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Patrika Opinion: वर्चस्व की जंग के बीच यूक्रेन-ताइवान

बिन लादेन के बाद गत 31 जुलाई को अल जवाहिरी का मारा जाना अमरीका के लिए राहत की बात हो सकती है, पर दुनिया को तभी राहत मिलेगी, जब अमरीका जैसे बड़े देश छोटे और कमजोर देशों को प्रयोगशाला बनाना बंद करेंगे।

Published: August 05, 2022 07:26:53 pm

दशकों बाद दुनिया में एक बार फिर वर्चस्व की जंग तेज होने का खतरा मंडरा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की स्थितियों में अमरीका और पूर्व सोवियत संघ में वर्चस्व की जंग ने दुनिया को न सिर्फ दो ध्रुवों में बांटा था, बल्कि इनकी वजह से होने वाली लड़ाइयों ने भविष्य के लिए भी कई तरह के खतरे पैदा कर दिए थे। आज दुनिया जिस आतंकी खतरे को महसूस कर रही है, उसकी जड़ें भी कहीं न कहीं शीतयुद्ध के दौर में धंसी मिलेंगी।
यूएस स्पीकर नैंसी पेलोसी ताइवान में
यूएस स्पीकर नैंसी पेलोसी ताइवान में
विभिन्न देशों पर अपनी पकड़ मजूबत बनाने की रणनीति के तहत अमरीका और सोवियत संघ ने उन देशों में सरकार-विरोधी समूहों को खूब हवा दी थी, जो स्वेच्छा से उनके पाले में नहीं आए थे। अफगानिस्तान भी उन्हीं में से एक था। तब सोवियत सेनाओं का मुकाबला करने के लिए अमरीका ने जिन समूहों को हर तरह की मदद पहुंचाई थी, बाद में वही समूह उसके नियंत्रण से आजाद हो गए और आतंक की नर्सरी बन गए। अलकायदा व तालिबान जैसे आतंकी संगठन भी इसी की देन रहे। हालांकि इसका खमियाजा अमरीका को ही सबसे ज्यादा भुगतना पड़ा। आखिरकार अलकायदा के सफाए का अभियान भी अमरीका को ही चलाना पड़ा। बिन लादेन के बाद गत 31 जुलाई को अल जवाहिरी का मारा जाना अमरीका के लिए राहत की बात हो सकती है, पर दुनिया को तभी राहत मिलेगी, जब अमरीका जैसे बड़े देश छोटे और कमजोर देशों को प्रयोगशाला बनाना बंद करेंगे। अमरीका और नाटो देशों ने यूक्रेन को ऐसी ही एक प्रयोगशाला बनाया, जिसका नतीजा सामने है। यदि नाटो ने यूक्रेन में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने की हरकत न की होती, तो रूस को यूक्रेन पर आक्रमण करने का फैसला क्यों लेना पड़ता? अब इसी तरह की स्थिति ताइवान और चीन के बीच बनती जा रही है।
अमरीका दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने और चीन पर दबाव बनाने की मंशा से ताइवान को हवा दे रहा है। चीन की चेतावनियों के बावजूद अमरीकी प्रतिनिधिसभा की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा का इस क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के अलावा और कोई मकसद नहीं हो सकता। चीन इससे भड़क गया है। चीन यह समझता है कि यदि बिना किसी उकसावे के वह ताइवान पर आक्रमण करेगा, तो दुनिया उसके खिलाफ हो जाएगी। लेकिन, अमरीका या कोई अन्य देश इसी तरह उकसावे की कार्रवाई करते रहे, तो चीन को आक्रामक होने का उसी तरह बहाना मिल जाएगा, जैसा रूस को यूक्रेन पर हमले के लिए मिल गया था। इससे अमरीकी हित जरूर सधेंगे, पर एशियाई देशों को सिर्फ नुकसान ही उठाना होगा।

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