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विश्वविद्यालय बेशुमार, शोध क्षेत्र में बुरा हाल

गत कुछ दशकों में देशभर में निजी महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इनके पास पर्याप्त संख्या में क्लास रूम और फैकल्टी तक नहीं है।

जयपुरJun 12, 2024 / 03:42 pm

विकास माथुर

हाल के दशकों में भारत में ही नहीं अपितु विश्व के सभी देशों में उच्च शिक्षा से संबंधित संस्थाओं की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। एक अनुमान के अनुसार जहां स्वतंत्रता के समय भारत में 12 विश्वविद्यालय थे, आज उनकी संख्या 7, 627 हो गई है। 2022 में भारत में 2500 इंजीनियरिंग कॉलेज 113 प्रबंध शिक्षण संस्थान तथा 1400 पॉलिटेक्निक संस्थान थे। राजस्थान राज्य में ही 2022 तक 52 विश्वविद्यालय कार्यरत थे। इनके अतिरिक्त कई तकनीकी संस्थान भी अस्तित्व में आ चुके हैं। इन संस्थाओं की बढ़ती हुई संख्या जहां एक तरफ हमारी नीतियों की प्रगति का एक उदाहरण है, वहीं इससे युवाओं के समक्ष एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो रहा है कि किस संस्था में प्रवेश लिया जाए।
वस्तुत: पूरे विश्व में दसवीं या 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद विद्यार्थियों को अपने करियर के बारे में निर्णय लेना होता है। उनको यह तय करना होता है कि वे आगामी जीवन में क्या करने वाले हैं। उनका रास्ता सुगम करने के लिए पिछले कुछ वर्षों से विश्वविद्यालय, महाविद्यालय तथा तकनीकी संस्थानों की रैंकिंग तय करने के काम में अनेक संस्थाएं लगी हुई हैं। इस रैंकिंग में प्रत्येक संस्था के पाठ्यक्रम इसकी उपादेयता, शोध के स्तर, शोध की उपादेयता तथा संस्था विशेष की आर्थिक या वैज्ञानिक उत्कृष्टता के आधार पर उसकी स्थिति की समीक्षा की जाती है और रैंकिंग की जाती है।
वर्ष 2024 में क्यू एस रैंकिंग : एक वर्ष पूर्व तक भारत में विद्यमान विश्वविद्यालयों तथा संस्थाओं में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलूरु, भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद, आइआइटी खडग़पुर को विश्व की प्रथम 200 संस्थानों में जगह मिलती थी। 2024 की इस रैंकिंग के अनुसार भारत की संस्थाओं तथा विश्वविद्यालय की रैंकिंग में एक अप्रत्याशित उछाल देखा गया। आइआइटी बॉम्बे की रैंक वैश्विक स्तर पर 118 की गई जबकि आइआइटी दिल्ली की वैश्विक रैंक 150 रही। अन्य संस्थाओं की रैंक में भी काफी सुधार हुआ। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलूरु की वैश्विक रैंकिंग 211 है, जबकि आइआइटी मद्रास की रैंक 227 रही। ऐसी मान्यता है कि भारत में गत दो वर्षों में जिस प्रकार व्यापक स्तर पर नई शिक्षा नीति लागू की गई, उसके कारण हमारे शिक्षण संस्थानों की रैंक में अप्रत्याशित रूप से सुधार हुआ है। इसके बावजूद क्यू एस रैंकिंग संस्था की प्रमुख जेसिका टर्नर भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों की प्रगति को संतोषप्रद मानते हुए इसमें सुधार के लिए अनेक सुझाव देती हैं।
भारत की उच्च शिक्षण संस्थानों को शोध के क्षेत्र में ज्यादा गंभीरता से काम करना चाहिए। वस्तुत: इन संस्थाओं के शोध को वैश्विक स्तर पर जितनी व्यापक मान्यता मिलनी चाहिए, वह नहीं मिली है। भारत के उद्योगों तथा व्यवसायों से संबद्ध इकाइयों में शिक्षण संस्थानों द्वारा की जा रही शोध की संबद्धता भी काफी कम है। अर्थव्यवस्था की प्रगति के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि इन संस्थाओं का शोध उद्योगों तथा कृषि के लिए उपयोगी हो। आइआइटी और आइआइएम जैसी संस्थाओं का अनुपात उच्च शिक्षण संस्थाओं में बहुत कम है। वहां पाठ्यक्रम शुद्ध एवं व्यापक है तथा फैकल्टी भी आवश्यकता अनुसार पर्याप्त है। लेकिन देश के हजारों सरकारी महाविद्यालयों एवं बड़ी संख्या में पंजीकृत निजी महाविद्यालयों में फैकल्टी अपर्याप्त है और उन्हें दिया जाने वाला मानदेय भी बहुत कम है। अपर्याप्त फैकल्टी तथा कम मानदेय के चलते निजी संस्थानों में पाठ्यक्रम से संबद्ध दायित्व पूरा नहीं हो पाता।
गत कुछ दशकों में देशभर में निजी महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इन संस्थाओं के पास पर्याप्त संख्या में क्लास रूम नहीं है, न ही इन संस्थाओं के पास पर्याप्त सुविधाएं तथा पुस्तकें हैं। जहां पाठ्यक्रम पूरा करना ही कठिन है, वहां फैकल्टी से शोध कार्य के लिए समय की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। वस्तुत: यह दायित्व सरकार का भी है कि वह महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय की स्वीकृति देने के साथ यह भी सुनिश्चित करे कि इन संस्थाओं के पास पर्याप्त क्लासरूम तथा फैकल्टी हो तथा उनको योग्यता के अनुरूप मानदेय दिया जाए। शिक्षकों तथा शोध की गुणवत्ता में सुधार के लिए बहुत कुछ करना होगा।
— प्रो.सी एस बरला

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