मीडिया से मन की बात

मीडिया से मन की बात

Dilip Chaturvedi | Publish: Jan, 03 2019 03:58:17 PM (IST) | Updated: Jan, 03 2019 03:58:18 PM (IST) विचार

प्रधानमंत्री का नए साल के पहले दिन को इंटरव्यू के प्रसारण के लिए चुनना महज संयोग नहीं हो सकता। यह उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा ही माना जाएगा...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह तोहमत लगातार लगती रही है कि वे मीडिया से सीधी बात नहीं करते और मुश्किल सवालों का जवाब देने से बचते रहते हैं। नए साल के पहले ही दिन अपनी यह छवि तोड़ते हुए वे टीवी पर नजर आए। करीब डेढ़ घंटे लंबे इंटरव्यू में उन्होंने लगभग उन सारे सवालों के जवाब दिए, जिनको लेकर देश में बेचैनी है। हाल के विधानसभा चुनावों में तीन बड़े राज्यों से बीजेपी के सत्ताच्युत होने के बाद इस साल बाद में होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारी में बन रहे नए राजनीतिक समीकरणों के माहौल में यह इंटरव्यू खुद मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी के लिए महत्त्वपूर्ण था। इसलिए भी कि संसदीय चुनावों के नजदीक आते-आते उनकी चमक अब वैसी नहीं है जैसी साढ़े चार साल पहले केंद्र में प्रचंड बहुमत के साथ शासन की बागडोर संभालने के वक्त थी। अपने इस इंटरव्यू के बहाने उन्होंने आने वाले चुनावों के प्रचार का एक प्रकार से आगाज कर दिया। उनके बारे में लोगों की यह धारणा गलत नहीं है कि वे मीडिया का इस्तेमाल करना जानते हैं। इसके साथ ही यह भी सच है कि वे मीडिया से दूरी बनाए रखना भी जानते हैं। इस इंटरव्यू के प्रसारण के लिए नव वर्ष का पहला दिन चुनना महज संयोग नहीं हो सकता। यह उनकी वृहद् चुनावी रणनीति का हिस्सा ही माना जाएगा।

प्रधानमंत्री का इंटरव्यू एक-से-एक वाली बातचीत थी। यह पत्रकार वार्ता नहीं थी जिसमें बहुत से पत्रकार सवाल दागते हैं। यह एक सुनियोजित इंटरव्यू था जिसमें सहज सवाल थे, सहज जवाब थे। प्रमुख बात यही थी कि उनसे वे सारे सवाल सहजता से पूछे गए जो आम तौर पर उनके लिए असुविधाजनक हो सकते थे यदि पूछने वाला पड़ताल करने की नीयत वाला होता। इसलिए मोदी एक घंटे 35 मिनट लंबे इंटरव्यू में कहीं असहज हुए नहीं लगे। इंटरव्यू में उन्हें एकालाप करने का पूरा समय मिला जिसका लाभ उन्होंने खुद की और अपनी सरकार की उपलब्धियों की कहानियां कहने में उठाया। इस इंटरव्यू में इस बात की ताईद हुई कि मोदी बेहतर कम्युनिकेटर हैं।

उनके जवाबों में देश प्रेम, सेना पर गर्व जैसी भावनाओं का मुलम्मा था। उन्होंने अपने लहजे में वैसी ही विनम्रता बरती, जैसी कि किसी शासन के प्रमुख में होनी चाहिए। उनमें वे तेवर नहीं थे जो कभी उनकी या अन्य चुनावी सभाओं में दिखते थे। तब उनके तरकश के तीर जब निकलते थे तो उनके सामने लक्ष्य सत्ता को बींधना होता था। मगर इस इंटरव्यू में उनकी भूमिका सत्ता को बचाने की थी क्योंकि अब सत्ता उनकी है और अपनी सरकार के फैसलों के प्रति जनता में स्वीकार्यता बनाना स्वाभाविक रूप से उनके लिए जरूरी था। मगर अपनी सरकार के कामों की विस्तार से व्याख्या करने तक ही उन्होंने अपने को सीमित नहीं किया, बल्कि प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस पर आक्रमण करने का कोई मौका भी नहीं छोड़ा, संभवत: जिसके नेतृत्व में बन रहे महागठबंधन से उन्हें आने वाले चुनावों में सीधे भिडऩा है। असहज सवालों के मुद्दों को अपने पक्ष में कर देने की कला उन्हें बखूबी आती है।

अगले लोकसभा चुनावों को ही ध्यान में रख कर संभवत: प्रधानमंत्री ने अपने पूरे इंटरव्यू में कट्टर हिंदुत्ववादी एजेंडा से दूरी बनाए रखते हुए अपने को सौम्य छवि में प्रस्तुत किया। साथ ही युवा, छोटे कारोबारी और मध्यम वर्ग के सरोकारों की उन्होंने बातें कीं और उनके दरकते समर्थन को बनाए रखने की चेष्टा की। प्रधानमंत्री हर महीने रेडियो पर आम जनता से 'मन की बात' करते हैं। उसी तर्ज पर इस इंटरव्यू में भी वे पूरी तरह अपने मन की बात ही करते नजर आए। इसमें उन्होंने मेल-मिलाप वाले सौम्य नेता के रूप में अपने आप को प्रस्तुत करने का प्रयास किया ताकि वे मतदाताओं के मन को प्रभावित कर सकें। इसे उनके विरोधी उनकी रणनीति का हिस्सा मानेंगे। देखना है कि प्रधानमंत्री मीडिया के सामने कितना खुलते हैं? मोदी की दृष्टि स्वतंत्र मीडिया को विरोधी के रूप में देखती रही है। लोकतंत्र में मीडिया की एक भूमिका प्रतिपक्षी की भी मानी गई है ताकि शासन को आम जन के प्रति संवेदनशील बनाए रखा जा सके। देखना होगा कि इसे लेकर उनकी दृष्टि में कितना बदलाव आता है।

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