संवाद भी हो किसान कल्याण कार्यक्रमों पर

पूंजीवादी देश बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक जैसे कृषि में प्रयुक्त सामग्री के व्यापार को हथियाने में एक सीमा तक पहले ही सफल हो चुके हैं। अब उनकी गिद्ध दृष्टि कृषि उपजों के व्यापार को हथियाने पर लगी है।

By: shailendra tiwari

Updated: 26 Jun 2020, 05:51 PM IST

रामपाल जाट, राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान महापंचायत

किसान कल्याण कार्यक्रमों और योजनाओं को लेकर हमारी सरकारें भले ही दम भरती रहती है लेकिन हकीकत इसके उलट ही दिखती है। दुनिया के पूंजीवादी देश भारत समेत दूसरे देशों में बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक जैसे कृषि में प्रयुक्त होने वाली सामग्री के व्यापार को हथियाने में एक सीमा तक पहले ही सफल हो चुके हैं। अब उनकी गिद्ध दृष्टि कृषि उपजों के व्यापार को हथियाने की है। इसके लिए ये देश इस बात का आकलन कर रहे हैं कि विश्व के कौन से देश में कौन से उत्पाद की आवश्यकता है। इसे ध्यान में रखते हुए ये पूंजीवादी देश कमजोर देशों में संविदा के आधार पर खेती का अधिग्रहण कर विश्व बाजार में अधिक लाभ देने वाली कृषि उपजों की पैदावार करेंगे। किसानों से गुणवत्ता मानकों के अनुसार ऑनलाइन कृषि उपजें खरीदेंगे। उनका भंडारण करेंगे। फिर कृषि आधारित उद्योगों में उत्पाद तैयार करेंगे। क्रय-विक्रय की श्रृंखला बनाकर उन उत्पादों को बाजारों में अधिक लाभ कमाने के आधार पर बेचेंगे। आयात निर्यात के आधार पर कृषि उपजों के दाम को घटाने बढ़ाने का रुख अपनाएंगे। इस नीति से वे उत्पादकों को कम से कम दाम चुकाएंगे तथा उपभोक्ताओं की जेब से अधिक से अधिक दाम वसूलेंगे।


वैसे किसानों के लिए तो आज की व्यवस्था में भी लूट है. इसने किसानों को कर्ज में डुबो दिया। ऋण चुकाने की क्षमता समाप्त होने के कारण वे समय पूर्व ही मृत्यु का आलिंगन कर रहे हैं जिससे देश के ललाट पर आत्महत्याओं का कलंक लगा है। हैरत की बात यह है कि कोरोना संकट के दौर में अब इस व्यवस्था को वैश्विक लूट में परिवर्तित करने के लिए कानूनों की परिधि में लाया जा रहा है। पारिवारिक खेती को कॉर्पोरेट खेती में बदलने की बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार कानूनों को अपने अनुकूल तैयार करने के कार्य में जुटी हैं। संविदा की अवधि अब तक के भूमि कानूनों में अधिकतम 5 वर्ष की थी, जिसमें 5 वर्ष पूर्ण होते ही संविदा स्वत: समाप्त होने का प्रावधान था। सरकार के ताजा अध्यादेशों में 5 वर्ष से अधिक अवधि रखने के लिए प्रावधान किया गया है, जिसे छिपाने के लिए दोनों पक्षकारों की सहमति का नाम दिया गया है। एक तरह से यह अच्छा रहा कि सरकार द्वारा अध्यादेशों को लाने से चर्चा आरम्भ हो गयी। सरकार के पास लोकमत जानने के लिए पर्याप्त अवसर है। इसके लिए जनप्रतिनिधियों को संसद में अपना पक्ष रखने का समुचित समय देना होगा।


