scriptWhy is dynasty not ending in politics? | आपकी बात, राजनीति में परिवारवाद खत्म क्यों नहीं हो पा रहा? | Patrika News

आपकी बात, राजनीति में परिवारवाद खत्म क्यों नहीं हो पा रहा?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

Published: November 30, 2021 04:45:38 pm

लोकतंत्र और राजतंत्र
इसमें कोई दो राय नहीं है कि लोकतंत्र कमोबेश राजतंत्र का रूप ले चुका है। राजतंत्र में अन्य योग्य जनों की तुलना में राज परिवार के लोगों को ही सत्ता सौंपी जाती है। यह प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में भी घुस गई है। ऐसे में आम आदमी को राजनीति में अवसर ही नहीं मिल पाता। परिवारवाद के लिए जनता की सोच भी कमोबेश जिम्मेदार है। जैसे राजा के बेटे को राजकुमार माना जाता था, वैसे ही नेता के बेटे को नेता स्वीकार कर लिया जाता है। राजनीति में परिवारवाद को रोकने के लिए समाज को भी सकारात्मक भूमिका निभानी होगी, तभी राजनीति में परिवारवाद को रोका जा सकता है ।
-पूरण सिंह राजावत, जयपुर
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अयोग्य व्यक्ति का न करें चयन
भारतीय लोकतंत्र में आजादी के बाद से ही परिवारवाद हावी रहा है। ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन चुके हैं। पार्टी में भाई भतीजावाद स्पष्ट दिखाई देता है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है। इससे निजात पाने के लिए जरूरी है कि किसी परिवार के अयोग्य व्यक्तियों का चयन न कर कर्मठ ईमानदार एवं देश की सेवा करने वाले लोगों को ही जनप्रतिनिधि चुनें।
-सतीश उपाध्याय, मनेंद्रगढ़ कोरिया, छत्तीसगढ़
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आपकी बात, राजनीति में परिवारवाद खत्म क्यों नहीं हो पा रहा?
आपकी बात, राजनीति में परिवारवाद खत्म क्यों नहीं हो पा रहा?
क्षमतावान लोगों को ही आगे बढ़ाएं
राजनीति में परिवारवाद खत्म नहीं हो रहा है। लोकतंत्र के लिए परिवारवाद सदैव घातक है। प्रतिभाशाली और क्षमतावान लोगों को आगे आकर परिवारवाद की राजनीति को खत्म करना चाहिए, तभी हमारे राष्ट्र का ऊंचाइयों पर जाना संभव होगा।
मधु भूतड़ा, जयपुर
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परिवारवाद लोकतंत्र का शत्रु
सभी चाहते हैं कि उनके अनुभवों का लाभ उनके आने वाली पीढ़ी को मिले। उनका वंशज उस स्थान के लिए उपयुक्त हो, तो इसमें बुराई भी नहीं। यदि अयोग्य उस पद पर पहुंच जाए, जिस पद के वह योग्यता न हो, तो इसे ठीक नहीं माना जाएगा। यह योग्य व्यक्ति को हाशिए पर छोड़ देने जैसा है, तब राजनीति में परिवारवाद लोकतंत्र का शत्रु बन जाता है। यह अधिनायक तंत्र को प्रोत्साहित करता है। देश में एकाधिकार की प्रवृत्ति जोर पकड़ती है।
-एकता शर्मा, गरियाबंद, छत्तीसगढ़
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नेताओं का कुर्सी मोह
अक्सर ऐसा देखा गया है कि वृद्ध होने के बावजूद नेताओं का कुर्सी मोह छूटता ही नहीं। इसलिए वे चाहते हैं कि परिवार के किसी व्यक्ति के सहारे राजनीति जारी रखी जाए। इससे परिवार के सदस्य का भी करियर सेट हो जाएगा, चाहे उसमें उसके लायक योग्यता हो या न हो।
-सरिता प्रसाद, पटना बिहार
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राजनीति का व्यावसायीकरण
कभी राजनीति नि:स्वार्थ जनसेवा के लिए ही होती थी, किन्तु अब उसका व्यावसायीकरण हो गया है। अब राजनीति को व्यापार बढ़ाने ,दौलत व शोहरत कमाने का माध्यम बना लिया गया है। नेता अपनी संतानों को भी राजनीति में सक्रिय कर देते हैं। हर राजनीतिक पार्टी यह प्रवृत्ति बढ़ रही है।
-शकुंला महेश नेनावा, इंदौर, मध्यप्रदेश
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पारिवारिक सदस्यों को ही प्राथमिकता
भारत के ज्यादातर राजनीतिक दल पूर्ण लोकतांत्रिक नहीं हैं। इस वजह से राजनीति के क्षेत्र में निचले स्तर के व्यक्तियों का उच्च पदों पर जा पाना कठिन हो जाता है। उच्च पदों पर आसीन ज्यादातर राजनेता अपने पारिवारिक सदस्यों को ही प्राथमिकता देते हैं। इस वजह से परिवारवाद और भाई-भतीजावाद चरम पर है।
-विजय महाजन प्रेमी, वृंदावन मथुरा
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अंधभक्ति का असर
राजनीति में अनुभव अहम है। जो युवा बचपन से परिवार में राजनीतिक गतिविधियों के वातावरण में बड़ा हुआ हो, उसे राजनीतिक दांवपेच के बारे में ज्यादा समझ होती है। उसमें नेता बनने की ख्वाहिश भी घर कर जाती है। जनता भी उसे योग्य पात्र समझने लगती है । जनता की परख विश्लेषणात्मक होने से परिवारवाद कम हो सकता है। परिवारवाद अंधविश्वास और अंधभक्ति का परिणाम है।
-मुकेश भटनागर, भिलाई, छग
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जनता को होना होगा जागरूक
जो परिवार एक बार राजनीति से जुड़ जाता है, वह उसे छोडऩा नहीं चाहता। येन-केन-प्रकारेण उसका लक्ष्य सत्ता हासिल करने का ही रहता है। यह विडंबना है कि लोग राजनीति से जल्दी से जुडऩा भी नहीं चाहते और जुड़े हुए लोग उसे छोडऩा नहीं चाहते। राजनीति में अपराध, काला धन और बाहुबल का बोलबाला है। इससे आम लोग चुनाव लडऩे के बारे में भी सोच नहीं पाते। परिवारवाद खत्म करने में राजनीतिक दलों की प्रमुख भूमिका हो सकती है। परिवारवाद खत्म करने के लिए जनता को भी जागरूक होना चाहिए।
-अंकित शर्मा, जयपुर
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राजनीति अब सेवा नहीं व्यवसाय
राजनीति अब व्यवसाय बनकर रह गई है। पहले लोग समाजसेवा के लिए राजनीति में आते थे, लेकिन अब व्यवसाय के लिए आते है। चुनाव में करोड़ों रुपए खर्च करते हैं, जो एक तरह से पूंजी लगाकर व्यवसाय शुरू करने जैसा है। इसलिए राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा मिल रहा है।
-सालूराम सियोल चौधरी, गुड़ामालानी, बाड़मेर

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