कमाल का जल-प्रबन्धन!

कोई समृद्ध देश प्राकृतिक सम्पदाओं, ज्ञान सम्पदाओं एवं प्रतिभाओं से सम्पन्न भारत जैसा-हर प्राकृतिक आपदा में त्राहि-त्राहि कर उठता है। क्योंकि हमें सौभाग्य से ऐसे राष्ट्रप्रेमी नौकरशाहों का खजाना प्राप्त है, जो अपना घर भरने के लिए गांव के गांव शहीद कर सकते हैं।

By: Shri Gulab Kothari

Published: 01 Sep 2020, 08:20 AM IST

- गुलाब कोठारी

कोई समृद्ध देश प्राकृतिक सम्पदाओं, ज्ञान सम्पदाओं एवं प्रतिभाओं से सम्पन्न भारत जैसा-हर प्राकृतिक आपदा में त्राहि-त्राहि कर उठता है। क्योंकि हमें सौभाग्य से ऐसे राष्ट्रप्रेमी नौकरशाहों का खजाना प्राप्त है, जो अपना घर भरने के लिए गांव के गांव शहीद कर सकते हैं। अपराधियों का घर भर सकते हैं। सरकार से अपनी इस दक्षता के लिए तमगे-पदक प्राप्त करते हैं। जिनको आग लगने पर कुआं खोदने की याद आती है।

देश में चल रहे कोरोना महायुद्ध को कोई बर्बरीक की आंखों से देख ले, टिड्डियों द्वारा किए गए आक्रमणों में अफसरों की भूमिका देख ले, हाल ही जयपुर में एक दिन की बरसात के ताण्डव को याद कर लें। आज दो माह से देश में चल रहे बाढ़ के संकट की चर्चा मीडिया से भी गायब हो गई। बाढ़ का आक्रोश असम को भीतर तक हिला गया। सरकार साक्षी भाव में खड़ी थी। बिहार में नेपाल की कृपा से जल-प्लावन का दृश्य प्रलयकाल का चित्रण कर रहा है। आज भी मध्यप्रदेश के सैंकड़ों गांव जल समाधि ले चुके हैं। नए-नए पुल ढह गए, निर्माणाधीन पुल ढह गए। गर्व है हमारे इंजीनियरों एवं ठेकेदारों पर। कमबख्त अंग्रेज इंजीनियर कैसे शत्रु थे हमारे कि उनका बनाया एक भी पुल आज तक नहीं टूटा। हम विकास में उनसे आगे हो गए।

बाढ़ नियंत्रण चौपट, मौसम विभाग की भविष्यवाणियां सुनाई तक नहीं देती। हमने बाढ़ का नजारा देखा बाड़मेर में। पूरा बजट हवाई सर्वे और रात्रिभोज में निपटा गए। पानी अगले साल तक भरा हुआ था। अभी अचानक बरसात आई तो अफसर मानो नींद से जागे हों। जवाहर सागर के सभी सोलह गेट एक साथ खोल दिए, माही डेम के सारे गेट खोल दिए। कोई भी बह जाए, इनकी बला से। कोई सार्वजनिक सूचना भी नहीं। क्या लाभ होगा, मालूम नहीं। हानि की कोई चर्चा तक नहीं होने वाली। जल प्रबन्ध का दूसरा पहलू यह भी है कि रामगढ़ को सुखाना है, ताकि बीसलपुर का हजारों-करोड़ का प्रोजेक्ट बन सके। वहां के लोगों को, खेती-पशु आदि का पानी कहीं और से लाएंगे। कितने समझदार और देशभक्त हैं हमारे नीति-निर्माण करने वाले!

बांध बनाने के मुख्यत: दो उद्देश्य होते हैं। पहला पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता निरंतर बनी रहे और दूसरा पन बिजलीघरों से बिजली बन सके। तीसरा जो महत्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिए, उस पर ध्यान नहीं दिया जाता। वह है कि बांध के आगे के क्षेत्रों में भूमिगत जल का स्तर ऊंचा बना रहे। भूमि से जल का दोहन तो होता रहता है, पर पुनर्भरण नहीं हो पाता। यह प्रकृति विरुद्ध कार्य है। इसी के कारण भूगर्भीय असंतुलन बनता है। अकाल, भूकंप जैसी आपदाएं आती हैं।

