scriptWhy are Indian universities overwhelmed by multiple crises | देश के विश्वविद्यालय आखिर क्यों जकड़े हुए हैं वित्तीय संकट में | Patrika News

देश के विश्वविद्यालय आखिर क्यों जकड़े हुए हैं वित्तीय संकट में

हमें अपने परिसरों में विचारों की विविधता के लिए सहिष्णुता को अपनाने की जरूरत है। हमारे छात्रों के पास रचनात्मक अनुभव हैं, उनके पास खुद को नागरिक के तौर पर जाहिर करने के लिए जगह होनी चाहिए। अगर अभिव्यक्ति की आजादी को बढ़ावा नहीं दिया गया तो हमारे विश्वविद्यालय आलोचनात्मक सोच का समर्थन कैसे करेंगे?

Published: May 16, 2022 08:11:02 pm

वरुण गांधी
भाजपा सांसद

देश के विश्वविद्यालयों के बुनियादी ढांचे में निवेश लगातार घटता जा रहा है। 2012 से उच्च शिक्षा पर खर्च 1.3 से 1.5 फीसद पर स्थिर रहा है। देश के ज्यादातर विश्वविद्यालय, आइआइटी और आइआइएम का बुनियादी ढांचा खस्ताहाल है। सभी जगह कक्षाओं में क्षमता से ज्यादा छात्र हैं, आबोहवा और स्वच्छता की स्थिति बदतर है। छात्रावासों की भी स्थिति अच्छी नहीं है। वित्त वर्ष 2020-21 में उच्च शिक्षा अनुदान एजेंसी (एचईएफए) का बजट 2000 करोड़ रुपए से घटाकर वित्त 2021-22 में एक करोड़ रुपए कर दिया और अब 2022-23 के लिए महज एक लाख रुपए आवंटित किए गए। विश्वविद्यालयों को ऋण लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। मसलन, दिल्ली विश्वविद्यालय एचईएफए से 1075 करोड़ रुपए का कर्ज मांग रहा है।
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
जो स्थिति है उसमें विश्वविद्यालयों के लिए दिन-प्रतिदिन के खर्चों को भी पूरा करना मुश्किल है। यूजीसी को वित्त वर्ष 2021-22 के 4693 करोड़ रुपए के मुकाबले 2022-23 में 4,900 करोड़ रुपए आवंटित हुए, पर नकदी प्रवाह में कमी के कारण डीम्ड/केंद्रीय विश्वविद्यालयों के वेतन भुगतान में देरी हुई है। जो सूरत है उसमें ज्यादातर विश्वविद्यालय घाटे में चल रहे हैं। मद्रास विश्वविद्यालय ने 100 करोड़ रुपए से अधिक का संचित घाटा देखा, जिससे उसे राज्य सरकार से 88 करोड़ रुपए का अनुदान प्राप्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा। दिल्ली विश्वविद्यालय के 12 कॉलेजों में वित्तीय कमी देखी जा रही है। राज्य द्वारा आवंटन लगभग आधे से कम हो गया है। मसलन, दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज को 2021 में 42 करोड़ रुपए की दरकार थी जबकि उसे आवंटित किए गए 28 करोड़ रुपए। श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, विश्व भारती, नगालैंड विश्वविद्यालय, झारखंड विश्वविद्यालय और दक्षिण बिहार सरीखे कई विश्वविद्यालयों के फैकल्टी सदस्यों को महीनों से वेतन में देरी का सामना करना पड़ रहा है।
वित्तीय संकट के कारण विश्वविद्यालयों के विवेकाधीन खर्च में कटौती हुई है। दिल्ली के कई कॉलेज बुनियादी डेटाबेस और पत्रिकाओं की सदस्यता लेने में असमर्थ हैं। बुनियादी ढांचे के लिए अनुदान/ऋण और निर्बाध आर्थिक मदद का तंत्र स्थापित करने के साथ-साथ वित्तीय आवंटन बढ़ाने की तत्काल जरूरत है। विश्वविद्यालयों को स्टार्ट-अप रॉयल्टी और विज्ञापन जैसे राजस्व विकल्पों का उपयोग करने के लिए भी मुक्त करने की दरकार है।
अनुसंधान अनुदान भी काफी कम हो गया है। यूजीसी की लघु व प्रमुख अनुसंधान परियोजना योजनाओं के तहत अनुदान वित्त वर्ष 2016-17 में 42.7 करोड़ रुपए से घटकर 2020-21 में 38 लाख रुपए रह गया है। भारत में 1043 विश्वविद्यालय हैं, पर महज 2.7 फीसद पीएचडी कार्यक्रमों की पेशकश करते हैं। विश्वविद्यालयों में अनुसंधान के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एनआरएफ) को अभी तक मंजूरी नहीं मिली है, जबकि ऐसे संस्थान मौजूदा योजनाओं (विज्ञान मंत्रालय सहित) के पूरक हैं। स्पष्ट रूप से अनुसंधान के लिए विश्वविद्यालयों के वित्त पोषण में उल्लेखनीय वृद्धि की आवश्यकता है।
