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ब्रिटेन में चुनाव : राजनीतिक फुटबॉल बना प्रवासन का मुद्दा

ब्रिटेन की प्रवासन रोकने की सभी नीतियां अब तक ‘तुगलकी’ और विफल साबित हुई हैं, फिर चाहे वह ब्रेक्जिट हो या ‘स्टॉप द बोट्स’ मुहिम। महंगाई और रोजगार जैसे प्रमुख मुद्दोंं को भी अब प्रवासियों व शरणार्थियों की बढ़ती संख्या से ही जोड़ कर देखा जा रहा है। इस बात को समझना होगा कि प्रवासन का यह मुद्दा ब्रिटेन तक सीमित नहीं है।

जयपुरJun 28, 2024 / 08:14 pm

Gyan Chand Patni

मानवाधिकार कानून की शिक्षक डॉ. हीथर एलेंसडोटिर और ‘अमरीका बनाम अमरीका’ पुस्तक के लेखक द्रोण यादव का ब्रिटेन के राजनीतिक परिदृश्य पर एक विश्लेषण
क्रिकेट और फुटबॉल दोनों के प्रति दीवानगी रखने वाला ब्रिटेन इन दिनों बड़ा व्यस्त है। इन दोनों ही खेलों की बड़ी प्रतियोगिताओं का आयोजन हो रहा है। एक ओर क्रिकेट विश्व कप तो दूसरी ओर फुटबॉल यूरो कप। इन दोनों खेलों के बीच चुनाव का आकर्षण भी कम नहीं है। इस बार चुनाव में प्रवासन का मुद्दा भी केंद्र में है। यह मुद्दा ब्रिटेन के सभी राजनीतिक दलों की ‘राजनीतिक फुटबॉल’ बना हुआ है जिसे वे जब चाहें दूसरे को ‘पास’ कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। चुनाव की अंतिम डिबेट में ऋषि सुनक और कीर स्टार्मर आमने सामने थे। इस दौरान अन्य मुद्दों के साथ प्रवासन व शरणार्थियों के मुद्दे पर भी तीखी बहस की। ब्रिटेन के चुनाव में अब कुछ दिन ही शेष हैं।
आम धारणा यह बन चुकी है कि कंजर्वेटिव पार्टी के 14 वर्ष के शासन के बाद इस बार लेबर पार्टी सत्ता में आने में कामयाब रहेगी। प्रवासन का मुद्दा दशकों से ब्रिटेन की राजनीति के लिए एक यक्ष प्रश्न रहा है। यहां के नागरिक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि वैध-अवैध रूप से ब्रिटेन में निरंतर बड़ी संख्या में आ रहे लोगों से सामाजिक ताना-बाना गड़बड़ा रहा है। साथ ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा, आवास व शिक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। 2016 में यूरोपीयन यूनियन छोडऩे (ब्रेग्जिट)के लिए हुए जनमत संग्रह में भी प्रवासन प्रमुख मुद्दा था। अन्य यूरोपीय देशों से ब्रिटेन आने वाले लोगों की मुक्त आवाजाही रोकने की मांग ने ब्रेग्जिट रेफरेंडम में अहम भूमिका निभाई। 52 फीसदी प्रतिभागियों ने ईयू से अलग होने का समर्थन किया। ब्रेक्जिट समर्थकों का दावा था कि इससे ब्रिटेन को अपनी सीमाओं को पूरी तरह नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। ब्रेक्सिट समर्थकों का यह दावा था कि यूरोपीयन यूनियन से अलग होने के बाद अन्य यूरोपीय देशों से ब्रिटेन में लोगों की मुक्त आवाजाही समाप्त हो सकेगी, हालांकि प्रवासन जारी रहा। पिछले माह जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2022 में 764000 और 2023 में 68500 लोगों का आव्रजन हुआ। सरकारी आंकड़े यह भी बताते हैं कि 2024 के प्रथम चार महीनों में विद्यार्थियों के आश्रितों के आवेदन में 7९ प्रतिशत की कमी के साथ 30000 विद्यार्थी वीजा में कमी आई है, जबकि स्वास्थ्य व देखभाल क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के आश्रितों के आवेदन में 58 प्रतिशत तक की कमी आई है। इस गिरावट का एक मुख्य कारण यूक्रेन युद्ध में मानवीय आधार पर वीजा हासिल करने वाले लोगों की संख्या में कमी आना भी थी।
