प्रसंगवश : राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना में गंभीरता गौण क्यों ?

National Food Security Plan : खेदजनक यह है कि योजनाओं में कोई न कोई खामी निकल ही आती है और उन्हें अनदेखा किया जाता है।

By: Patrika Desk

Published: 10 Sep 2021, 09:37 AM IST

सरकारी स्तर पर लंबित मामलों के निस्तारण में अक्सर बरती जाने वाली उदासीनता की यह पराकाष्ठा ही तो है कि पिछले नौ साल से एक मामला सिर्फ पत्र-व्यवहार में ही अटका रह गया। जिम्मेदार किसी अंतिम या निर्णायक फैसले पर पहुंच पाते उससे पहले गोदाम में पड़ा गेहूं मिट्टी में तब्दील होने लगा है। इस गेहूं पर सरकारी का तमगा लगा है, लिहाजा कहीं फेंका भी नहीं जा सकता। यह मामला झालावाड़ जिले से जुड़ा है, जहां अफसरों की लापरवाही से अन्नपूर्णा योजना का तीन सौ क्विंटल गेहूं गोदामों में ही सड़ गया। योजना को राज्य सरकार ने करीब नौ साल पहले बंद कर दिया, जिसके तहत अत्यंत गरीब परिवारों को हर माह दस किलो गेहूं निशुल्क दिया जाता था। अफसर समय पर चेत जाते तो यह गेहूं किसी गरीब का निवाला तो बनता। अब यह पशुओं के खाने लायक बचा है या नहीं, इसके लिए पशुपालन विभाग की रिपोर्ट का इंतजार है।

पुराने अनुभवों को देखते हुए इस बात की उम्मीद कम ही है कि यह रिपोर्ट भी समय पर मिल जाएगी। बात झालावाड़ के इस मामले की ही नहीं है। वर्तमान में संचालित योजना में भी कोई न कोई खामी उजागर हो ही जाती है। पिछले माह की बात है। श्रीगंगानगर में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) से गेहूं का उठाव कर उचित मूल्य दुकानदारों को भेज दिया गया और इसमें गुणवत्ताहीन गेहूं पाया गया। अफसोसजनक यह है कि इसकी जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार तक नहीं हुआ। काफी शोर-शराबे के बाद एफसीआइ ने गुणवत्ता निरीक्षक को निलंबित किया।

अपात्र होने के बावजूद चयनित होकर लंबे समय तक लाभ उठाने का मामला तो अभी तक भी शांत नहीं हुआ है। करीब दो साल पहले यह मामला पकड़ में आया तो सरकार ने जांच के बाद 27 रुपए किलो के हिसाब से राशि वसूली के निर्देश दिए थे। निर्देशों से बात नहीं बनी तो राज्य सरकार को एफआइआर दर्ज करवाने की घुड़की तक देनी पड़ी थी, जिसके बाद लाभ उठाने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने बड़ी संख्या में पैसे जमा करवाए। अब भी काफी राशि जमा होना शेष है। योजनाओं में समय-समय पर उजागर होने वाली इन खाामियों को लंबे समय तक दुरुस्त न करना, उनसे सबक न लेना चिंताजनक है। योजना का लाभ पात्रों को समय पर मिले, इसके लिए जरूरत खामियों पर तत्काल संज्ञान लेने की है। (म.सिं)

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