त्याग से होता है आत्मा का पोषण

कोरोनाकाल ने सबको यह अच्छी तरह समझा दिया है कि हमारे पास जो कुछ है, ईश्वर की ही धरोहर है। हमें संरक्षक बनकर ही इस धरोहर को न केवल सम्भालना है बल्कि उसका जनहित में उपयोग भी करना है।

By: Prashant Jha

Published: 20 May 2020, 02:37 PM IST

आर.के. विज , छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी

उपनिषद अनेक हैं परन्तु, उनमें 18 प्रमुख माने जाते हैं। उन 18 उपनिषदों में दो सबसे छोटे हैं जिनमें ईशोपनिषद एक है, जिसमें 18 मंत्र हैं। पहले उपनिषद का अर्थ समझते हैं। ‘उप’ का अर्थ नजदीक, ‘सद्’ का मतलब बैठना और ‘नि’ का मतलब निष्ठापूर्वक! अर्थात् गुरु के सानिध्य में बैठकर ज्ञान की चर्चा करना। विनोबा जी ने कहा है कि परिषद में लोग चारों ओर बैठते हैं और वहॉं ब्रॉडकास्ट होता है। उपनिषद यानी गुरू के निकट सानिध्य में बैठकर जहॉं ज्ञान की चर्चा होती है, वहॉं होता है डीपकास्ट। अर्थात्, उपनिषद में हमें गहराई में डुबकी लगाने की कला सिखाने को मिलती है। ईशावास्यं एक पूर्ण उपनिषद है, जिसमें समग्र जीवन का दर्शन पेश किया गया है। ईशोपनिषद छोटा होने के बावजूद भी इसमें व्यापक अर्थ भरा है। ईशोपनिषद का पहला मंत्र है-

ईशावास्यमिदं सर्वम् यत् किं च जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भुंजीथाः मा गृधः कस्यस्विद धनम्।।

अर्थ- जगत में जो कुछ भी जीवन है, वह ईश्वर का बसाया हुआ है। इसलिए उसके नाम से त्याग करके, तू (यथाप्राप्त) भोगता जा। किसी के भी धन के प्रति, वासना न रख। हम ईश्वर को मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरूद्वारा में बैठाकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं। तीर्थ स्थानों पर घूम-घूम कर ईश्वर को ढूॅंढते है परन्तु, ईश्वर तो सर्वव्यापी हैं। वह सब दूर बसा है। एक भी अणु ऐसा नहीं, जहॉं उसकी हस्ती न हो। पूरी सृष्टि में उसकी सत्ता काम कर रही है। कोरोनाकाल ने सबको यह अच्छी तरह समझा दिया है कि हमारे पास जो कुछ है, ईश्वर की ही धरोहर है। हमें संरक्षक बनकर ही इस धरोहर को न केवल सम्भालना है बल्कि उसका जनहित में उपयोग भी करना है।

ऋषि कहते हैं ‘यत् किं च’ यानी जो कुछ भी है ‘जगत्यां जगत्’ जगत् में जीवनवान, वह सब उसी से व्याप्त है। वास्तव में एक मात्र ईश्वर की सत्ता सर्वत्र व्याप्त है, बाकी जहॉं कहीं भी सत्ता दिखती है वह सब आभासिक है। आभास को हटाना होगा, तब ‘ईशावास्यं इदं सर्वम्’ का रहस्य आत्मसात् होगा। उस रहस्य को आत्मसात् करने के लिए ऋषि ने दो व्यवहार सूत्र पेश किये हैं-‘‘तेन त्यक्तेन भुंजीथाः’’ एवं ‘‘मा गृधः कस्यस्विद धनम्’’। दोनों ही सूत्र सारगर्भित हैं। पहले का अर्थ है-त्याग करके भोग करो। शरीर सेवा का साधना है, साधना का माध्यम है। उस साधन को कार्यक्षम्य रखना है तो उसे भोग करना होगा। किन्तु, ख्याल रहे कि हम जीने के लिए खाते हैं, खाने के लिए नहीं जीते। जीने के लिए खाने में संयम जरूरी है। जितनी देहबद्धता कम, उतना आत्म-सान्निध्य अधिक। त्याग से आत्मा का पोषण होता है, भोग से शरीर का शोषण होता है। जीवन में त्याग-भोग का समन्वय जरूरी है।

