scriptUnnatural life is the reason for human crisis | अप्राकृतिक होता जीवन ही मानवीय संकट की वजह | Patrika News

अप्राकृतिक होता जीवन ही मानवीय संकट की वजह

हमें अपना जीवन प्राकृतिक बनाना चाहिए, क्योंकि यह देखा जा रहा कि प्रकृति हम मनुष्यों को जी भरकर खेल खेलने देती है अर्थात उसे रोकती नहीं। पर अपने निराकार और सनातन स्वरूप से मनुष्य के मन में यह भाव बार- बार पैदा करती है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच सम्बन्ध जय- पराजय के नहीं अनन्त सहजीवन के हैं। वस्तुत: दोनों एक- दूसरे से ऐसे घुले- मिले हैं कि मूलत: दोनों को एक दूसरे से पृथक किया ही नहीं जा सकता है।

Published: September 21, 2022 08:41:44 pm


अनिल त्रिवेदी
पर्यावरण विषयों
पर लेखन

हमारे पुरातन ग्रंथ कहते आए हैं कि जीव प्रकृति का आकार है, पर प्रकृति सनातन निराकार स्वरूप में गतिशील रहकर प्रत्येक जीव को स्पंदित रखती है। देखा जाए, तो यह स्पंदन ही जीवन के सनातन आकार को गतिशीलता प्रदान करता है। आकार से निराकार और निराकार से आकार की अभिव्यक्ति ही प्रकृति का सनातन स्वरूप है, जो निरन्तर गतिशील स्वरूप में व्यक्ति से समाज में चेतना के स्वरूप में स्पंदित होती रहती है। यह भी मानना होगा कि मनुष्य ही इस प्रकृति का अनूठा जीव है, जो अपने निराकार विचारों को साकार करने की क्षमता रखता है। इस धरती पर ही मनुष्य ने जीवन के रहस्यों को जानने, समझने और उजागर करने के जितने प्रयास किए हैं, उतने अन्य किसी ने नहीं किए। शायद यही वजह है कि मनुष्य के मन में यह भाव गहरे से आता जा रहा है कि उसने प्रकृति पर विजय हासिल कर ली है। कभी-कभी उसे यह भी लगता है कि अपने कृतित्व के जरिए उसने प्रकृति यानी कुदरत के क्रम को बदल दिया है। वहीं कभी -कभी हमें यह लगने लगता है कि हमारा जीवन अप्राकृतिक हो गया है। हमें अपना जीवन प्राकृतिक बनाना चाहिए, क्योंकि यह देखा जा रहा कि प्रकृति हम मनुष्यों को जी भरकर खेल खेलने देती है अर्थात उसे रोकती नहीं। पर अपने निराकार और सनातन स्वरूप से मनुष्य के मन में यह भाव बार- बार पैदा करती है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच सम्बन्ध जय- पराजय के नहीं अनन्त सहजीवन के हैं। वस्तुत: दोनों एक- दूसरे से ऐसे घुले- मिले हैं कि मूलत: दोनों को एक दूसरे से पृथक किया ही नहीं जा सकता है।
यहां फिर एक सवाल उठता है कि मनुष्य खुद ही जब प्रकृति का अंश है, तो फिर वह प्रकृति के खिलाफ यानी अप्राकृतिक कैसे हो सकता है? क्या प्रकृति अपने अंश में अप्राकृतिक हो सकती है? क्या मनुष्य की प्रकृति अप्राकृतिक हो सकती है? एक तरह से दोनों ही स्थितियां संभव नहीं हैं। हमारी इस धरती पर मनुष्यों की जितनी संख्या आज जिस रूप, आकार व संख्या में है, उतनी ज्ञात इतिहास में एक साथ कभी नहीं रही। आज धरती पर प्रकृति को इंसान समेत दूसरे जीव-जंतुओं व वनस्पति से कोई समस्या नहीं है। यह बात और है कि इस धरती पर इंसानों को एक न एक समस्या एक-दूसरे से जरूर है। हममें से अधिकांश एक दूसरे को सहयोगी न समझ कर समस्या समझने लगे हैं। यही बुनियादी फेरबदल है, जिसमें सब उलझ गए हैं। इसका नतीजा यह निकला कि आज हमें प्रकृति में समाधान कम समस्याएं ज्यादा दिखाई पड़ रही हैं। हमारा जीवन भौतिक संसाधनों पर ज्यादा आश्रित होता जा रहा है। राज्य और बाजार के संसाधनों ने सुविधाभोगी बना दिया है। इन सबके चलते हमारी प्रकृति और प्रवृत्ति में मूलभूत बदलाव यह दिखाई देने लगा है कि हम सब एक बड़े दर्शक समाज में बदलने लगे हैं। प्रकृति अपनी जगह है, लेकिन मनुष्य की प्रकृति एकांगी होते रहने से उनकी सोच में बनावटीपन लगातार बढ़ता जा रहा है। मानव में आपसी कटुता व वैमनस्य व नफरत का विस्तार करने की क्षमता होती है। ये तमाम भाव गिरती लहरों की तरह ही मन की अभिव्यक्तियां हैं, जो हर मनुष्य के मन मस्तिष्क में आती जाती रहती हैं।
मनुष्य का मनुष्य के प्रति और प्रकृति के प्रति संकुचित प्रवृत्ति की ओर बढ़ रहा बुनियादी नजरिया चिंताजनक है। एक स्थिति यह भी उभर रही है कि आर्थिक समृद्धि के विस्फोट से मनुष्यों का वैश्विक आवागमन एकाएक बहुत बढ़ गया है। इससे भी मनुष्य की मूल प्रकृति और प्रवृत्ति में बुनियादी बदलाव हुआ है। ऐसे में यह भाव जाग ही रहा है कि इंसान पैसे की ताकत से धरती और प्रकृति के साथ जो मन में आए वह कर सकते हैं। इसी सोच का नतीजा है कि जीवन की अवधारणा और प्रकृति ही सिकुड़ती जा रही है। यह समूची दुनिया में उभरा मानवीय संकट है। प्रकृति के विराट स्वरूप की तरह व्यक्तिगत जीवन में व्यापक होकर ही हम इससे उबर सकते हैं। यह मार्ग अपनाना ही होगा।
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