कुछ विशेषज्ञों की मानें तो ब्रिटेन में प्रवासियों का आना कई तरह से लाभकारी भी होता है। प्रवासन पर हुए कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि विदेशी श्रमिकों का वेतन या रोजगार के स्तर पर नगण्य प्रभाव पड़ता है। प्रवासन में वृद्धि से सार्वजनिक सेवाओं की मांग में बढ़ोतरी होती है, प्रवासी टैक्स भी प्रदान करते हैं। लेबर पार्टी ने कंजर्वेटिव पार्टी की रवांडा नीति को बदलने का वादा किया है जिसके अनुसार ब्रिटेन में शरण मांग रहे शरणार्थियों को जबरन रवांडा भेज दिया जाना था। उधर रिफॉर्म पार्टी के निगेल फराज हैं जो ब्रिटेन में प्रवासन को शून्य करने की वकालत करते हैं। उनका अच्छा खासा असर इसलिए भी है क्योंकि उनकी पार्टी का गठन ब्रेक्जिट के दौरान ही हुआ। वह शुरू में ब्रेक्जिट पार्टी कहलाई लेकिन फिर बाद में इसका नाम बदल कर रिफॉर्म पार्टी कर दिया गया। इन्हीं निगेल फराज ने ब्रिटेन चुनावों की एक डिबेट में इस चुनाव को ‘इमिग्रेशन इलेक्शन’ कहा, जिससे इन चुनावों में इस मुद्दे की महत्ता भी सिद्ध होती है।
एक शोध की मानें तो 43 प्रतिशत ब्रिटिश नागरिकों का मानना है कि प्रवासन के फायदों से ज्यादा नुकसान हैं। कुशल श्रमिक वीजा के लिए वेतन सीमा लगभग दोगुनी कर दी गई तो आश्रितों के साथ देखभाल करने वाले कर्मचारियों को साथ लाने से प्रतिबंधित कर दिया। करीब एक वर्ष पहले सुनक ने ‘स्टॉप द बोट्स’ नाम से एक मुहिम भी चलाई जिसका मकसद नावों के माध्यम से बड़ी संख्या में इंग्लैंड में घुस रहे शरणार्थियों को रोकना था। सुनक ने नए नियम पेश कर प्रवासियों को ब्रिटेन में आने से रोकने के लिए कई प्रयास किए। इनमें विदेशी विद्यार्थियों को अपने परिवार के सदस्यों को साथ लाने से रोका गया। सरकार का यह भी कहना रहा है कि ज्यादा संख्या में छात्र व देखभाल क्षेत्र में काम करने वाले लोगों तथा उनके आश्रितों के आगमन के कारण प्रवासन में वृद्धि हो रही है। इसके बावजूद, हालात यह हैं कि ब्रिटेन में शरणार्थी लगभग हर रोज दाखिल हो रहे हैं। हाल ही में इस साल का रेकॉर्ड तब कायम हो गया जब कुछ दिन पहले ही एक ही दिन में 882 शरणार्थी कई छोटे-छोटे जहाजों से इंग्लैंड में दाखिल हो गए। प्रवासन रोकने का वादा करने वाली कंजर्वेटिव पार्टी, अपना वादा निभाने में विफल रही, यह भी उसके पिछडऩे का एक अहम कारण है।
ब्रिटेन की प्रवासन रोकने की सभी नीतियां अब तक ‘तुगलकी’ और विफल साबित हुई हैं, फिर चाहे वह ब्रेक्जिट हो या ‘स्टॉप द बोट्स’ मुहिम। महंगाई और रोजगार जैसे प्रमुख मुद्दोंं को भी अब प्रवासियों व शरणार्थियों की बढ़ती संख्या से ही जोड़ कर देखा जा रहा है। इस बात को समझना होगा कि प्रवासन का यह मुद्दा ब्रिटेन तक सीमित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की रिफ्यूजी एजेंसी के मुताबिक पिछले वर्ष विश्वभर में 11 करोड़ से अधिक लोगों को शरणार्थी बनना पड़ा जिसका मुख्य कारण कुछ देशों के बीच चल रही जंग और जलवायु परिवर्तन आदि हैं। इससे यह तो साफ हो जाता है कि जितनी जरूरत प्रवासन को रोकने की नीतियों की है, उससे कहीं ज्यादा जरूरत ऐसी नीतियों की है जो प्रभावित शरणार्थियों को इस तरह व्यवस्थित कर सकें कि ब्रिटेन जैसे देशों का पारिस्थितिक तंत्र भी प्रभावित न हो।

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