असली परीक्षा मतदाता की

केवल मनुष्य ही अपने अहंकार के कारण प्रकृति का अतिक्रमण करता है। वह जैसा है जिस हाल में है, सुखी नहीं होता।

By: Shri Gulab Kothari

Published: 22 Sep 2020, 08:43 PM IST

- गुलाब कोठारी

प्रकृति में कोई अपने अस्तित्व के बाहर नहीं जीता है। बबूल आम बनकर नहीं जीना चाहता। नीम भी समझता है कि वह कुछ और नहीं बन सकता। उसकी श्रेष्ठता-उपयोगिता भी नीम बनकर जीने में ही है। गीता में कृष्ण कहते हैं कि-‘अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।’ (18/47 गीता।)

सम्पूर्ण प्रकृति में ऐसा ही है। केवल मनुष्य ही अपने अहंकार के कारण प्रकृति का अतिक्रमण करता है। वह जैसा है जिस हाल में है, सुखी नहीं होता। वह कुछ और हो जाना चाहता है। इसी प्रयास में वह स्वयं का स्वरूप खो देता है। नया स्वरूप धारण कर नहीं पाता।

मध्यप्रदेश की 28 सीटों पर उपचुनावों का शंखनाद हो चुका है। इनमें से 16 सीटें ग्वालियर-चम्बल संभाग के सात जिलों में हैं। यह क्षेत्र ग्वालियर घराने के प्रभाव में कांग्रेस के साथ रहा है। अब तक ज्योतिरादित्य सिंधिया ने नेतृत्व संभाल रखा था। कांग्रेस का वर्चस्व था। मछली को सागर छोटा लगने लगा। बाहर निकलने की चाह में अधमरी हो गई। कांग्रेस से बाहर भी हुए और क्षेत्र में पुरानी पकड़ भी छूटी, नई पकड़ में तो उम्र गुजर जाएगी। जग हंसाई का सबब बन बैठे हैं। इनको यह तो समझ में आ गया कि भाजपा में इनकी दाल नहीं गल रही। राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। अब तक पांच बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साथ क्षेत्र का दौरा कर चुके। न इधर के रहे न उधर के। 2018 के चुनावों में 28 में से 27 सीटों पर कांग्रेस जीती थी। देखना यह है कि जिसने जिताया था, अब वही कितना हरा सकता है।

सिंधिया परिवार में शेष सभी सदस्य भाजपा के शीर्ष पदों पर रहे हैं। आज भी श्रीमती विजयाराजे की कमाई खा रहे हैं। ज्योतिरादित्य ने भी क्या कार्य किए प्रदेशवासियों के लिए? मिलीभगत की राजनीति भी अब नहीं कर पाएंगे। न सीटों के बंटवारे में प्रभावी होंगे। वर्ष 2018 के चुनावों में भी कमलनाथ के साथ कहासुनी हुई थी। जिन भाजपा सदस्यों को मंच से भला-बुरा कहा था, तथा जिनके टिकट उपचुनाव में कटेंगे, उनकी प्रतिक्रियाओं का सामना अकेले ज्योतिरादित्य नहीं कर पाएंगे। न कांग्रेसी उनका क्षेत्र में स्वागत करेंगे, न ही भाजपा के मार खाए हुए, जिनके टिकट कटेंगे उनकी वे जानें।

हमें तो मतदाता को देखना है। उसकी समझ की बड़ी परीक्षा होने जा रही है। यह अगली उच्च शिक्षा की परीक्षा होगी। सन् 1952 से अब तक क्षेत्रवाद-जातिवाद का जितना बोलबाला था, उतना नई पीढ़ी में नहीं होगा। वह अपना भविष्य आंख मूंदकर किसी भी नेता के हाथ में नहीं सौंपने वाली। दूसरी ओर कांग्रेस के जिन नेताओं को पिछले वर्षों में बढ़ावा दिया गया, अधिकृत किया गया, वे भी अपना वर्चस्व दिखाएंगे। कांग्रेस में रहकर जिन मतदाताओं को अंगूठा दिखा दिया, वे इस बार क्या करेंगे? यह चुनौती भाजपा के समक्ष ज्यादा बड़ी है। ज्योतिरादित्य का कद अनुमान से कहीं ज्यादा छोटा है। इन्होंने निर्णय तो कालिदास जैसा ही कर लिया है। भाजपा के मंच से ग्वालियर क्षेत्र में बोल पाना इनके लिए सहज नहीं होगा। भाजपा को भी समझ में आ जाएगा कि, कटार यदि सोने की भी हो तो अपने पेट में नहीं घोंपी जानी चाहिए।

ज्योतिरादित्य का कांग्रेस छोडकऱ भाजपा में जाने का निर्णय देश के लोकतंत्र में मील का पत्थर हो गया। इसी कार्य प्रणाली का पहला झटका स्वयं राहुल गांधी को लगा। राजस्थान की राजनीति में भी इसी प्रकरण की पुनरावृत्ति होने जा रही थी। देवयोग से बच गई। कांग्रेस आलाकमान की आंखें भी कुछ खुलने लगीं। शायद पुन: खड़ी होकर देश में विपक्ष को सक्षम करने लायक बन जाए।

नया चुनाव, नया मतदाता, नया ही भविष्य। न झूठ चले, न भ्रष्टाचार, न ही परिवारवाद। भविष्य को ध्यान में रखकर मतदान किया जाए तो उचित होगा। ‘ऊंची दुकान-फीके पकवान’ के बजाय जुझारू-कर्मठ तथा लोकसेवा को समर्पित व्यक्ति ही प्रतिनिधि बने, यही समय की जरूरत है। एक दिन के दारू-पानी के एवज में 5 साल तक त्राहि-त्राहि करना कब तक चलेगा? याद रहे-हम ही अपने भाग्य विधाता हैं।

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