यह सब कहना इसलिए जरुरी हो गया है क्योंकि जल-जमीन-जंगल-जानवर जैसी प्राकृतिक संपदाओं पर कॉरपोरेट्स को स्वामित्व का अधिकार देने की नीति के अंतर्गत कानूनों बनाने की प्रक्रिया के तहत किसानों को बर्बाद करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। सीधा आरोप तो यह है कि कृषि उपजों के व्यापार को बड़ी पूंजी वालों को सौंपने के लिए ही सरकार “कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश, 2020” एवं “मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और सुरक्षा) समझौता अध्यादेश, 2020” अध्यादेश लायी है। संविधान के अंतर्गत "कृषि" राज्यों की सूची में है। इसीलिए सम्भावना यह है कि भारत सरकार द्वारा समवर्ती सूची की क्रम संख्या 33 पर उल्लेखित व्यापार एवं वाणिज्य का सहारा लिया जा सकता है। संविधान की इस समवर्ती सूची के अनुसार जनहित में किसी उद्योग के लिए कृषि उपजों के संबंध में तब कार्यवाही की जा सकती है, जब संसद द्वारा उसके लिए कानून बनाया हुआ हो। ऐसा कानून अस्तित्व में नहीं होने पर भी भारत सरकार में अध्यादेश लाकर राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का अतिलंघन किया है।


अभी खरीफ की उपजे 3 माह बाद आएगी। इस अंतराल में संवैधानिक बाध्यता के कारण संसद का सत्र आहूत होने वाला है। फिर भी अध्यादेश लेकर कृषि उपजों का व्यापार करने वालों के लिए संपूर्ण देश में कृषि उपजों को लाने - ले जाने की छूट दी गई है। इन कृषि उपजों के व्यापार के संबंध में इन्हें राज्यों के कानूनों की परिधि से बाहर कर दिया गया है। उन्हें किसी भी राज्य में किसी प्रकार का कर, उपकर या शुल्क देने की आवश्यकता नहीं रही। इतना ही नहीं तो वह चाहे जितनी मात्रा में कृषि उपजों का भण्डारण कर सकते हैं। इसके लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम को उसी अनुसार संशोधित किया गया हैं।


किसानों से फसल खरीदने या संविदा के अनुसार उनके खेतों से फसल उठाने के पूर्व उसकी गुणवत्ता मानकों की जांच का व्यापार करने वालों को अधिकार सौंप दिया, इससे वे किसानों को झुका सकेंगे, उनकी उपजों को प्राप्त करने के पूर्व उससे मोलभाव अपने अनुकूल कर सकेंगे। इन दोनों अध्यादेशों में भारत सरकार द्वारा ई-व्यापार मंच बनाने, पंजीकरण की व्यवस्था एवं उसके लिए पंजीकरण प्राधिकरण बनाने, उचित व्यापार प्रक्रियाओं से संबंधित नियम बनाने, केंद्र सरकार द्वारा कृषि उपजों के मूल्य की जानकारी देने के लिए प्रणाली तैयार करने, व्यापार को निरस्त करने की शक्ति प्रदान करने के लिए अधिकारी की नियुक्ति करने, केंद्र सरकार द्वारा आदर्श अनुबंध प्रपत्र लाने, गुणवत्ता के मानकों का निर्धारण करने, एवं अधदेशों की क्रियान्वित के लिए नियम बनाने का उल्लेख किया गया है। भारत सरकार इनको पूर्ण करने के उपरांत भी अध्यादेश ला सकती थी, किंतु पूर्ण तैयारी के बिना ही ये अध्यादेश लाए गए हैं।


तुलसी कृत रामायण में प्रकट किया है “जो अनीति कछु भांखो भाई – तो बरजही मोहि भय बिसराई”। निर्भीक होकर पक्ष रखने से सत्य प्रकट होने की सम्भावना अधिक रहेगी। वर्ष 2014 में भूमि अधिग्रहण कानून को परिवर्तित करने के लिए अध्यादेश लाया गया था। उस समय सरकार ने अपने दल, समान विचार वाले जन संगठनो के मंचो पर चर्चा कर जनमत जानने का प्रयास किया था। विमत को भी सुना था। उसके उपरांत सरकार ने उस अध्यादेश को स्वयं रोका था। इससे सरकार की विश्वसनीयता बढ़ी थी। सरकार को अब भी पुन: स्वयं के बनाए रास्ते पर चलने का अवसर है। लोकतंत्र में जन कल्याणकारी संस्थाओं का दायित्व है कि वे इस प्रकार के विषयों पर श्रृंखलाबद्ध रूप से निष्कर्ष प्राप्त होने तक सभी स्तरों पर खुला जन संवाद कराये।

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