रोजगार बढ़ाने-गरीबी मिटाने के साथ मांग सुनिश्चित करने का वक्त

- अर्थव्यवस्था के सकारात्मक लक्षणों से संतोष तभी हो सकता है जब असमानता को दूर करने के लिए बड़ी पहल की जाए। वरना 2005 से 2015 के बीच 27 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाले जाने का फायदा बेकार चला जाएगा।

By: विकास गुप्ता

Updated: 26 Jan 2021, 10:59 AM IST

अरविंद मायाराम, पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव

यों तो सरकारों को अपनी हर नीति और कार्यक्रम का दैनंदिन आकलन आमजन के लिए उन नीतियों की उपयोगिता के आधार पर ही करना चाहिए, लेकिन गणतंत्र दिवस ऐसा खास मौका है जब इस कसौटी को जरूर आजमाया जाए। पिछले साल आई वैश्विक आपदा के असर को सीमित करने के लिए बहुत कुछ ऐसा है जो सरकारें कर सकती हैं। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट बताती है कि विकासशील देशों में गरीबी बढ़ी है। चिंता की बात यह है कि भारत में सबसे ज्यादा गरीब बढ़े हैं। यानी हम नाइजीरिया के भी नीचे के स्तर पर चले गए हैं। हमने इस दौरान ऐसी नीतियां नहीं बनाईं, जिनसे लोगों की तकलीफ दूर हो और उन्हें गरीबी की रेखा के नीचे जाने से रोका जा सके।

भारतीय अर्थव्यवस्था ने हाल के कुछ दशकों में बड़े बदलाव देखे हैं। 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारवाद ने देश को बहुत कुछ दिया। अर्थव्यवस्था में सरकार का दखल न्यूनतम हुआ। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी जैसी योजनाओं ने गरीबी को दूर करने में बड़ी भूमिका निभाई। 'ऑक्सफोर्ड गरीबी और मानव विकास रिपोर्ट' में स्वीकार किया गया कि भारत ने गरीबी दूर करने के लिहाज से इस दौरान बड़ी छलांग लगाई है। 2005 से 2015 के बीच 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर लाए जा सके। भारत एक गरीब और धीमे विकास वाले देश की श्रेणी से बाहर निकल कर दुनिया की सर्वाधिक तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था में बदल सका। 2016 के वल्र्ड इकनॉमिक आउटलुक के मुताबिक, उस समय तक भारत और अमरीका वैश्विक अर्थव्यवस्था के दो सबसे मजबूत स्तम्भ बन चुके थे।

छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव तो हर देश की अर्थव्यवस्था में आते हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था को नोटबंदी, जीएसटी व्यवस्था और फिर पिछले साल के लंबे और संपूर्ण लॉकडाउन के रूप में एक के बाद एक लगातार कई झटका लगे। लॉकडाउन से तो आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह ध्वस्त ही हो गईं और आजादी के बाद से देश में सबसे बड़ी आर्थिक गिरावट दर्ज हुई।

अर्थव्यवस्था में सकारात्मकता आने को लेकर दावे तो कई किए जा रहे हैं लेकिन यह न भूलें कि यह वापसी दस प्रतिशत नकारात्मक वृद्धि के स्तर से होगी। अगर अब अर्थव्यवस्था 6 प्रतिशत की रफ्तार से भी बढ़ती है तो आकार में 2019 के मुकाबले पीछे ही होगी। अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो जाना चाहिए। माना जा रहा था कि अर्थव्यवस्था में लोगों की विश्वास बहाली के लिए टीकाकरण सबसे बड़ा कदम होगा, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था के लौटने में कम से कम दो साल का समय लग जाएगा। सबसे अहम है कि इन दिनों देश में आर्थिक असमानता बहुत बढ़ गई है। अर्थव्यवस्था के सकारात्मक लक्षणों से संतोष तभी हो सकता है जब असमानता को दूर करने के लिए बड़ी पहल की जाए। वर्ना 2005 से 2015 के बीच 27 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाले जाने का फायदा बेकार चला जाएगा।

शेयर बाजार के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचने से हमें हासिल क्या होगा और क्या यह स्थायी है? दरअसल, इसका कारण विकसित देशों में राजकोषीय प्रोत्साहन के लिहाज से उठाए गए बड़े कदम और वहां की लिक्विडिटी है। जैसे ही अमरीका में ब्याज दर में बढ़ोतरी होगी या कोई बड़ा बदलाव होगा, बाजार अपनी यह उछाल खो देगा। सरकार बार-बार श्रम सुधारों की बात करती है। लेकिन जब तक रोजगार पैदा नहीं होगा, इसका कोई मतलब ही नहीं है। इस दौरान देश के शीर्ष कार्पोरेट की कमाई तो बढ़ गई, लेकिन उससे हम आश्वस्त कैसे हो सकते हैं? बड़ी संख्या में एमएसएमई बंद हुए हैं, बाकी भी तकलीफ में हैं। लोगों के वेतन घट गए हैं। समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं, नौकरियां लौटी नहीं हैं। भारत सरकार को आम बजट के माध्यम से जरूरी कदम उठाने होंगे। बजट में सुनिश्चित करना होगा कि मांग लौटे। साथ ही नए सिरे से उत्पादन बढ़े और नौकरियां पैदा हों।

republic day parade
विकास गुप्ता
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned