चुनाव के वक्त ही क्यों जागती है नेताओं की अंतरात्मा

दल से निष्कासित व्यक्ति के लिए दरवाजे कम से कम छह वर्ष के लिए बंद होने चाहिए, जबकि होता यह है कि पार्टी से आज निकाला गया नेता तीन-छह माह बाद फिर उपयोगी हो जाता है।

 

 

By: Rajiv Ranjan

Published: 15 Nov 2018, 03:53 PM IST

राजीव तिवारी
आज एक वाट्सअप मैसेज मिला। मौजू लगा। यहां साझा कर रहा हूं। बौल मैसेज 'टिकट मिल गया तो देश बदल दूंगा, नहीं मिला तो पार्टी बदल लूंगा।' राजनीतिक क्षेत्र में आजकल जो चल रहा है, उसकी सजीव और सटीक व्याख्या इससे ज्यादा नहीं हो सकती। कहां जा रही है हमारी राजनीति और कितना गिर सकते हैं हमारे राजनेता। क्या लोकतंत्र के लिए यही उनका दायित्व है? बिना सत्ता, बिना कुर्सी क्या जनसेवा असंभव है?

क्या साबित करना चाहते हैं दल या स्थान बदल कर। वर्षों जिनकी सेवा की, क्या वे बेइमान थे या उनकी विचारधारा गलत थी। सोच गलत थी। आखिर चुनाव के समय टिकट नहीं मिलने या पार्टी में घटते रसूख के बाद ही हमारे माननीयों की अन्तरात्मा क्यों जागती है?

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों में टिकटों के लिए जो मार-काट मची है, उससे आमजन को समझ जाना चाहिए कि वे नेताओं के लिए गौण हैं। छत्तीसगढ़, तेलंगाना , मध्यप्रदेश और राजस्थान का हाल रोज मीडिया पर सामने आ रहा है। हजारों लोग अपने टिकट के लिए दिल्ली में डेरा डाले पड़े हैं। इनमें जितने उम्मीदवार हैं, उनसे कई गुना ज्यादा उनका हौसला अफजाई करने और टिकट बांटने वालों (आलाकमान) के सामने शक्ति प्रदर्शन के लिए ले जाए जाते है।

अमूमन एक उम्मीदवार के साथ कम से कम 40-50 समर्थक तो होते ही हैं। इनका रहने-खाने का खर्च कौन उठाता है? चुनाव आयोग कृपया ध्यान दे। टिकट मिलने के बाद का खर्च तो चुनाव खर्च में जुड़ जाएगा, लेकिन पहले टिकट के जुगाड़ के लिए बहाया गया धन किसके खाते में जुड़ेगा। उम्मीदवारों में असंतोष की एक बड़ी वजह यह भी होती है।

आजकल चुनाव से ज्यादा तो 'प्री चुनाव प्रिपरेशन' पर खर्च हो जाता है। पांच साल भले ही जनता के बीच नहीं गए, लेकिन चुनाव पूर्व एक महीना ये आलाकमान की आंखों में रहना चाहते हैं। स्क्रीनिंग और चुनाव अभियान समितियों के ढोक लगाते फिरते हैं। प्रदेश के बड़े नेता इनको फरिश्ते नजर आते हैं। लेकिन इधर टिकट कटा और उधर पिक्चर बदल जाती है। आस्था, सेवा, विचारधारा ऐसे पलटी मारती है कि गिरगिट भी शरमा जाए।

आखिर क्यों होता है यह सब? कौन दिखाता है इनको सपने? सीधी सी बात। सबको सत्ता चाहिए और इसके लिए जिताउ चेहरे ही होने चाहिए। लोकतंत्र क्या होता है? संविधान के पन्नों से बाहर यहां दिखाई नहीं देता। सारा दोष इन हारे-थके घोड़ों (उम्मीदवारों) का नहीं, रेसकोर्स चलाने वाले आलाकमानों का है। क्या उनके प्रदेश नेतृत्व इतने कमजोर और खोखले हैं कि पांच साल में यह तय नहीं कर पाते कि कौन नेता किस क्षेत्र में पार्टी और जनता की अगुआई कर सकता है।

अगर ऐसा है तो सबसे पहले ऐसे नेताओं को बदलना चाहिए। इनकी क्षमताओं पर ही नहीं, आलाकमान की क्षमता पर भी सवाल उठने चाहिए। यदि केन्द्रीय और प्रादेशिक नेतृत्व सक्षम हो तो चुनाव के समय उम्मीदवारों की मंडी लगे ही नहीं। नेता 'दल बदलू' बने ही नहीं।
पार्टियों को अपने संविधान और नियम भी बदलने चाहिए। इनमें सबसे पहले अवसरवादिता खत्म होनी चाहिए। दल से निष्कासित व्यक्ति के लिए दरवाजे कम से कम छह वर्ष के लिए बंद होने चाहिए। अब तक होता यह है कि पार्टी से आज निकाला गया नेता तीन-छह माह बाद ही फिर से वफादार और उपयोगी हो जाता है। यह सोच जब तक रहेगी, लोकतंत्र का इसी तरह उपहास बनता रहेगा और नादान जनता रेसकोर्स में उतारे गए जिताऊ 'घोड़ों' पर मनमर्जी दावं लगाती रहेगी।

देश और समाज की इससे खराब नियति और क्या हो सकती है? छह माह बाद आम चुनाव होने हैं, दृश्य फिर दोहराया जाएगा। कुछ खुश, कुछ नाराज होंगे, इधर से उधर और उधर से इधर आएंगे-जाएंगे। संसद, विधानसभा, चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय मंथन करें, देश को सबसे बड़ी कुप्रथा से कैसे निजात दिलाएं? जनता तो बस टकटकी बांधे है।

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