किसने घुसाया तेंदुआ?

जयपुर में गुरुवार को तेंदुआ फिर शहर में घुस गया। तेंदुए के शहर में घुसने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। इस बार वह पिछली बार की अपेक्षा शहर के ज्यादा अंदर तक आ गया।

Bhuwanesh Jain

14 Dec 2019, 10:44 AM IST

- भुवनेश जैन

जयपुर में गुरुवार को तेंदुआ फिर शहर में घुस गया। तेंदुए के शहर में घुसने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। इस बार वह पिछली बार की अपेक्षा शहर के ज्यादा अंदर तक आ गया। मुख्य सडक़ जवाहरलाल नेहरू मार्ग को पार कर एक पॉश कॉलोनी स्थित घरों और स्कूल में जा पहुंचा। शहरवासी कह रहे हैं, जंगल के जीव वन्य क्षेत्र की अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे हैं। इन्हें शहर से दूर खदेडऩे की आवाजें भी उठने लगी हैं।

यह सही है कि वन्य जीव अपना क्षेत्र छोडकऱ शहरों में घुस रहे हैं, पर क्या हम नागरिक अपनी सीमाओं को छोडकऱ वन्य क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं कर रहे ? जयपुर की ही बात नहीं है, देशभर में यही हाल है। जंगलों में इंसानों की घुसपैठ बढ़ेगी तो जानवर इंसानों की बस्तियों में घुसपैठ करेंगे ही। झारखण्ड-छत्तीसगढ़ में जंगली हाथी खेतों-गांवों को रौंद रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बाघ, रीछ गांवों में घुस रहे हैं। कहीं नील गायें खेतों को चौपट कर रही हैं तो कहीं जंगली बंदर शहरों में घुसकर उत्पात मचा रहे हैं।

लेकिन अव्यवस्था, अतिक्रमण और उत्पात के मामले में हम इंसान वन्य जीवों से बहुत आगे हैं। जयपुर का ही उदाहरण लें। पहली अव्यवस्था यह कि नगर नियोजन से जुड़े विभागों की लापरवाही से झालाना जैसा जंगल बस्तियों से घिर गया। झालाना पहाड़ी पर चारों तरफ मीलों में फैली कच्ची बस्तियों का अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है। अब ये बस्तियां पहाडिय़ों पर चढ़ती जा रही हैं। झालाना क्षेत्र में दिनों-दिन उपासना स्थल पनपते जा रहे हैं। बड़े-बड़े उत्सव आयोजन होने लगे हैं। अवैध खनन की गतिविधियां निर्बाध रूप से जारी हैं। यानी वन्य जीवों के घर में इंसानी हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।

दूसरी ओर, वन विभाग की नीतियां और कारगुजारियां इंसान और जानवरों की टकराहट की आग में घी डाल रही हैं। वन्य जीव संरक्षण की ये कैसी नीति कि जंतुओं की संख्या तो बढऩे दो पर उनके भोजन, पानी और ‘घर’ का कोई इंतजाम मत करो। जयपुर में पांच साल पहले 13 तेंदुए थे, आज इनकी संख्या 33 हो गई है। दूसरी ओर अतिक्रमण और ‘विकास’ के कारण उनका विचरण क्षेत्र सीमित हो गया। उनके भोजन-नीलगाय, चीतल जैसे जानवरों की संख्या कम हो गई। ‘भोजन’ के नाम पर खर्च होने वाला पैसा पता नहीं कौन हजम कर रहा है। तेंदुओं की बढ़ती तादाद को देखते हुए पानी के कुंड जैसी संरचनाएं बनाई जानी चाहिएं, पर गर्मी में प्यासे वन्यजीव पानी की तलाश में मारे-मारे फिरने को मजबूर हैं। यदि वन्य क्षेत्र तेंदुओं की संख्या के अनुपात में छोटा पडऩे लग गया तो अन्य स्थान पर पुनर्वास होना चाहिए।

कहने को वन विभाग राष्ट्रीय पार्क, अभयारण्य, टाइगर प्रोजेक्ट नामों से बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाता है। हर वर्ष अरबों का बजट भी उड़ा दिया जाता है, पर इंसान-जानवर की टकराहट पर उसका कोई ध्यान नहीं है। रणथम्भौर के बाघ पर्यटकों के मनोरंजन का साधन बन गए। होटलों का व्यवसाय दिन दूनी, रात चौगुनी गति से बढ़ रहा है। शिकार तक प्रायोजित किए जाने लगे हैं, लेकिन सबसे बड़ी आवश्यकता-वन्यजीवों के जंगल, भोजन और पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहें - पर कोई ध्यान नहीं दे रहा।

आज तेंदुए पानी और आवारा कुत्तों की तलाश में शहर में घुस रहे हैं। कल शायद पालतू मवेशियों और फिर इंसानों पर भी हमला कर सकते हैं। हो सकता है तब नगरवासियों की मांग पर वन्य विभागों को इन तेंदुओं पर कोई कठोर कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़े। अगर ऐसा होता है तो इसके लिए जिम्मेदार वन विभाग और वे सरकारी एजेंसियां होंगी जो इन मूक प्राणियों को निवास, भोजन और पानी उपलब्ध कराने के अपने कर्तव्य को नहीं निभा पा रही। यह कहना ज्यादा ठीक रहेगा कि ये ही वे विभाग हैं जो वन्यजीवों को इंसानी बस्तियों में घुसने को मजबूर कर रहे हैं।

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