scriptTime to break away from the organization that reminds of slavery | गुलामी को याद दिलाने वाले संगठन से दूर होने का समय | Patrika News

गुलामी को याद दिलाने वाले संगठन से दूर होने का समय

अपने खिलाडिय़ों द्वारा नित नए शिखर छूना उल्लास और बधाइयों का विषय है, पर इस आयोजन का नाम कॉमनवेल्थ खेल और अंतर्निहित भाव राजशाही नेतृत्व की दासता का होना कचोटता जरूर है। गुलामी के बुरे दिनों की स्मृति को मिटाया नहीं जा सकता, पर इतने गौरव के साथ इसे ढोने का मोह छोडऩा ही होगा।

Published: August 05, 2022 07:18:35 pm

सुधीर मोता
लेखक और
विचारक

अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में भारतीय खिलाडिय़ों को सफलता मिल रही है। राष्ट्रमंडल खेलों (कॉमनवेल्थ गेम्स) में भी हमारा यह अभियान जारी है। यह आजादी का अमृत वर्ष भी है। भारत अधिक उत्साह और आशा से इस बार के खेलों में भाग ले रहा है। अंतरराष्ट्रीय खेलकूद प्रतियोगिताओं में सफलता अर्जित करना देश के गौरव को बढ़ाता है और हर भारतीय को इससे प्रसन्नता ही होगी। प्रत्येक प्रतियोगिता हमें अन्य बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करती है। हमारा उत्साह बढ़ता है और हम बहुत कुछ सीखते भी हैं। असली मुद्दे पर आने के लिए हम कॉमनवेल्थ के बारे में थोड़ा जान लेते हैं। कॉमनवेल्थ दरअसल में है क्या? कॉमनवेल्थ देश संख्या में 54 हैं । इनमें कॉमन क्या है? इनकी निर्धनता? इनका अविकसित या विकासशील होना? इनमें से बहुत से देशों में यह बात तो कॉमन है। एक और सबसे बड़ी समानता यह है कि ये सभी देश एक समय ब्रिटिश शासन के अधीन रह चुके हैं अर्थात ये सभी एक समय ब्रिटिश गुलामी में थे। यूं कॉमनवेल्थ और भी कई हैं। जैसे अमरीका में उनके अपने ही राज्यों का कॉमनवेल्थ है। उनका फिलीपींस, पोर्टोरिको तथा उत्तरी मरीन आइलैंड के साथ भी कॉमनवेल्थ समूह है। सोवियत संघ का कॉमनवेल्थ सबसे ताजा समूह है, जो 2008 में संघ के टूटने से बना। यह एकदम अलग मामला है, जिस कॉमनवेल्थ की हम बात कर रहे हैं, वह 54 राष्ट्रों का समूह है, जिसमें कुछ अपवादों को छोड़ कर शेष ब्रिटिश उपनिवेश रह चुके हैं। यूं ये विश्व की एक तिहाई आबादी और चौथाई भूमि के देश हैं। ब्रिटिश महारानी इस समूह की अध्यक्ष होने के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, बारबडोस सहित कुल 15 देशों की भी महारानी हैं, जो इस संगठन के सदस्य हैं। इस संस्था का ध्वज आप देखें तो पाएंगे कि एक गोल छल्ले के बीच में ग्लोब है। इस छल्ले का एक हिस्सा खुला हुआ है। अर्थात मुक्ति की ओर इशारा तो है, किंतु मात्र 5 प्रतिशत। बरसों बरस से यह छल्ला इससे अधिक नहीं खुल पाया है। सदस्य राष्ट्र भी अड़ोसी-पड़ोसी नहीं, पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों से हैं।
महारानी एलिजाबेथ ने इस समूह का कार्यभार संभालते समय कहा था ..'कॉमनवेल्थ का पूर्व के साम्राज्यों से कोई साम्य नहीं है। यह एक नया विचार है जो मित्रता वफादारी और स्वतंत्रता एवं शांति की मनुष्य की सर्वोत्तम कामना पर आधारित है। आप शब्दों पर ध्यान दीजिए। वफादारी क्या है? स्वतंत्रता और शांति की कामना आप करते ही रहिए और उसी ध्वज के तले विचरण कीजिए। हमें 75 साल हो चुके हैं आजाद हुए। क्या हमें अब भी कोई उंगली थाम कर बाल मंदिर स्कूल में छोडऩे और लेने आएगा? क्या 54 देश अब भी ब्रिटिश महारानी के ही नेतृत्व में अपने विकास और उत्थान के सपने पूरे कर पाएंगे। हम तो इतना जानते हैं कि अपने स्वयं के साधनों और अपनी प्रजा की शक्ति के बिना कोई भी देश आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। कॉमनवेल्थ देशों का आप ओलंपिक खेलों की पदक तालिका में स्थान देख लीजिए, उत्तर मिल जाएगा । हम यह भी जानते हैं कि सन 1607 से 1783 तक ब्रिटेन के अधीन रहा अमरीका इस समूह का सदस्य नहीं है। कॉमनवेल्थ खेलों का सर्वोच्च पदकधारी ऑस्ट्रेलिया अमरीका से बीस प्रतिशत से भी कम पदकों के साथ आठवें और स्वयं यूनाइटेड किंगडम अपने चारों घटकों को मिला कर ही बहुत बड़े अंतर के साथ दूसरे नंबर पर है। हमारा स्वयं का प्रदर्शन भी अब जाकर कुछ सुधरा है, तो उसका श्रेय हमारी अपनी लगन और संकल्प को ही जाता है। अपने खिलाडिय़ों द्वारा नित नए शिखर छूना उल्लास और बधाइयों का विषय है, पर इस आयोजन का नाम कॉमनवेल्थ खेल और अंतर्निहित भाव राजशाही नेतृत्व की दासता का होना कचोटता जरूर है। गुलामी के बुरे दिनों की स्मृति को मिटाया नहीं जा सकता, पर इतने गौरव के साथ इसे ढोने का मोह छोडऩा ही होगा।
समय आ गया है उपनिवेशवाद की इस अंतिम स्मृति को इतने जोर-शोर और शिद्दत से ढोने की बजाय हम इससे बाहर निकल आएं। यह उन विकसित देशों को भी एक संकेत होगा, जो अपने पड़ोस के कमजोर देशों को नए तरीके से अपने मातहत लाने का हिंसक जतन कर रहे हैं। यदि इस तरह का कोई संगठन रहता भी है, तो वह उपनिवेशवाद के गंभीर अपराध की क्षमायाचना या प्रायश्चित की तरह हो, न कि नेतृत्व की तरह। आजादी के अमृत वर्ष में देश के शहीदों को इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या होगी ?
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