scriptTighten strong screws on black money in elections | patrika opinion चुनावों में कालेधन पर कसें मजबूत शिकंजा | Patrika News

patrika opinion चुनावों में कालेधन पर कसें मजबूत शिकंजा

राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता को लेकर सदैव सवाल उठते रहे हैं। फिलहाल राजनीतिक दलों को बीस हजार रुपए तक का नकद यानी बेनामी चंदा लेने की छूट है। चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले नकद चंदे की अधिकतम सीमा घटाकर 2,000 रुपए करने का प्रस्ताव कानून मंत्रालय को भेजा है।

Published: September 21, 2022 04:41:12 pm

चुनावों का दौर आते ही चुनाव सुधारों की चर्चा भी शुरू हो जाती है। चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल के मामले में संसद से लेकर शीर्ष अदालत तक में कई बार चर्चा हो चुकी है। लेकिन, सत्ता में जो भी रहता है, उसे राजनीति की यह बुराई शायद नजर ही नहीं आती। तभी तो अदालतों से लेकर चुनाव आयोग तक की सिफारिशें न जाने कौनसी फाइलों में जाकर बंद हो जाती हंै। चुनावों को कालेधन से मुक्त करने के लिए चुनाव आयोग ने जनप्रतिनिधित्व कानून में कई संशोधनों की सिफारिश की है। माना जा रहा है कि सिफारिशों पर विचार हुआ तो कालेधन पर एक हद तक अंकुश लग सकेगा।
राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता को लेकर सदैव सवाल उठते रहे हैं। फिलहाल राजनीतिक दलों को बीस हजार रुपए तक का नकद यानी बेनामी चंदा लेने की छूट है। चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले नकद चंदे की अधिकतम सीमा घटाकर 2,000 रुपए करने का प्रस्ताव कानून मंत्रालय को भेजा है। इससे भी अहम सिफारिश यह है कि नकद चंदा बीस प्रतिशत या अधिकतम बीस करोड़ रुपए तक ही सीमित रहे। सवाल सिर्फ चुनावी चंदे का ही नहीं है, चुनावों में बेहिसाब खर्च का भी है। वैसे भी हमारे यहां चुनाव खर्च सीमा तो दिखावा बन कर रह गई है। चुनाव में उम्मीदवारों के खर्च में पारदर्शिता लाने के मकसद से चुनाव आयोग चाहता है कि एक इकाई/व्यक्ति को दो हजार रुपए से ज्यादा के सभी खर्चों के लिए डिजिटल लेनदेन या चेक से हस्तांतरण अनिवार्य किया जाए। अभी तक, चुनाव खर्च के लिए अलग बैंक खाता खोलना निर्देशों का हिस्सा है, लेकिन आयोग इसे चुनाव संचालन नियमों का हिस्सा बनाना चाहता है। आयोग की सिफारिशें स्वागत योग्य हंै। ये सिफारिशें मान भी ली जाएं, तो भी चुनावी चंदे की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने शायद ही बंद हों। इलेक्ट्रॉल बॉन्ड स्कीम भी राजनीतिक दलों के हिसाब-किताब में पारदर्शिता के मकसद से लाई गई थी। लेकिन हकीकत तो यही है कि राजनीतिक दलों को फंडिंग कहां से और कितनी होती है, इसके ओर-छोर का पता चल ही नहीं पाता।
चुनाव सुधार के प्रावधान जब भी लागू होते हैं, उनसे खुशनुमा बदलाव की उम्मीद बनती है। लेकिन, इन प्रावधानों का उल्लंघन करने की गलियां भी सियासी दल ही निकालते हैं। हमारे यहां दलबदल रोकने के लिए कानून तो है, लेकिन दलबदल रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। चुनावी चंदे को लेकर भी लोगों के मन में यही बात बैठी हुई है कि काला धन सबसे ज्यादा चुनावों में ही काम आता है। ऐसे में जरूरत समूची राजनीति के शुद्धीकरण की है।
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