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प्रसंगवश : बिजली कंपनियों की नाकामी आम जनता क्यों भुगते

बिजली कंपनियों का गठन सिर्फ नाम परिवर्तन, घाटे का सौदा व उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ साबित हुआ है। बिजली कंपनियों के गठन के समय परिकल्पना की गई थी कि बिजली विभाग के कर्मचारी और अधिकारी अधिक कर्मठता के साथ कार्य निष्पादन करेंगे और कंपनियों को लाभ में ला कर प्रदेश के बिजली क्षेत्र की कायापलट कर देंगे। पर नतीजा ढाक के तीन पात रहा है।

नई दिल्ली

Published: November 17, 2021 09:46:11 am

नई दिल्ली। बिजली, पानी और सड़क। इन तीन सुविधाओं को आम तौर पर मूलभूत सुविधाएं माना जाता है। पानी अभी भी राजस्थान के अधिकांश घरों के लिए दूर की कौड़ी है। ग्रामीण सड़कों के हाल किसी से छुपे नहीं हैं।
राजमार्गों पर चलने की कीमत टोल टैक्स के रूप में हर शख्स चुकाने को मजबूर है। बिजली के बिल तेजी से बढ़ते जा रहे हैं तो बिजली संकट का इलाज कटौती की शक्ल ले रहा है।
Electricity Company
तीनों ही सुविधाओं को, जिन्हें मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी मानी जाती है, सरकार धीरे-धीरे दुधारू गाय समझने लगी है।

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सरकार ने बिजली कंपनियों के कामकाज को सुधारने के लिए इन्हें कंपनियों में बांटा था। लेकिन कंपनियां बनने के बाद भी हालात में कोई सुधार नहीं आया है। अपनी नाकामी को किसी न किसी प्रकार से ये कंपनियां उपभोक्ता की जेब पर डाल देती हैं।
प्रदेश में भारी बिजली छीजत किसी से छुपी नहीं है। पर इस पर लगाम लगाने की बजाय घाटे के अलग-अलग कारण बता उन कारणों के नाम पर आम उपभोक्ता से वसूली जारी है। अब एक बार फिर 33 पैसे प्रति यूनिट फ्यूल सरचार्ज लगाया गया है।
2014 से अब तक 14 बार उपभोक्ताओं पर यह भार डाला जा चुका है। कंपनियों का तर्क है कि टैरिफ निर्धारित होने से वास्तविक खरीद व अनुबंध खरीद दर के बीच अंतर की राशि को फ्यूल सरचार्ज के रूप में वसूला जाता है।
पर क्या इन कंपनियों की ओर से कभी इस अंतर में होने वाली बचत के आधार पर उपभोक्ताओं को फ्यूल रिबेट भी देने का विचार कंपनियों के जेहन में आया है? कंपनियां केवल लेना ही जानती हैं। क्योंकि उनकी लचर कार्यप्रणाली के कारण वे घाटे से उबर ही नहीं पाती और खमियाजा भुगतता है ईमानदार उपभोक्ता।
बिजली कंपनियों के गठन के समय परिकल्पना की गई थी कि बिजली विभाग के कर्मचारी और अधिकारी अधिक कर्मठता के साथ कार्य निष्पादन करेंगे और कंपनियों को लाभ में ला कर प्रदेश के बिजली क्षेत्र की कायापलट कर देंगे। पर नतीजा ढाक के तीन पात रहा है।
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बिजली कंपनियों में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है। राज्य सरकार कंपनी के घाटे की जिम्मेदारी उठाती है, पर घाटे के लिए जिम्मेदार अफसरों को घर का रास्ता नहीं दिखाती।

सरकार और कंपनियों को ईमानदार उपभोक्ताओं पर भार बढ़ाने की बजाय कंपनियों को फायदे में लाने के उपाय करने चाहिए। बिजली चोरी करने वालों पर शिकंजा कसना चाहिए। (अ.सिं.)

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