विनोबा जी ने कहा है-जीवन यानी दो भाग त्याग और एक भाग भोग। अतः ऊपर त्याग, नीचे त्याग और बीच में भोग। रविन्द्रनाथ टैगोर जी ने अपने विश्लेषण में कहा है ‘‘त्याग-भोग के सामन्जस्य से ही पूर्ण शक्ति उत्पन्न होती है। अतः त्याग की आवश्यकता है। त्याग अपने को रिक्त करने नहीं, पूर्ण करने। त्याग का अर्थ है कि समस्त के लिए अंश का त्याग, नित्य के लिए क्षणिक का त्याग, प्रेम के लिए अहंकार का त्याग, आनंद के लिए सुख का त्याग। ऋषि कहते हैं जब तक इच्छा, कामना, वासना छूटती नहीं, तब तक त्याग सधता नहीं।

गांधीजी सेवाग्राम आश्रम के एक अंतेवासी ने उन्हें पूछा-बापू, आपको तो देशकार्य के लिए अधिकतर बाहर रहना होता है और आपकी गैरहाजरी में हमें छोटे-बड़े कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं कैसे समझें, हमारे वे निर्णय ठीक हुए कि नहीं? गांधीजी ने कहा, अरे, उसमें कौन-सी बड़ी बात है। जिस बात में आपको त्याग करना पड़ता है, वह निर्णय सही।

त्याग आध्यात्मिक जीवन का शिखर है। सब वहॉ पहुॅंच नहीं सकते। आवश्यकतायें कम-से-कम होना सुखी जीवन की राह है। इसीलिये ईश्वर ने जो कुछ हमें दिया है, उसका अधिक-से-अधिक अंश समाज को अर्पण करें। सम्पत्ति के संरक्षक बने, मालिक नहीं। मालिक केवल ईश्वर हो सकता है। हम इस दुनिया में चार दिन के मेहमान बनकर आये हैं। इसलिये जो कुछ भी ईश्वर देता है उसे दोनों हाथों से लुटाते चलों वह भी दान की भावना से नहीं, उपकार करने की भावना से नहीं, ऋण मुक्ति की भावना से, दान भावना अंहकार को पुष्ट करती है। ऋण मुक्ति की भावना नम्र बनाती है, जो कुछ भी है उसी का है, ‘‘ईशावास्यमिंद सर्वम्’’।

दूसरे सूत्र व्यवहार ‘‘मा गृधः कस्यस्विद धनम्’’ का अर्थ है, किसी के भी धन की वासना मत रख। अर्थात् लोभ मनुष्य का एक नंबर का शत्रु है। दूसरों का धन हड़पने वाली वृत्ति को गृधवृत्ति कहते हैं। ‘‘मा गृधः’’ यानी लोभ मत कर, तृष्णा मत बढ़ाओं! लोभ, तृष्णा मनुष्य को बेचैन करते हैं। भगवान बुद्ध ने तृृष्णा को दुःख का मूल बताया है। भोग, लोभ मृत्यु है। त्याग संतुष्टि अमृत है। इस मंत्र के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए गांधीजी ने कहा है कि सभी उपनिषद और अन्य धर्मग्रन्ध यदि अचानक दुर्घटना में जलकर खाक हो जायें और ईशावास्य का एक-मात्र प्रथम मंत्र स्मृति में कायम रह जाये तो उतने से ही हिन्दू धर्म सदा के लिए जिंदा रहेगा।

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