कोरोनाकाल में कुपोषण का खतरा भी

यदि हम कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई को लेकर बे परवाह रहे तो आगे चल कर खास तौर से बच्चों में गंभीर कुपोषण, डायरिया मोनिया और अन्य संक्रमणों का खतरा बढ़ सकता है। इसको लेकर सरकारों को सचेत रहना होगा।

By: shailendra tiwari

Updated: 22 Jun 2020, 05:15 PM IST

लक्ष्मण शर्मा, मनोविज्ञानी

कोरोना संक्रमण थमने का नाम नहीं ले रहा है, इस महामारी के दुष्प्रभाव कुपोषण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, किशोर/किशोरी स्वास्थ्य, व्यक्तियों के मानसिक स्वास्थ्य एवं गर्भवती महिलाओं की देखभाल जैसी चुनौती स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में स्पष्ट दिखाई दे रही है। लॉकडाउन के दौरान देश के सभी व्यापारिक प्रतिष्ठान, लघु मध्यम और बड़े उद्योग-धंधे, आँगनबाड़ी केन्द्र, स्कूल, कार्यालय बन्द होने के कारण सुदूर ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएँ एवं स्वास्थ्य कार्यक्रम गतिविधियाँ स्थगित हो गये है। इन स्वास्थ्य कार्यक्रमों के स्थगित होने के कारण नियमित स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं मिल पा रही है, जिसके फलस्वरूप जन स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव दिखाई पड रहा है। इस महामारी के पश्चात् होने वाले दुष्प्रभाव समाज के स्वास्थ्य पर अभी से परिलक्षित हो रहे है, हाल ही में यूनिसेफ़ द्वारा प्रकाशित विश्व रिपोर्ट में कहा गया है कि समाज में कुपोषण जैसी स्वास्थ्य चुनौती पर कोरोना संक्रमण महामारी का दुष्प्रभाव आने वाले अगले छह माह में स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है।


लॉक डाउन में स्कूल बंद होने के कारण लाखों बच्चे जिन्हें मध्यान्ह का भोजन पूरक पोषण आहार के रूप में मिलता था, नहीं मिल पा रहा है। इसी तरह ग्रामीण स्तर पर और कच्ची बस्तियों में एकीकृत बाल विकास योजना के तहत आंगनबाड़ी केंद्रों एवं अन्य स्थानों पर इन कार्यक्रमों के अंतर्गत दिये जाने वाले पोषण आहार कार्यक्रमों का विघटन महिलाओं और बच्चों के बीच अल्प पोषण की घटनाओं और परिणामों के लिए उत्तरदायी है। यूनिसेफ़ ने माह मई में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में यह चेतावनी दी है कि नियमित स्वास्थ्य सेवाओं में कमी के कारण पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण में वृद्धि होने के कारण निम्न और मध्यम आय वर्ग के देशोें में अगले 6 माह में 12 लाख बच्चों की मौत हो सकती है। भारत में मौत का यह आंकड़ा 3 लाख हो सकता है जो अभी तक का सबसे बड़ा आँकड़ा होगा जो एक चिंता का विषय है।


केन्द्र सरकार ने सभी राज्यों को एकीकृत ग्रामीण विकास योजना के तहत चल रहे कार्यक्रमों के लाभार्थियों को सूखे राशन पैकेट
वितरित करने की सलाह दी है। सभी राज्य सरकारों ने लॉकडाउन के अंतर्गत आई.सी.डी.एस. के तहत खाद्य सामग्री, सब्जी और फलों आदि की निरंतर आपूर्ति बनाए रखने और टेक होम राशन का वितरण सुनिश्चित करने के लिए सभी सम्भव प्रयास किये है। ज्यादातर राज्यों में आशा एवं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता घर-घर जाकर टेक होम राशन वितरित कर रही है।