हमारे राजनेताओं की बलिहारी, जिनकी कृपा से गांवों के अस्तित्व उजड़ गए। शहरों में अतिक्रमणों का जाल वैध निर्माण से अधिक हो गया। जल निकासी के सारे मार्ग अवरूद्ध हो गए। जयपुर जैसे शहर में नेता भी सवाये हैं। पानी का बहाव भी पहाड़ों के कारण कई गुणा है। नेता दूर बैठकर भाषण देते रहते हैं, राजनीति के आगे कुछ करते ही नहीं। तब तबाही क्यों न हो। मध्यप्रदेश जैसी एक-दो बरसात यदि रामगढ़ क्षेत्र में हो जाए तो सबके मुखौटे उतर जाएंगे। पहले भी चार सौ से अधिक गांव डूब चुके हैं। अफसरों को केवल अपने मकान की चिन्ता रहती है। जनता भले ही मरे। तालकटोरे के जलमार्ग पर आज भी प्रभावी लोगों का ही अतिक्रमण है। तालाब की चिन्ता नहीं। जलमहल झील की हत्या हो गई। सरकारें दावतें उड़ाती रहीं। आना सागर (अजमेर) की तरह कितने जलाशयों को सुखाकर पट्टे काट दिए गए। क्या एक भी बेशर्म को जनजीवन पर कुठाराघात करके शर्म आई? हमारे लोकतंत्र की यह बड़ी उपलब्धि है कि आज पीने को पानी नहीं है, बरसात के पानी के संग्रहण की तैयारी नहीं है, पानी पैदा कर नहीं सकते। जहां-जहां बांध बन गए, वहां-वहां गांव उजड़ गए। एक तरफ विस्थापितों को अंगूठा दिखा दिया, बांध के आगे पानी के फाटक बन्द हो गए। अब कर लो खेती और बसा लो गांव। इससे भी बड़ा अन्याय यह हुआ कि नहरी योजनाओं के नाम पर ‘हरित क्रान्ति’ का नारा चला और नहरी क्षेत्र मोटे तौर पर प्रभावशाली लोगों के कब्जे में आ गया। किसानों की खेती लुट गई। बांधों को किसानों के नाम पर बनाया जाता है पर असल लाभ उद्योगपतियों को दिया जाता है-बिजली और औद्योगिक इकाइयों को जल उपलब्ध करवा के।

बांधों से पानी तब छोड़ा जाता है, जब उसका भार वहन करना असहनीय हो जाता है। जैसे संग्रह करके रखा हुआ धन, आवश्यकता होने पर भी खर्च नहीं किया जाए तो वह बेकार है, वैसे ही संग्रह कर के रखा हुआ पानी है। पानी को बचाना जरूरी है, पर खुले बांधों में वाष्प बनकर उड़ाना बर्बादी। जब अतिवृष्टि से बांध भर जाते हैं तो एक साथ सारे गेट खोलने पड़ते हैं, जिससे बाढ़ आ जाती है। गांव-खेत तो तबाह हो ही जाते हैं, जानें भी जाती हैं। हजारों परिवार विस्थापित हो जाते हैं। क्या यह नुकसान कम है।

यह सारा हमारे जल प्रबन्धन का कमाल है। इसे सीखने के लिए भी हमारे नेता, अधिकारी विदेश जाते रहते हैं। ये नौकरशाह इस लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि स्वयं ही बन गए। अब इनसे उम्मीद करना भी भूल ही होगी कि रेगिस्तान जैसे भू-भाग को समझकर जलीय प्रबन्ध की नई नीति बनाएंगे। इनको कहां तो हमारे भूगोल की समझ है, कहां लोक संस्कृति की? पशुधन और कृषि पर भी आज तक जितना कार्य हुआ है, उसमें सारे प्रयोग विदेशी तर्ज पर किए गए। सत्तर वर्षों में बजट कभी परम्परागत खेती, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन पर नहीं किया गया, बल्कि इनको उजाड़ा गया। रेगिस्तान में खेती को प्राथमिकता? इनके सारे चश्मे विदेशी हैं। यह देश और देशवासी इनको दिखाई नहीं देते। आगे भी नहीं। आगे भी गरीब बढ़ेगे, कण्ठ प्यासे रहेंगे, वर्षा का जल हमारे काम नहीं आएगा, बल्कि प्रतिवर्ष हजारों जानें लीलता रहेगा।

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