आपकी बात, धार्मिक-जातीय ध्रुवीकरण का लोकतंत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

By: Gyan Chand Patni

Published: 04 Dec 2020, 04:08 PM IST

धार्मिक और जातीय राजनीति झगड़े की जड़
अक्सर जाति, संप्रदाय और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश की जाती है। अल्पसंख्यक समुदाय में भय का माहौल भरने के लिए धार्मिक चिह्नों, धर्मगुरुओं और भावनात्मक अपीलों का इस्तेमाल होता है। कई बार सांप्रदायिकता इतना उग्र रूप ले लेती है कि सांप्रदायिक दंगे हो जाते हैं। भारतीय राजनीति में जाति की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। ज्यादातर चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार का चयन उस क्षेत्र के जातीय और धार्मिक समीकरण के आधार पर होता है। नेता सत्ता में भागीदारी के लिए अपनी जातिगत पहचान को अपने-अपने तरीके से व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। धार्मिक और जातीय विभाजन से समाज में टकराव की स्थिति उत्पन्न होती हैै। जाति और धर्म के नाम पर राजनीति का स्वरूप बिगाडऩा उचित नहीं है।
-डॉ. अजिता शर्मा, उदयपुर
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पीछे छूट जाते हैं राष्ट्रीय मुद्दे
जाति और धर्म के आधार पर समाज का ध्रुवीकरण देश के लिए ठीक नहीं है। इससे लोगों के बीच द्वेष होता है। धार्मिक धु्रवीकरण तो चुनाव में अन्य मुद्दों को पूरी तरह दरकिनार कर देता है। इससे पूरे देश का अहित होता है। नेता लोगों के दिमाग में जातीय और धर्म से जुड़ी दुर्भावनाएं डालकर अपनी कमियां छिपा लेते हैं। द्वेष से भरा मस्तिष्क इसके आगे कुछ सोच भी नही पाता और राष्ट्रीय मुद्दे गौण हो जाते हैं।
-नटेश्वर कमलेश, चांदामेटा, छिन्दवाड़ा
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लोकतंत्र पर विपरीत असर
धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण से लोकतंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है तथा लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। समाज में धर्म और जाति के नाम पर वैमनस्यता बढ़ती है। विकास के मुद्दों से ध्यान हटाकर लोगों के अंदर धार्मिक और जातीय उन्माद पैदा किया जाता है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।
-कुशल सिंह राठौड़, जोधपुर
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राष्ट्रीय एकता के लिए घातक
भारतीय राजनीति में जाति एक महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक तत्व रहा है। यह राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है। भारतीय लोकतंत्र में जातिवाद का प्रभाव हर क्षेत्र में देखा जाता है। कुछ लोग जाति और धर्म के आधार पर समय-समय पर अपने क्षेत्र से चुनाव के उम्मीदवार के रूप में अपनी दावेदारी प्रस्तुत करते रहते हैं। साथ ही जाति और धर्म का नाम लेकर अपने-अपने उम्मीदवार को जिताने का पुरजोर प्रयास किया जाता है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
-विद्याशंकर पाठक, सरोदा, डूंगरपुर
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चिंताजनक स्थिति
सत्ता के लालच में नेता धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं, जिससे जनता असल मुद्दों को भूलकर धर्म और जाति के नाम पर बंट जाती है। यह चिंताजनक स्थिति है। इससे हमारे लोकतंत्र के मूल भावना आहत होती है।
-आयुषी तिवारी, उलखर, छत्तीसगढ
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जाति और धर्म के आधार पर बनाते हैं उम्मीदवार
अक्सर धर्म और जाति के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश की जाती है। धर्म के पवित्र प्रतीकों, धर्मगुरुओं की भावनात्मक अपील और लोगों के मन में डर बैठाने जैसे तरीकों का उपयोग सामान्य आम बात हो गई है। राजनीतिक दल टिकटों के बंटवारे में जाति और धर्म का ध्यान रखते हैं।
-भागीरथ स्वामी, धोलाभाटा, लाडऩू
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जनता में जागरूकता जरूरी
लोकतंत्र में जनमत राजनीति शक्ति का प्रमुख निर्धारक है। जाति एवं धर्म जनमत के ध्रुवीकरण के लिए आसान उपकरण है। लोकतंत्र के लिए धर्म एवं जाति आधारित सशक्तीकरण घातक है। इससे छुटकारा पाने के लिए राजनेताओं से उम्मीद रखना ठीक नहीं। जनता को जागरूक बनाकर ही इस समस्या से निजात पाई जा सकती है।
-नरेन्द्र कुमार शर्मा, जयपुर
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लोकतंत्र पर नकारात्मक असर
समाज का धार्मिक और जातीय आधार पर ध्रुवीकरण लोकतंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। संविधान में इंगित अधिकारों तथा कर्त्तव्य को ठेस पहुंचाने में धार्मिक व जातीय ध्रुवीकरण का हाथ रहा है। इस कार्य में उत्प्रेरक का कार्य सोशल मीडिया निभा रहा है। समय रहते जागरूक होना पड़ेगा, वरना यह ध्रुवीकरण हमारे देश के वास्तविक मूल्यों को नष्ट कर देगा।
-एकता शर्मा, गरियाबंद,छत्तीसगढ़
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कांग्रेस की नीतियों का परिणाम
धार्मिक ओर जातीय ध्रुवीकरण का खेल कांग्रेस तो शुरू से ही खेलती आई है। अब जब बीजेपी ये खेल खेलती है, तो कांग्रेस को तकलीफ होती है। कांग्रेस ने मुसलमानों का तुष्टीकरण किया और समाज को जातियों में बांट कर देश पर शासन किया। आरक्षण 10 वर्ष के लिए था, लेकिन कांग्रेस उसको हर बार बढ़ाती रही। इस वजह से ये समस्या पैदा हुई है।
-राजेन्द्र सिंह, खाजूवाला, बीकानेर
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योग्य व्यक्ति सदन में नहीं पहुंचते
धार्मिक-जातीय ध्रुवीकरण का लोकतंत्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे योग्य व्यक्ति सदन में नहीं पहुंच पाते। लोग धार्मिक कट्टरता को अपनाते हैं जिससे लोकतंत्र को नुकसान उठाना पड़ता है। यह प्रवृत्ति देश के लिए घातक साबित हो रही है। इसलिए धार्मिक-जातीय ध्रुवीकरण लोकतंत्र के लिए खतरा है तथा यह योग्य व्यक्तियों को लोकतंत्र से दूर कर देता है।
-बिहारी लाल बालान, लक्ष्मणगढ, सीकर
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लोकतंत्र की जड़ें कमजोर
धार्मिक-जातीय ध्रुवीकरण से लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होती हैं। किसी जाति या धर्म विशेष के बल पर जीतने वाले जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की अल्पसंख्यक जनता के हितों की उपेक्षा करते हैं। इससे अल्पसंख्यकों में सरकार के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न होता है। ऐसे ध्रुवीकरण से समाज का विखंडन होता है, जो लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।
-राकेश कुमार शर्मा, गंगापुर सिटी, सवाईमाधोपुर

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