प्रसंगवश : बिजली बचत की अपील करने वाले ही कर रहे अनदेखी

विडम्बना देखिए, जो उपभोक्ताओं से बिजली बचाने का आह्वान कर रहे हैं वे खुद ही इसके प्रति गंभीर नहीं।

By: Patrika Desk

Updated: 14 Oct 2021, 08:18 AM IST

यह सर्वविदित है कि राजस्थान सहित देश के कई राज्यों में कोयले की पर्याप्त आपूर्ति के अभाव में बिजली संकट चल रहा है। यह संकट लॉकडाउन के दौरान बिजली की मांग बढऩे, कोरोना की दूसरी लहर के कारण कोयले का खनन प्रभावित होने तथा मानसून के कारण खनन की धीमी रफ्तार के चलते पैदा हुआ। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढऩे से भारतीय कंपनियों द्वारा कोयले का आयात कम करना भी बड़ी वजह है।

ऊर्जा मंत्रालय के एक आंकड़े की बात करें तो देश में 2019 में अगस्त-सितम्बर महीने में बिजली की कुल खपत 10,660 करोड़ यूनिट प्रति माह थी। यह आंकड़ा 2021 में बढ़कर 12,000 करोड़ यूनिट प्रति माह तक पहुंच गया। राजस्थान की बात करें तो यहां प्रतिदिन बिजली की औसत मांग 12,500 मेगावाट है और बिजली की उपलब्धता सिर्फ 8500 मेगावाट। एक तरफ कोयले की कमी तो दूसरी तरफ बिजली की बढ़ती खपत राज्य सरकारों के लिए दोहरी चुनौती है। कोयले की किल्लत के कारण मांग के हिसाब से बिजली उपलब्ध करने में असहाय एवं असमर्थ सरकारों को बिजली कटौती सबसे आसान उपाय नजर आया। जाहिर-सी बात है इस बिजली कटौती से राजस्थान भी अछूता नहीं है। जिला मुख्यालयों से लेकर गांव-ढाणी तक बिजली कटौती हो रही है। इतना सब करने के बाद भी सरकार को बिजली बचाने की अपील तक करनी पड़ रही है। आदेश जारी किए जा रहे हैं। अफसोजनक यह है कि आम उपभोक्ताओं के नाम अपील-आदेश जारी करने वाले ही बिजली बचत को लेकर गंभीर नहीं हैं।

विडम्बना देखिए बिजली संकट से पार पाने के लिए एक तरफ पीएमओ में मंथन चल रहा था, वहीं दूसरी तरफ राजस्थान में मुख्यमंत्री की अपील और डिस्कॉम एमडी के आदेश की खुलेआम धज्जियां उड़ रही थीं। यह सब करने वालों में कोई आम उपभोक्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा मंत्री के दफ्तर से लेकर डिस्कॉम अधिकारियों के कार्यालय तक शामिल हैं। बहरहाल, बिजली कटौती किसी के भी हित में नहीं है। प्रदेश में कुछ कोयला आधारित संयंत्र भुगतान के अभाव में बंद पड़े हैं। आवश्यक सेवाओं से संबंधित भुगतान के मसलों को सुलझाने में लेटलतीफी भी सरकार के प्रबंधन पर ही प्रश्नचिह्न लगाती है। (म.सिं.)

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