दरअसल, फिलहाल जो आलम है उसमें शैक्षणिक मानकों और प्रक्रियाओं को बनाए नहीं रखा जा रहा है। परीक्षा का पेपर लीक होना आम बात हो गई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा के पर्चे जून 2021 में लीक हो गए थे। उम्मीदवारों ने ऐसे परीक्षा केंद्र संचालकों के बारे में बताया, जो प्रति उम्मीदवार तीन लाख रुपए लेकर उन्हें परीक्षा पास कराने में मदद करते हैं। हाल ही में, वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय ने 26,000 छात्रों को प्रभावित करते हुए चुनिंदा बीकॉम व बीए पाठ्यक्रमों के लिए परीक्षाओं का पुनर्निधारण किया। ऐसे तमाम संस्थान अपनी परीक्षाओं की शुचिता की रक्षा करने की बुनियादी जवाबदेही को निभाने में असफल रहे हैं। इसे सुधारने के लिए विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण के साथ विश्वविद्यालयों को अकादमिक कार्यक्रमों, पदोन्नति, समूह के आकार आदि पर निर्णय लेने की इजाजत देनी होगी। योग्यता को हतोत्साहित करने और संस्थागत उदासीनता के कारण देश के विश्वविद्यालय पिछड़ते रहे हैं।
भारत के विश्वविद्यालय ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्र अभिव्यक्ति के गढ़ और राष्ट्रवाद के केंद्र रहे हैं। दिल्ली स्थित हिंदू कॉलेज का उद्घाटन मदन मोहन मालवीय ने किया था। स्वाधीनता संघर्ष के दिनों में यह कॉलेज राजनीतिक बहस का केंद्र था। भारत छोड़ो आंदोलन में चेन्नई के क्वीन मैरी कॉलेज के छात्रों की भागीदारी भी इतिहास में दर्ज है।
दिलचस्प है कि अभिव्यक्ति की आजादी और राष्ट्रवाद के अधिकार के बीच के नाजुक संतुलन को सरकारों के अलग-अलग दौर में बढ़ावा मिलता रहा है। ऐसा इसलिए भी कि लोकतंत्र और नागरिक समाज को मजबूत करने में विश्वविद्यालयों की भूमिका से देश का नेतृत्व अवगत रहा है। पर अब यह संतुलन आखिर क्यों बिगड़ने लगा है? हमें अपने परिसरों में विचारों की विविधता के लिए सहिष्णुता को अपनाने की जरूरत है। हमारे छात्रों के पास रचनात्मक अनुभव हैं, उनके पास खुद को नागरिक के तौर पर जाहिर करने के लिए जगह होनी चाहिए। अगर अभिव्यक्ति की आजादी को बढ़ावा नहीं दिया गया तो हमारे विश्वविद्यालय आलोचनात्मक सोच का समर्थन कैसे करेंगे? विश्व स्तर पर देश के उच्च शिक्षा संस्थानों की हैसियत खासी कमजोर है। प्रतिष्ठित क्यूएस वल्र्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में शीर्ष 500 में सिर्फ आठ भारतीय विश्वविद्यालय हैं और यह स्थिति 2010 से तकरीबन एक जैसी है। इस बीच, चीन ने इस सूची में अपने विश्वविद्यालयों की गिनती 24 से अधिक कर ली है।
भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) में सामाजिक, नैतिक और भावनात्मक क्षमताओं और स्वभाव के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण सोच और समस्या समाधान को बढ़ावा देने पर खासा जोर दिया गया है। इसके लिए विश्वविद्यालयों के साथ छात्रों/संकायों की गतिविधियों के लिए अधिक धन, स्वायत्तता और सहिष्णुता के साथ एक उत्साहजनक पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत है। इसके बिना, प्रतिभाशाली भारतीय विदेश जाते रहेंगे, जबकि नीति निर्माता 'ब्रेन ड्रेन' के बारे में विलाप करते रहेंगे।

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