वैश्विक स्वास्थ्य एजेंडा तय करने का वक्त

सम्पन्नता के बाबजूद कोई भी देश कोविड जैसे अन्य खतरनाक संक्रमणों से अकेले लड़ाई नहीं लड़ सकता है। आज वैश्विक प्राथमिकताओं को नए सिरे से निर्धारित करने का उपयुक्त समय आ गया है।

 

By: shailendra tiwari

Updated: 02 Aug 2020, 02:03 PM IST

डॉ. अजय खेमरिया, लोेक नीति विश्लेषक

यह बात सही है कि सामरिक सामर्थ्र्य हासिल करना प्रत्येक राष्ट्र की स्वाभाविक आवश्यकता है। लेकिन सवाल यह है कि शीत युद्ध के खात्मे और नई अर्थ केन्द्रित अर्थव्यवस्था के वैश्विक आकार लेने के बाद क्या दुनिया में सामरिक संघर्ष और शस्त्रों की कमी नहीं होनी चाहिए थी? और सवाल यह भी कि ग्लोबल इकॉनमी, विश्व ग्राम और वैश्विक आरोग्य एवं कल्याण के अंतरराष्ट्रीय स्तर के संगठनों से भरी मौजूदा विश्व व्यवस्था की वास्तविक प्राथमिकताएं आखिर हैं क्या?

पूंजीवाद और साम्यवाद के ध्रुवों के विलोपित हो जाने के बावजूद क्या आज की दुनिया पूंजीवादी देशाों के नए सुगठित और सुनियोजित बाजारवाद के चंगुल में फंसी हुई नही है? क्या बदलती ग्लोबल वैश्विक व्यवस्था में समानांतर रूप से सैन्य व्यय कम होकर नागरिक कल्याण सर्वोपरि प्राथमिकताओं में नही आने चाहिए थे। ये सब सवाल वाजिब हैं लेकिन ऐसा हुआ नही है ।
कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया की प्राथमिकताओं को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। ऐसे में कोरोना से कराहती मानवता के भावी कल्याण का विकल्प आज समवेत रूप से हथियारों की होड़ को प्रबंधित करने का भी हो सकता है। क्योंकि ताजा अनुभव यह भी प्रमाणित करते है कि कोई भी देश अपनी पूंजी या प्रोद्योगिकी के बल पर अकेले कोरोना जैसी महामारियों से नही जीत पायेगा। इस मौजूदा महामारी से निबटने में नाकाम दुनिया की स्थिति जनआरोग्य के मामले में 100 साल पुरानी ही इबारत के पुनर्वाचन जैसी ही लगती है। तकनीकी के उन्नत पक्ष ने इस स्थिति को और भी खतरनाक बना दिया है।

1918 में फैली वैश्विक इन्फ्लुएंजा महामारी से करीब 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी और एक तिहाई आबादी बीमार रही। आज दुनिया की आबादी 4 गुना बढ़ चुकी है और एक व्यक्ति संक्रमण वाहक के रूप में 36 घण्टे में विश्व के किसी भी कोने में पहुंच सकता है। कोविड 19 अगर काबू में नही आ सका विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि यह आंकड़ा 15 करोड़ तक जा सकता है।
प्रतिष्ठित जर्नल लासेन्ट ने अमेरिकी के जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के शोध को जगह देते हुए बताया है कि करीब पांच महीने बाद दुनिया में 12 लाख बच्चे और 57 हजार माँ कोरोना के सह सबंधित प्रभावों के चलते मौत के मुँह में जा सकते है। इसी विश्वविद्यालय द्वारा जारी "ग्लोबल हैल्थ सिक्योरिटी रपट"में बताया गया है कि पूरी दुनिया में कोविड 19 जैसी महामारी से निबटने का कोई प्रमाणिक सिस्टम मौजूदा नही है।

इस रपट मे कोई भी देश 100 में से 40.2 स्कोर को पार नही कर पाया, यानी किसी भी देश के पास वैश्विक महामारियों एवं संक्रमण से अपने नागरिकों को बचाने के लिए कोई कारगर तंत्र उपलब्ध ही नही है।तो क्या दुनिया को वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा"को लेकर एक नई साझी औऱ समावेशी नीति की ओर नहीं बनानी चाहिए? यह भी समझना होगा कि अमेरिका औऱ रूस जहाँ कोरोना से सर्वाधिक मौत हुई है वे दुनिया के सबसे बड़े हथियार निर्माता और निर्यातक मुल्क है। इनके पास कुल 3750 एक्टिव परमाणु बम्बों में से 3250 का जखीरा है, और दुनियां के लगभग हर मुल्क में इन देशों की फैक्ट्रियों से निकले अस्त्र शस्त्र मौजूद है। हकीकत यह है की दुनिया में हथियारों का बाजार लोकस्वास्थ्य से आगे इसलिये महत्वहीन है क्योंकि यह अमेरिका, रूस,फ्रांस और यूरोप के एकाधिकार को बनाये हुए है।स्वीडन की स्वतंत्र संस्था "सीपरी" के अनुसार दुनिया में हथियारों का कारोबार 1917 बिलियन डॉलर का है। इस अथाह कारोबार में 100 बड़ी कंपनियां हैं इनमें 43 अकेले अमेरिका 10 रूस और 27 यूरोपीय मुल्कों की है।

अब इस कारोबार के दूसरे पक्ष को भी समझना चाहिये-भारत ने 27.86 लाख करोड के 2020-21 के बजट में से 3.5लाख करोड़ की राशि रक्षा मद के लिये रखी जबकि लोकस्वास्थ्य पर 2019 में हमारा कुल खर्च 64999 करोड़ ही था। यह जीडीपी का मात्र एक फीसदी है और रक्षा पर यह आंकड़ा 2.2 फीसदी है। पाकिस्तान में यह खर्च 510 और बांग्लादेश में 4866 करोड़ था।

स्पष्ट होता है कि दुनियाभर में हथियारों की होड़ केवल अपने नागरिकों की सीमाई मुल्कों से रक्षा के लिए नही है। असल मे यह चंद धनी मुल्कों औऱ कारोबारी घरानों के इशारों पर नाचती वैश्विक व्यवस्था का बदनुमा पक्ष भी है। सवाल बुनियादी रूप से यही है कि विश्व मे नागरिकों की सुरक्षा हथियारों के बल पर की जाना अधिक जरूरी है या महामारियों से? यानी कोविड औऱ ऐसे ही

अवश्यंभावी संक्रमण से मानवता को बचाने के लिए वैश्विक स्वास्थ्य एजेंडा सुस्थापित करने का वक्त नही आ गया है? क्या जिन मुल्कों ने हथियारों के बाजार सजाए है वे इस संक्रमण से बच सके है ? आर्थिक सम्पन्नता के बाबजूद कोई भी देश आज या भविष्य में कोविड जैसे अन्य खतरनाक संक्रमणों से अकेले लड़ाई नहीं लड़ सकता है। आज वैश्विक प्राथमिकताओं को नए सिरे से निर्धारित किये जाने का सबसे उपयुक्त समय आ गया है। जितना कठिन मानवता को इन संक्रमित हमलों से बचाया जाना है शायद राफेल और एस 400 का विनिर्माण औऱ निर्यात उतना चुनौती पूर्ण नहीं है। राष्ट्रीय हित औऱ सामरिक सुरक्षा के महत्व को अस्वीकार नही किया जा सकता है।

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