पीडीपी दोनों ने ही न्यूनतम साझा कार्यक्रम से सरकार जिस तरह चलानी चाहिए थी वह नहीं हो पाया।  महबूबा को  अब सीएम बनने का मौका ऐसे समय मिला है जब दोनों दलों के नेताओं में अंतर्विरोध काफी हद तक बढ़ गया है। हालांकि आज भी दोनों ही दलों के स्थानीय नेतृत्व को लगता है कि सरकार से बाहर रहना अब  आसान नहीं है। क्योंकि साल भर पहले जो कदम उठाया गया उसका फायदा-नुकसान तो दोनों को हो ही चुका है। यह बात भी दोनों दलों को समझनी होगी कि अब चुनाव हुए तो घाटी और जम्मू में दोनों  का जनाधार कम ही होने वाला है। यह भी हो सकता है कि फिर चुनाव होने पर वे साझे तौर पर सरकार बनाने की स्थिति में ही नहीं आ पाएं। पीडीपी खुद की शहादत बताते हुए अवाम के बीच जाने की कोशिश जरूर करेगी।

हां, मौजूदा माहौल को देखते हुए राजनीतिक समीक्षा करने वाले यह कहने लगे हैं कि अब चुनाव ही अंतिम विकल्प है। अभी उम्मीद और अवसर दोनों के लिए हैं। ज्यादा भाजपा पर निर्भर करता है कि वह पीडीपी के साथ कैसे तालमेल बैठाना चाहती है। अब चुनाव हुए तो भाजपा व पीडीपी दोनों के लिए भी भारी पडऩे वाले हैं।

पत्रिका ने किया था आगाह
राजस्थान पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने 2 मार्च 2015 को अपने प्रथम पृष्ठ संपादकीय नीतिविहीन राजनीति में साफ लिखा था कि...

आखिर जम्मू और कश्मीर में भाजपा-पीडीपी की संयुक्त सरकार बन गई। दोनों ही दलों ने अपने-अपने मतदाता के सामने जो शपथ ली थी, उसे तोड़कर जनमानस-विरोधी शपथ ले ली। जनता मुंह बाए अपने लुटते विश्वास को देखती रही। चुनाव परिणामों के करीब दो महीने बाद बनी इस सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम से यह स्पष्ट है कि दोनों ही पार्टियों ने सत्ता के लिए अपने-अपने मत को ताक पर रख दिया है। जनता जानती है कि दोनों ही पार्टियों का अब तक का इतिहास अपने-अपने मत पर अडिग रहने का है।

दोनों पार्टियां भले सहमत नहीं हों और इसे जनादेश का एकमात्र विकल्प बताएं, लेकिन जनता इसे सत्ता के लिए समर्पण से ज्यादा कुछ नहीं मानती। दोनों पार्टियों के नेतृत्व को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि जिस भी दिन उनमें से किसी एक के हितों पर आंच आई, सरकार गिर जाएगी।

जहां तक कश्मीर घाटी की जनता का सवाल है वह गठबंधन को मन से स्वीकार करने को तैयार नहीं है। स्थानीय लोगों पर पत्रिका द्वारा किए साक्षात्कारों के अनुसार  (1) दोनों दलों ने कुर्सी के लिए अपनी विचारधारा से समझौता किया है (2) उन्हें विकास के लिए काम करना चाहिए (3) सुरक्षा बलों के विशेष अधिकारों का कानून समाप्त कराने का प्रयास करना चाहिए (4) भाजपा के मंत्रियों को समारोह में बुलाना उनकी हैसियत की वजह से होगा, दिल से नहीं (5) यह गठबंधन जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों की जनता को संतुष्ट करेगा!

जहां तक राजनेताओं का सवाल है  भाजपा और पीडीपी के नेताओं को छोड़कर कोई भी इसके पक्ष में नहीं है। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े चिंतक-विचारक भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। सभी इसे दोनों दलों का सत्ता के लिए समझौता ही मान रहे हैं। साथ ही यह भी कि इस गठबंधन से पीडीपी को हो ना हो भारतीय जनता पार्टी को अगले चुनाव में नुकसान होगा।
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