आर-पार का फैसला कब

आर-पार का फैसला कब
jammu kashmir

Dilip Chaturvedi | Updated: 18 Feb 2019, 07:13:04 PM (IST) विचार

राजनीतिक विरोध और राष्ट्र विरोध के अंतर को समझना भी होगा और समझाना भी। आतंकवाद का खात्मा तभी संभव है।

कहावत है, 'सब कुछ लुटाकर होश में आए तो क्या किया।' पुलवामा हमले के बाद आतंककारियों से संबंध रखने की आशंका के चलते केन्द्र सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं। ये दिखाने की कोशिश की कि सुरक्षा को लेकर वह गंभीर है। पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 42 जवानों के शहीद होने के बाद देर से ही सही, लेकिन छह अलगाववादियों को दी जा रही सुरक्षा वापस लेने का फैसला स्वागत योग्य है। मीरवाइज उमर फारूक, शब्बीर शाह, हाशिम कुरैशी, बिलाल लोन, फजल हक और अब्दुल गनी बट को मिल रही सुरक्षा और सुविधाएं वापस ले ली गई हैं। पुलवामा का हमला सीआरपीएफ जवानों पर नहीं, देश पर हमला है। समूचा देश गुस्से और गम में डूबा है। ऐेसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि हमले के बाद ही इन अलगाववादियों की सुरक्षा वापस लेने का ध्यान क्यों आया? गृह मंत्रालय को अगर इन अलगाववादियों के पाक खुफिया एजेंसी आइएसआइ से संपर्क रखने की जानकारी थी या सीमा पार से इन्हें आर्थिक और अन्य मदद मिल रही थी तो ये कदम पहले भी तो उठाया जा सकता था। लेकिन हमें आग लगने पर ही कुआं खोदने की याद आती है।

बीते साढ़े चार साल में अलगाववादियों और आतंककारी गुटों के नापाक रिश्तों को खत्म करने की दिशा में अनेक कदम उठाए गए। देश में बड़े शहरों में होने वाले हमलों पर लगाम भी लगी। लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी कश्मीर सुलगता रहा। 'ऑपरेशन ऑल आउट' में कामयाबी मिली, लेकिन उरी, कठुआ और पुलवामा जैसी वारदातों ने सरकारी प्रयासों को अंगूठा भी दिखाया। अब सरकार हरकत में आती दिख रही है। देश जानना चाहता है कि एक्शन क्या होगा? प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक देश को भरोसा दिला रहे हैं। प्रधानमंत्री ने तो देश की जनता से यहां तक कहा है कि जो आग आपके सीने में धधक रही है वह उनके दिल में भी लगी है। अनेक सरकारें पहले भी ऐसे भरोसे देती रही हैं, लेकिन आतंकवाद है कि बढ़ता ही जा रहा है। आर-पार की लड़ाई के मौके पहले भी बहुत आए, लेकिन भाषणों के अलावा कभी आर-पार नजर ही नहीं आया। अब पानी सिर से ऊपर बहने लगा है।

सरकार को दिखाना होगा कि उसे 130 करोड़ देशवासियों की कितनी चिंता है? आतंकवाद से निपटने को लेकर हम इजराइल की प्रशंसा तो खूब करते हैं, लेकिन उस जैसा साहस दिखा नहीं पाते। कभी राजनीति आड़े आ जाती है तो कभी दूसरे करण। बहुत हो चुकी राजनीति। अब सरकार के साथ राजनीतिक दलों को भी अपनी चिंता छोड़कर देश की चिंता करनी चाहिए। देश सुरक्षित होगा, तभी राजनीतिक दल और नेता भी सुरक्षित रहेंगे। यही समझने का मौका अब आ चुका है। आतंकवाद का साथ देने वालों के साथ दुनिया को भी दिखाना होगा कि हम शांति के पुजारी हैं, लेकिन कायर नहीं। एक बात और, अलगाववादी हों या देश की खिलाफत करने वाले दूसरे लोग, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए। राजनीतिक विरोध और राष्ट्र विरोध के अंतर को समझना भी होगा और समझाना भी। आतंकवाद का खात्मा तभी संभव है।

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