शाबाश अनिका!

आठ साल की इस नारी शक्ति ने दर्शकों को नपुंसक साबित कर दिया।

By: भुवनेश जैन

Published: 25 Apr 2018, 11:53 AM IST

नारी शक्ति के नारों के खोखलेपन को उजागर करती भिन्न-भिन्न सरकारों के बेटी बचाओ नारों को मुंह चिढ़ाती जयपुर की इस बच्ची ने जिस प्रखर आत्मविश्वास के साथ अपहर्ता के चंगुल से स्वयं को मुक्त कराया, इसका और इसके माता-पिता का जितना अभिनंदन किया जाए, कम है। आठ साल की इस नारी शक्ति ने दर्शकों को नपुंसक साबित कर दिया। देश-प्रदेश में होने वाली ज्यादातर ऐसी घटनाओं के दर्शक इस तरह स्तब्ध दिखाई पड़ते हैं, मानो उनकी शिराओं में रक्त नहीं, पानी बह रहा हो।

उधर पुलिस को देखो, दुर्घटना के बाद तो आसमान सिर पर उठा लेती है। उससे पहले मानो उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं। पुलिस की तो शाबाशी इसी बात में है कि अपहर्ता आज तक पकड़ा नहीं गया। सुरक्षा व्यवस्था चारों तरफ शून्य दिखाई पड़ती है। आधी रात के बाद शहरों में गुंडों के दल तोडफ़ोड़ करते निकल जाते हैं, क्या-क्या तांडव नहीं करते! पुलिस का मानो कोई वास्ता ही नहीं। कोई दिन ऐसा नहीं जब बलात्कार, हत्याओं की चर्चा मीडिया की सुर्खियों में न आए। गृह विभाग और सरकार आंकड़ों को देखकर प्रसन्न है। समाज का युवा अपनी बहन- बेटियों की सुरक्षा करने को भी आतुर दिखाई नहीं देता।

हर चीज की एक सीमा होती है। अपराध आज चरम पर है। प्रतिदिन बलात्कार की औसत दस घटनाएं तो केवल राजस्थान में दिखाई पड़ रही हंै। सजा ५ प्रतिशत मामलों में भी नहीं होती। एक ही विकल्प रह गया है। नारी शक्ति को अपना बूता बढ़ाना होगा। अपने दुर्गा के स्वरूप को ही विकसित करना पड़ेगा। नपुंसक होता समाज तो पड़ोसी की भी चिंता अब नहीं करता। जो उदाहरण जयपुर की अनिका ने प्रस्तुत किया, वही आज का सत्य है। बाकी सब झूठ है। कोई नारी अपने को अबला ना कहे।

किसी को घरवालों पर भी विश्वास करने की जरूरत नहीं रह गई। ये बीड़ा अब स्वयं ही उठाना होगा। बिना किसी पर आरोप जड़े, बिना अपनी कमजोरी का रोना रोए, इसी समाज में जीने की तैयारी दिखानी होगी। सरकार की कोई योजना काम नहीं आएगी, क्योंकि उनकी चाबी भी पुरुषों के पास ही रहती है। जिस पुरुष समाज से नारियां व्यथित हैं, उससे आश्रय मांगेंगी तो उनकी भूल होगी। अगर संभव हो तो अपने भाइयों को और उनके मित्रों को उनका दायित्व बोध करा सको, तो कुछ सहजता हो सकती है। एक संकल्प तो आज आप सबको कर ही लेना चाहिए कि आपकी संतान बड़ी होकर किसी नारी का अपमान नही करेगी।

आपको यह सुनिश्चित कर लेना है। आज जो भी इस अपराध में जुड़े हैं, उनको भी तो किसी नारी ने ही बड़ा किया है। समस्या की जड़ यही है। नारी किसी शरीर का नाम नहीं है। इस शरीर में नारीत्व का विकास होना चाहिए। तभी पुरुष भी विकसित होगा। समाज भी सभ्य बनेगा। हां, कुछ असामाजिक तत्व तो हर युग में बने ही रहते हैं। उन्हीं के दुर्गुणों को देख कर अच्छे लोगों का सम्मान रहता है और सत्य की जीत का नारा स्थायी बनता है।

उपरोक्त सभी दृष्टियों से देखा जाए तो अनिका ने एक आदर्श स्थापित किया है। और भी हो सकती हैं ऐसी बच्चियां जो संघर्ष कर-कर के स्वयं को चंगुल मुक्त करती रही होंगी। पर जिन परिस्थितियों में अनिका ने साहस दिखाया उससे अपराधी का दुस्साहस पस्त हो गया और वो युवा पीढ़ी के लिए नजीर बन गई।

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भुवनेश जैन
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