कॉल डाटा रिकॉर्ड क्यों खंगाल रही सरकार ?

मंत्रियों, सांसदों, राजनेताओं, न्यायाधीशों और अन्य वीआईपी इलाकों वाले सर्किल की विस्तृत जानकारी हासिल करने का उद्देश्य कम-से-कम असामाजिक और आतंकवादी गतिविधियों पर नजर रखना तो नहीं ही हो सकता, जिसका हवाला देकर सरकार एक हद तक के बाद निजता के अधिकार को चुनौती देती रही है।

Mukesh Kumar Bhushan

18 Mar 2020, 09:30 PM IST

क्या भारत सचमुच एक सर्विलांस स्टेट बन गया है? यानी ऐसा देश जहां सरकार के सामने किसी व्यक्ति की निजता सुरक्षित नहीं रह गई है। यह सवाल तब फिर उठा, जब खबर आई कि नियम-कानूनों को दरकिनार करते हुए सरकार दूरसंचार कंपनियों से लगातार बड़े स्तर पर कॉल डाटा रिकॉर्ड (सीडीआर) मांग रही है। यही नहीं, ऐसा करते हुए उसने अपने ही बनाए कानूनों को ताक पर रख दिया है।

भूत सरसों में ही छिपा हो तो उसे कौन भगाएगा!

इससे तंग आकर दूरसंचार कंपनियों के संगठन सेल्युलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) ने 12 फरवरी को दूरसंचार सचिव अंशु प्रकाश से शिकायत भी की है। चूंकि दूरसंचार मंत्रालय ही अवैध तरीके से सीडीआर मांग रहा है, इसलिए यह समझना मुश्किल नहीं कि सीओएआई की शिकायत का क्या हुआ होगा? जब भूत सरसों में ही छिपा हो तो उसे कौन भगाएगा!


मंत्रियों, सांसदों, राजनेताओं, न्यायाधीशों और अन्य वीआईपी इलाकों वाले सर्किल की विस्तृत जानकारी हासिल करने का उद्देश्य कम-से-कम असामाजिक और आतंकवादी गतिविधियों पर नजर रखना तो नहीं ही हो सकता, जिसका हवाला देकर सरकार एक हद तक के बाद निजता के अधिकार को चुनौती देती रही है। ऐसा उद्देश्य होता तो कानूनी प्रावधानों के अनुसार व्यक्ति विशेष की निगरानी करने का रास्ता तो सरकार के पास है ही। फिर क्या वजह हो सकती है कि खास इलाकों में कुछ खास तरीखों की सीडीआर ही तलब की गई है? सरकार को इसके जवाब के साथ सामने आना चाहिए।

उनके निजता के अधिकार की धज्जियां

तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अपने ही नागरिकों की खुफिया निगरानी करना और उनके निजता के अधिकार की धज्जियां उड़ा देने का सरकारी चलन दुनियाभर में तेजी से जोर पकड़ रहा है। अमरीका और इंग्लैड जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी सरकारों को यह खूब रास आ रहा है। रूस और चीन जैसे देश तो पहले से ही इसके लिए बदनाम रहे हैं। हालांकि, सरकारें जनता की सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों का हवाला देकर ही ऐसा कर रहीं हैं।

भारत का स्थान तीसरा

पिछले अक्टूबर में ब्रिटेन स्थित एक रिसर्च कंपनी 'कंप्रिटेक’ ने 47 देशों में शोध के बाद रिपोर्ट दी थी कि जनता की सरकारी निगरानी के मामले में भारत का स्थान तीसरा है। उसकी रिपोर्ट के अनुसार रूस पहले स्थान पर और चीन दूसरे स्थान पर है। थाईलैंड चौथे और मलेशिया पांचवे स्थान पर। हालांकि, इस रिपोर्ट में यूरोपीय संघ (ईयू) की स्थिति अच्छी बताई गई है और ईयू से अलग देशों में नार्वे को सबसे अच्छा बताया गया है, जहां निजता की सुरक्षा के पूरे प्रावधान हैं।

फेस रिकॉग्निशन डिवाइस का इस्तेमाल

पिछले कुछ महीनों में जब भारत में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ बड़ी संख्या में लोग सडक़ों पर उतर आए, तो चार घटनाओं ने हमारा ध्यान खींचा। प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए दिल्ली पुलिस ने फेस रिकॉग्निशन डिवाइस का इस्तेमाल किया। चेन्नई में प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। हैदराबाद में राह चलते व्यक्ति का फिंगर प्रिंट लेकर उसका आपराधिक रिकॉर्ड खंगालने की कोशिश की गई। चौथी घटना उत्तर प्रदेश की है, जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। इसमें फेस रिकॉग्निशन डिवाइस का इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें उपद्रवी के तौर पर चौराहों पर चस्पा कर दी गईं।


जाहिर है, हम ऐसे दौर में हैं, जब फेस रिकॉग्निशन/ फिंगर प्रिंट हासिल होते ही सरकार बैंक खातों से लेकर फेसबुक अकाउंट तक आसानी से खंगाल सकती है। सरकार की मंशा में खोट न हो तब तक तो इसका कोई खतरा भले ही न दिखे, पर मंशा बदलते ही ऐसी निजी सूचनाओं का दुरुपयोग करने से उसे कौन रोक सकता है? दूरसंचार कंपनियों से अवैध तरीके से सीडीआर हासिल करने के पीछे क्या कोई अच्छी मंशा भी हो सकती है?

कानून काफी लचर

हमारे यहां डिजिटल डाटा सुरक्षित रखने के कानून काफी लचर हैं, इसे मजबूत बनाने की तमाम कोशिशें अदालतों में दौड़ लगा रही हैं। करीब सवा करोड़ लोगों की जानकारी आधार प्रणाली के पास जमा है। सीसीटीवी से निगरानी संबंधित नियम-कानून भी स्पष्ट नहीं हैं। दिसंबर 2018 में दस एजेंसियों को किसी भी कम्यूटर या डिवाइस से जानकारी हासिल करने का अधिकार दे दिया गया है। हालांकि, जानकारी हासिल करने के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं। जानकारी नहीं देने पर भी कड़ी सजा का प्रावधान है।


सवाल फिर वहीं आकर टिक जाता है कि नियम तो सख्त बनाए जा सकते हैं, मगर सरकार की मंशा ठीक न हो और वह नियमों का पालन नहीं करना चाहे तो क्या होगा? दूरसंचार कंपनियों की शिकायत पर सरकार की कार्रवाई से यह तय होगा कि हम वाकई सरकारी निगरानी वाले देश में हैं या नहीं, इसलिए सरकार को अपनी मंशा जरूर स्पष्ट करनी चाहिए।

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