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प्रसंगवश: वाहवाही लूटने की होड़ में बच्चों का नुकसान क्यों?

बजट घोषणा की पालना में हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम में धड़ाधड़ बदला जा रहा है

Published: July 08, 2022 08:46:48 pm

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा दिलाने के मकसद से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बजट घोषणा के मुताबिक इन दिनों बड़ी संख्या में गांव-शहरों के स्कूल हिन्दी माध्यम से अंग्रेजी माध्यम में बदले जा रहे हैं। लेकिन व्यावहारिकता पर विचार किए बिना जारी किए गए सरकार के फरमान पर सवाल उठने लग गए हैंं। खास तौर से अभिभावकों का कहना है कि जब समूचा स्कूल ही हिन्दी माध्यम से अंग्रेजी माध्यम में बदल जाएगा तो जो बच्चे व शिक्षक हिन्दी माध्यम में ही पढ़ना-पढ़ाना चाहेंगे उनका क्या होगा? कहा तो यही जा रहा है कि शिक्षा विभाग के अफसर बजट घोषणा पूरी करने का श्रेय बटोरने व जनप्रतिनिधियों को खुश करने के लिए आनन-फानन में यह फैसला ले रहे हैं।
अभिभावकों के सामने संकट यह खड़ा हो गया है कि यदि वे अपने बच्चों को हिंदी माध्यम में ही पढ़ाना चाहते हैं तो या तो स्कूल छोड़ें या फिर पढ़ाई। यह बात सही है कि शहरों में अंग्रेजी माध्यम वाले सरकारी स्कूलों में बच्चों के दाखिले के लिए लोगों में उत्साह है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में ऐसा नहीं है। कई गांव ऐसे भी हैं, जहां इक्का-दुक्का ही सरकारी स्कूल हैं। इन्हें ही यदि अंग्रेजी माध्यम में बदल दिया गया तो बच्चे पढ़ेंगे कहां? खास तौर से उन स्कूलों में तो यह फैसला काफी भारी पड़ रहा है जहां बच्चों का नामांकन पांच सौ से एक हजार तक का है। अपेक्षाकृत कम नामांकन वाले स्कूलों का चयन इस समस्या का एक समाधान हो सकता था। कायदे से तो सरकार को अलग से अंग्रेजी माध्यम के नए स्कूल खोलने चाहिए थे। हो सकता है संसाधनों की कमी की बाधा रही हो। सवाल अंग्रेजी माध्यम के स्कूल शुरू होने का ही नहीं, सवाल यह भी है कि इनमें शिक्षण-प्रशिक्षण का प्रभावी बंदोबस्त क्या निजी स्कूलों की माफिक हो सकेगा?
मुख्यमंत्री ने अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के लिए 10 हजार शिक्षकों की भर्ती कर इनका अलग कैडर बनाने की घोषणा की थी, लेकिन भर्ती पूरी होने से पहले ही अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोलने का सिलसिला जारी है। निजी स्कूलों से प्रतिस्पर्धा के लिए अंग्रेजी माध्यम के सरकारी स्कूल खोलने पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन सिर्फ जनप्रतिनिधियों को खुश करने और थोथी वाहवाही के लिए ऐसा कोई कदम उठाया जाता है तो इससे न शिक्षा जगत का भला होगा और न ही देश की भावी पीढ़ी का। (सु.व्या.)
प्रतीकात्मक चित्र
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