दो गलत मिलकर एक सही नहीं बन सकते

दो गलत मिलकर एक सही नहीं बन सकते

Navyavesh Navrahi | Publish: Jul, 13 2018 02:39:34 PM (IST) विचार

ऐसी बहसें हमें कहीं नहीं ले जाती हैं। अगर उद्देश्य नए अपराधी पर दबाव डालने का हो तो यह संतुलन बैठाने वाली कला उसे कमजोर कर देती है। उद्देश्य अगर कमज़ोरियों को सामने लाना है तो यह सदृश्यता उसे न्यून कर देती है।

- करण थापर
वरिष्ठ पत्रकार और टीवी प्रस्तोता

बिल क्लिंटन की नई किताब 'द प्रेसिडेंट इज मिसिंग' को पढ़ते हुए मैं अचानक कुछ ऐसे वाक्यों पर ठिठक गया जो भारत पर बिलकुल वैसे ही लागू होते हैं जैसा अमरीकी जनता के ऊपर होते होंगे। हमें शायद अंदाजा ही नहीं है कि हम आपस में किस हद तक समान हैं।

पुस्तक में अमरीकी पत्रकारिता के बारे में क्लिंटन लिखते हैं: 'जब आपको किसी व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ आरोपों का पहाड़ खड़ा होता दिख रहा हो तो दूसरी तरफ से भी आपको एक तिनका खोज लाने की जरूरत पड़ती है जिसे पहाड़ बनाया जा सके और इस तरह पक्षपात के आरोप से बचा जा सके। तिनके से बनाए ऐसे पहाड़ों के कई लाभ होते हैं: शाम की खबरों की ज्यादा कवरेज, लाखों रीट्वीट और टॉक शो में बहसबाजी के लिए ज्यादा मसाला। जब वास्तविक पहाड़ और तिनके का आकार एक जैसा दिखने लगे, तब सरकारें और उनके विरोधी उन मसलों पर वक्त और ऊर्जा लगाना बंद कर देते हैं जिनका सरोकार अधिसंख्य जनता से होता है। यहां तक कि हम भी यदि उन मसलों पर कुछ करने का प्रयास करते हैं तो घूम-फिर कर उस दिन की सुर्खियों में फंस जाते हैं।' इस वाक्य को एक भी शब्द की हेरफेर किए बगैर भारतीय पत्रकारिता पर लागू किया जा सकता है। सवाल के बदले सवाल पूछने की इस आदत का हम भयंकर शिकार हैं। यह प्रवृत्ति भारतीय पत्रकारिता के लिए अभिशाप है।

इसकी जो कीमत चुकानी पड़ती है, क्लिंटन उसका भी जवाब देते हैं और एक बार फिर जो बात वह अमरीका के बारे में लिखते हैं वह भारत पर बराबर लागू होती है: 'यह ज्यादा हताशा, ध्रुवीकरण, पक्षपात, बुरे निर्णय और चूक गए अवसरों को जन्म देता है। इस काम में कोई वास्तविक उपलब्धि मिलने की गुंजाइश हुए बगैर ही ज्यादा से ज्यादा नेता आक्रोश और असंतोष को हवा देते जाते हैं जबकि उन्हें आग बुझाने का काम करना था। हर कोई जानता है कि यह गलत है लेकिन तात्कालिक लाभ-लोभ का संवरण नहीं कर पाता। ऐसा करते हुए हम मानकर चलते हैं कि हमारा संविधान, हमारी सार्वजनिक संस्थाएं और नियम-कानून हर नए हमले को झेल पाने में सक्षम होंगे और इससे हमारी आजादी व जीने के तरीकों पर कोई स्थायी आंच नहीं आएगी।' इसके पीछे दरअसल एक फर्जी तुलना गढ़ने की ललक काम करती है। मसलन, हम यदि किसी पार्टी का गलत कृत्य सामने लाना चाहते हैं तो दूसरे पक्ष की कोई गलती खोजकर उससे उसे संतुलित भी कर देना चाहते हैं। हमें लगता है कि संतुलन और तटस्थता यही है। हम गलती से इसी को अच्छी पत्रकारिता मान बैठते हैं।

इसीलिए जब हम 2002 के गुजरात के कत्लेआम का जिक्र करते हैं तो 1984 में सिक्खों की हत्या का मुद्दा भी उठाना पड़ जाता है। हमें यदि नरेंद्र मोदी के जुमलों में गड़बड़ दिख रही है तो हम उसे राहुल गांधी के ट्वीट की आलोचना कर के संतुलित कर देते हैं। हम जब एनडीए पर संस्थाओं की उपेक्षा का आरोप लगाते हैं तो इंदिरा गांधी का साथ में जिक्र करना नहीं भूलते जिन्होंने बिलकुल यही काम किया था।

ऐसी बहसें हमें कहीं नहीं ले जाती हैं। अगर उद्देश्य नए अपराधी पर दबाव डालने का हो तो यह संतुलन बैठाने वाली कला उसे कमजोर कर देती है। उद्देश्य अगर कमज़ोरियों को सामने लाना है तो यह सदृश्यता उसे न्यून कर देती है। इस प्रक्रिया में हम लगातार एक बात को भुलाए रहते हैं कि दो गलत मिलकर एक सही नहीं बना सकते।

इसका एक अनचाहा नतीजा यह होता है कि हम एक ऐसी छवि निर्मित कर देते हैं कि हम में तो सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं है यानी हम बुरे हैं तो ठीक हैं। यह छवि न सिर्फ हमारी व्यवस्था को बल्कि हमें भी निरुत्साहित करती है।

हम यह भूल जाते हैं कि राहुल गांधी और कांग्रेस पर वार किए बगैर भी हम मोदी और बीजेपी की आलोचना कर सकते हैं। हम भूल जाते हैं कि वर्तमान के पापों का जिक्र अतीत के आह्वान के बगैर भी किया जा सकता है। कभी-कभार तो ऐसा होता है कि संतुलन बैठाने के चक्कर में गड़बड़ी हो जाती है। ऐसे मामलों पर निगाह रहनी चाहिए वरना हमारी पत्रकारिता हवा में हर ओर मुक्का भांजती रह जाएगी और उसके पास कुछ कहने को नहीं होगा। पता नहीं क्लिंटन का अमरीका इस संकट को कैसे हल करेगा लेकिन उनकी किताब बताती है कि वहां इस बात का कम से कम अहसास तो है। हम लोग तो अभी इस शुरुआती चरण पर भी नहीं पहुंच सके हैं। पहुंचे भी होंगे तो न हम इसे स्वीकार करते हैं और न ही इस बारे में बात करते हैं।

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