राज्य सरकारों ने बेहतरीन काम किया है इसके बावजूद लॉकडाउन में खाद्य सामग्री बनाने वाली अनेक इकाइयों के बंद होने तथा एक राज्य की सीमा से दूसरे राज्य की सीमाओं पर यातायात प्रतिबंध होने के कारण कई स्थानों पर टेक होम राशन के वितरण में बाधा उत्पन्न हुई है। यहाँ तक कि सूखा राशन जहाँ सीमित या पर्याप्त मात्रा में लाभार्थियों तक पहुँचाया जा रहा है वहाँ महिलाओं और बच्चों में सूखे राशन को प्राप्त करने का गंभीर खतरा है, जबकि यह सूखा राशन मूल रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए ही दिया जाना है लेकिन ऐसे कठिन समय में परिवार के अन्य सदस्यों के साथ वितरित भोजन को साझा करने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। परिवार के अन्य सदस्यों के बीच भोजन बँटवारे से बच्चों एवं महिलाओं की पोषण स्थिति खराब हो सकती है अर्थात् जो पहले से कुपोषित है वो भोजन के अभाव में गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हो सकते हैं।


लॉकडाउन के दौरान कारखानें फैक्ट्री, उद्योग धन्धे बंद होने के कारण कार्य स्थल से अपने गृह राज्यों की ओर पलायन कर रहे प्रवासी मजदूरों की महिलाऐं एवं बच्चे पहले से ही पूरक पोषण आहर सेवाओं को प्राप्त करने में काफी कठिनाई महसूस कर रहे है। ये मजदूर अब राशन प्राप्त करने के लिए अपने कार्य स्थल वाले शहर में पूरक पोषण सेवाएँ अर्थात् सूखा राशन प्राप्त करने के लिए पंजीकृत हो सकते थे लेकिन पलायन के पश्चात् वे अपने गृह राज्य में जाकर पंजीकृत नहीं हो पायेगें। क्योंकि संसाधनों की कमी के कारणवासी आबादी को उचित भोजन की आपूर्ति सुनिष्चित करना एक गंभीर चुनौती होगी जिससे पर्याप्त आहार की कमी के कारण बच्चों और महिलाओं में कुपोषण का खतरा बढ़ जायेगा।


लॉकडाउन के दौरान हमारे अग्रिम पंक्ति के आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कोविड-19 वैश्विक महामारी से संबंधित निगरानी गतिविधियों और सेवाएँ देने में संलग्न रहे है इस गंभीर कठिन समय में ये कार्यकर्ता पहले से ही उच्च जोखिम वाली जिम्मेदारी से बोझिल है, ऐसी स्थिति में उनसे यह अपेक्षा करना कि पूर्व की भाँति वे कार्य करें अर्थात् महामारी से पूर्व वे जिस तरह बच्चें एवं महिलाओं को स्वास्थ्य एवं पोषण सेवाएँ दे रहे थे, उस तरह की स्वास्थ्य सेवाऐं वे अभी भी दें, यह गलत होगा। अतः महिलाओं और बच्चों को लॉकडाउन में उचित पोषण सेवाएँ नहीं मिलने के कारण भी इनमें कुपोषण का खतरा बढ़ रहा है।


चूंकि कोविड-19 के उपचार के लिए अभी तक कोई वैक्सीन नहीं है, ऐसी स्थिति में दुनिया के अधिकांश देशों ने कोरोना से लड़ने के लिए गैर फार्मास्यूटिकल दृष्टिकोण अपनाया है जिसके अन्तर्गत सामाजिक दूरी, पानी से बार-बार हाथ धोना या सेनिटाइजर का उपयोग व्यक्तिगत सुरक्षा एवं मास्क का उपयोग आदि को अपनाया है। दुनिया भर में सरकारों एवं विकास एजेन्सियों के बीच मौन स्वीकृत है कि कोविड -19 समाज में रहेगा और समाज को इस वायरस के साथ रहना सीखना होगा, इसलिए सामाजिक वैक्सीन (लॉकडाउन) ही इस महामारी से लड़ने के लिए उचित उपाय है।


यह उचित समय है जब हमें हमारे स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बारे में यह सोचना है कि इस माहमारी के खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़नी है जिस के लिए हमें रणनीति बनाने की जरूरत है यदि हम इस महामारी के खिलाफ लड़ाई को जीतने या हारने के खिलाफ बेपरवाह रहे तो हम गंभीर कुपोषण, डायरिया, निमोनिया और अन्य संक्रमणों जिन्हें रोका जा सकता है के कारण कई बच्चों की जान गवाँ सकते है।


