मजबूत होगा ग्राम स्वरोजगार और जनस्वास्थ्य का तंत्र

- आपदा प्रबंधन और आर्थिक सुदृढ़ीकरण में पशुधन का महती योगदान
- विकास नीति में ऐसे प्रावधान किए जाएं ताकि ग्रामीण युवा नवाचारों की तरफ आकर्षित होकर उद्यमिता के नए मॉडल विकसित कर सकें

By: विकास गुप्ता

Published: 12 Feb 2021, 07:26 AM IST

प्रो. विष्णु शर्मा

प्राकृतिक आपदाओं की संख्या की दृष्टि से भारत अत्यधिक प्रभावित राष्ट्रों में आता है और राष्ट्र के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में गत 30 वर्षों में लगभग 40 प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप रहा है। वर्तमान आपदा कोविड-19 एक वैश्विक आपदा है और विश्व के भिन्न राष्ट्र इस महामारी से निकलने के साथ ही उन संभावित उपायों को चिह्नित करने का भी प्रयास कर रहे हैं, जिन्हें नीतियों में शामिल कर भविष्य में इस प्रकार की आपदाओं के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके। निश्चित ही 'आर्थिक सुदृढ़ीकरण' के ऐसे स्रोत जिनसे रोजगार व जीवनयापन कम से कम प्रभावित हो व 'जनस्वास्थ्य सुदृढ़ीकरण' के वे उपाय जिनसे रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि हो, ऐसे सर्वमान्य ***** हैं जिनके इर्द-गिर्द ही नीतियों का तानाबाना बुनना दूरगामी रूप से सार्थक सिद्ध होगा।

वर्तमान आपदा के समय जब ग्रामीण अपनी जड़ों की तरफ लौट रहे हैं, तब स्वाभाविक है कि ऐसे उद्यमों व स्वरोजगार की तरफ आकर्षण होगा जो स्थानीय स्तर पर सृजित किए जा सकें और सुनिश्चित बाजार मांग वालेे हों। वर्तमान महामारी ने जनमानस को पोषण व आहार द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि हेतु सचेत व संवेदित कर दिया है। जाहिर है कि प्रोटीन, विटामिन, सूक्ष्म खनिज तत्वों से प्रचुर प्राकृतिक खाद्य स्रोतों की मांग में वृद्धि होना तय है। राष्ट्र का दुग्ध उत्पादन में प्रथम व अण्डा उत्पादन में विश्व में तृतीय स्थान पर होने के कारण प्रोटीन व सूक्ष्म तत्व इन स्रोतों से बहुतायत में उपलब्ध हैं। हाल ही में जारी आहार व पोषण सुरक्षा रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा व प्रोटीन प्राप्ति के स्रोत के रूप में पोषण के लिए अनाज व समान कृषि उत्पादों की तुलना में पिछले 35 वर्षों में दूध व उत्पादों पर व्यय में अत्यधिक वृद्धि हुई है।

वर्तमान में देसी गोवंश, बकरी व ऊंट के दूध की समाज में मांग बढ़ रही है। वैज्ञानिकों द्वारा भिन्न प्रजाति के दूध में विद्यमान जैव सक्रिय तत्वों का मानव स्वास्थ्य एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता पर सार्थक प्रभाव देखा गया है। बकरी का दूध, एलर्जी, अपच व अन्य रोगों में उपयोगी सिद्ध हो रहा है, तो मधुमेह में ऊंटनी के दूध की उपयोगिता की भी वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है। संभव है कि भविष्य में दूध को आवश्यकतानुसार डिजाइन किया जा सकेगा। आवश्यकता है कि अनुसंधानों से प्राप्त परिणामों का उचित प्रमाणीकरण कर उन्हें व्यावसायिक मॉडल में ढाल कर प्रोत्साहन दिया जाए।

विकास नीति में ऐसे प्रावधान किए जाने चाहिए ताकि ग्रामीण युवा इन नवाचारों की तरफ आकर्षित होकर उद्यमिता के नए मॉडल विकसित कर सकें और राज्य की बहुमूल्य संपदा का देशहित मेें पूर्ण दोहन किया जा सके। युवाओं का बकरी पालन, मुर्गीपालन, खरगोश पालन, मत्स्य पालन आदि की तरफ रुझान बढ़ा है। यदि किसानों को इन विधाओं में वैज्ञानिक पद्धति से प्रशिक्षण मिले तो उत्पादन बढऩे की अपार संभावनाएं हैं। मूल्य संवर्धन के लिए स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण सुविधाएं मुहैया हों तो किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य भी मिल सकेगा और स्वरोजगार के नए क्षेत्र भी विकसित होंगे। पशुपालन संबंधित विकास योजना बनाते समय स्थानीय स्रोतों व कृषि जलवायु परिस्थिति के आधार पर क्लस्टर चिह्नित और पशुधन आधारित उद्यम स्थापित किए जाने चाहिए। युवाओं के रुझान को देखते हुए निकट भविष्य में ये कदम पशुपालन क्षेत्र में अपेक्षित बदलाव सुनिश्चित करेंगे। महामारी के मौजूदा दौर को देखते हुए बहुत ही सामयिक है कि ग्रामीण युवा वापस अपनी जड़ों की तरफ लौटने लगे हैं। आवश्यकता है कि ग्राम स्वरोजगार की संभावनाओं को तलाश कर उन्हें मजबूत स्तम्भ प्रदान किया जाए और महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के स्वप्न को पूरा करने की तरफ सशक्त कदम बढ़ाया जाए।
(लेखक राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर में कुलपति हैं)
(सह-लेखक: प्रो. संजीता शर्मा, अधिष्ठाता, स्नातकोत्तर पशुचिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, जयपुर)

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विकास गुप्ता
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