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आपकी बात: देश बार-बार के चुनावी चक्कर से आजाद क्यों नहीं हो पा रहा?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं

Updated: June 02, 2022 08:20:05 pm

लहर से डरते हैं राजनीतिक दल
देश बार-बार के चुनावी चक्कर से आजाद इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि इसके लिए राजनीतिक पार्टियों के पास इच्छा शक्ति नहीं है। राजनीतिक पार्टियों को डर है कि कहीं अगर एक साथ हो गया तो देश में जिसकी लहर होगी वही विजेता होगा। इसलिए कोई भी नहीं चाहता। बातें जरूर करते हैं लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। ऐसा कौन सा कानून है जो बन नहीं सकता। जब देश हित की बात हो और जिसमें खर्चों में कमी से लेकर के विभिन्न प्रकार की विकास योजनाओं को गति मिले, ऐसा कार्य तत्परता के साथ यथाशीघ्र करके देश को आगे बढ़ाना चाहिए।
- संजय माकोड़े, बड़ोरा बैतूल
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
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गठबंधन की राजनीति जिम्मेदार
गठबंधन वाली राजनीति बार-बार चुनाव का सिर्फ एक ही कारण है। इसमें किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता और सहयोगी पार्टी बीच रास्ते में साथ छोड़ देती हैं। इस कारण चुनाव की नौबत आती है। बेवजह करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं सो अलग।
- प्रियव्रत चारण, जोधपुर
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एक साथ चुनाव ही समाधान
लोकतांत्रिक देशों में चुनाव एक आवश्यक प्रक्रिया है। लोकतंत्र में ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, नगर समिति, प्रदेशों की विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा तथा राष्ट्रपति के चुनाव के साथ विभिन्न छात्र संगठनों सोसाइटियों और कर्मचारी संगठन के चुनाव सभी जरूरी हैं। ये चुनाव लोकतंत्र की खूबी भी हैं और आवश्यक बुराई भी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कोशिश की जानी चाहिए कि मध्यावधि चुनाव नहीं हों तथा ज्यादातर संगठनों के चुनाव एक साथ हो जाएं जिससे धन की बर्बादी न हो।
- डॉ. माधव सिंह, श्रीमाधोपुर
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चुनावी मकड़जाल
देश में बार-बार चुनाव से केवल धन की ही नहीं, संसाधनों की भी बर्बादी होती है। सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति भी इस विषय को लेकर धीरे-धीरे क्षीण पड़ती प्रतीत हो रही है।
- सी.आर. प्रजापति, हरढ़ाणी जोधपुर
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शासन व्यवस्था से हटता नेताओं का ध्यान
देश में बार-बार चुनाव के चलते नेताओं का ध्यान शासन व्यवस्था के बजाय चुनाव पर केंद्रित रहता है। देश में वन नेशन-वन इलेक्शन की प्रणाली लागू होनी चाहिए। सभी राजनीतिक दलों को मिल-बैठ कर विचार-विमर्श करके इस मुद्दे का हल निकालना चाहिए।
- शुभम वैष्णव, सवाई माधोपुर, राजस्थान
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एक साथ हों चुुनाव
एक साथ चुनाव करवाए जाने से समय और पैसों की बचत के साथ देश को बार-बार के चुनावी चक्कर से आजादी मिल पाएगी। चुनाव अवधि पांच साल को सात अथवा दस बरस करके भी बार-बार होने वालों चुनावों से मुक्ति पाई जा सकती है।
- नरेश कानूनगो, देवास, मध्यप्रदेश
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जनता ही आए आगे
जनता जब तक खुद नहीं समझेगी कि बार-बार देश पर चुनाव थोप कर सिर्फ स्वार्थ सिद्धि के लिए मतदाताओं का इस्तेमाल किया जाता है, तब-तक इन चुनावों के चक्कर से देश को आजादी नहीं मिल सकती हैं। अब यह एक 'परंपरा' बन चुकी है। इससे छुटकारा दिलाने के लिए सभी राजनीतिक दलों को स्वयं एकजुट होकर पहल करनी होगी।
- मनीष कुमार सिन्हा, रायपुर, छत्तीसगढ़
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लोकतंत्र की कल्पना अधूरी
लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव एक ऐसा अवसर होता है जब लोगों से जुड़े मुद्दों पर विमर्श होता है। यह भी परखा जाता है कि इन मसलों पर सरकार का क्या रुख रहा। लेकिन हाल के दिनों के चुनाव अभियानों से यह चीज गायब होती नजर आ रही है, साथ ही सामूहिक विमर्श का भाव भी लुप्त होता दिखाई दे रहा है। पार्टियां चुनाव जीतने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाती हैं। ऐसे में चुनावों के माध्यम से चुने गए प्रतिनिधियों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। लेकिन चाह कर भी हम इस दोषपूर्ण चुनावी प्रक्रिया से मुक्त नहीं हो पा रहे।
- अजिता शर्मा, उदयपुर

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