हाल ही, यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित विश्व रिपोर्ट 2019 में यह कहा गया है कि भारत में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में 69 प्रतिशत मौतें कुपोषण के कारण होती है रिपोर्ट में यह भी प्रकाशित किया गया है कि पाँच वर्ष की आयु वाला हर दूसरा बच्चा किसी न किसी रूप में कुपोषण से प्रभावित है। महामारी के इस समय बच्चों में गंभीर कुपोषण का जो़िखम अत्यधिक हो सकता है।


कोराना संक्रमण के पश्चात् इन्टरवेंशन रणनीति के रूप में सरकार को ग्रामीण एवं शहरी बस्तियाँ जो कुपोषण से गंभीर रूप से प्रभावित है कि पहचान करवाकर उन क्षेत्रों की कलस्टर एवं क्षेत्रीय मैंपिंग करवानी चाहिए जिससे कुपोषण को दूरकरने के कार्यक्रम चलाये जा सके। इससे देश के सीमान्त क्षेत्रों में सबसे कमजोर लोगों को लक्षित करने एवं उनके जीवन और स्वास्थ्य को बचाने में मदद मिलेगी इसके अतिरिक्त बच्चों में कुपोषण को दूर करने के लिए समुदाय आधारित प्रबंधन रणनीति के क्रियान्वयन को मजबूत करना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बच्चों के माता-पिता अब कोरोना संक्रमण के डर से अपने बच्चों को पोषण पुनर्वास केन्द्रों पर कोविड-19 संक्रमण की दुनिया में रहने के लिए अनिच्छुक हो सकते है। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि कोविड-19 के संक्रमण के जोखिम से बचने के साथ-साथ माता-पिता के विश्वास को प्राप्त करने के लिए पोषण पुर्नवास केन्द्रों पर सोशिअल डिस्टेसिंग प्रोटोकाल फौलो किया जाना चाहिए। इन कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पर्याप्त टेक होम राशन उपलब्ध करवाने हेतु प्रभावी क्रियान्वयन नीति अपनाई जानी चाहिए साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए की राशन उन लोगों द्वारा ही उपयोग किया जा रहा है, इस हेतु अभिनव तरीका इस्तेमाल करके कार्यक्रम के माध्यम से परिवार के सदस्यों को प्रभावी संदेश देना कि टेक होम राशन बच्चे और महिलाओं के लिए आवश्यक है। इसके साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों के लिए सशर्त और बिना शर्त नकद राशि का हस्तान्तरण एवं आजीविका इन्टरवेंशन के माध्यम से यह सुनिश्चित करना की समुदाय में अन्य सदस्य भूखे तो नहीं हैं। इसके अतिरिक्त कुपोषण से लड़ने के लिए अन्य इंटरवेंशन जैसे माइक्रोन्यूटि एंट सप्लीमेंट, नवजात शिशुओं के लिए स्तनपाम की आदतें, पोषण परामर्श एवं खाद्य वितरण तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।

कोविड-19 को ध्यान में रखकर मध्यम कुपोषित एवं गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों हेतु पोषण पुनर्वास केन्द्रों पर उपचार इन्टरवेंशन को रिडिज़ाइन करना चाहिए। मध्यम तीव्र कुपोषित बच्चों को लक्षित पूरक आहार कार्यक्रम के माध्यम से एवं अति तीव्र कुपोषित बच्चे जो चिकित्सकीय जटिलताओं के साथ जोखिम में है उनका उपचार समेकित पोषण प्रबंधन कार्यक्रम के माध्यम से तथा बिना चिकित्सकीय जटिलता वाले अति कुपोषित बच्चों का उपचार सामुदायिक स्तर पर किया जाना चाहिए। अतः कुपोषण ऐसी स्थिति नहीं है जो कोरोना वायरस के समाप्त होने तक इंतजार करेगी। यह अदृश्य विशाणु कोविड-19 बच्चंे एवं महिलाओं के स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा एवं उनके जीवन को चुनौती देगा। अतः गरीबी और कुपोषण के दुष्चक्र में फंसे लाखों बच्चों की जान बचाना कोविड-19 के आगे एक चुनौती भरा कार्य है।

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