scriptWhy is the issue of centralized recruitment debated in lower courts? | ये भी जानें : निचली अदालतों में केंद्रीकृत भर्ती के मुद्दे पर बहस क्यों | Patrika News

ये भी जानें : निचली अदालतों में केंद्रीकृत भर्ती के मुद्दे पर बहस क्यों

क्योंकि : जानना जरूरी है...
1958 में विधि आयोग की रिपोर्ट में सबसे पहले केंद्रीकृत न्यायिक सेवा का विचार आया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी निर्देश दिए।
50 जज होने चाहिए 10 लाख की आबादी पर विधि आयोग के अनुसार। अभी यह संख्या लगभग 19 ही है। इससे लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ रही है।

नई दिल्ली

Published: November 08, 2021 03:27:21 pm

जजों की केंद्रीकृत भर्ती के सुझाव पर दशकों से बहस चल रही है और यह मुद्दा विवादास्पद बना हुआ है। केंद्र सरकार केंद्रीय सिविल सेवाओं की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (एआइजेएस) की स्थापना के लिए नए सिरे से कवायद करने कर रही है। कानून मंत्री किरन रिजिजू ने एआइजेएस और निचली अदालतों में बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए राज्य के कानून मंत्रियों की बैठक बुलाई है। यह बैठक इस माह के अंतिम सप्ताह में प्रस्तावित है। जिस तरह यूपीएससी केंद्रीय भर्ती प्रक्रिया का आयोजन करता है, उसी तर्ज पर निचली अदालतों के जजों की केंद्रीय भर्ती करने का प्रस्ताव है। इसे अतिरिक्त जिला जजों और जिला जजों की नियुक्ति में सुधार के रूप में देखा जा रहा है। संविधान के अनुच्छेद 233 और 234 में जिला जजों की नियुक्ति से जुड़े प्रावधान हैं। प्रांतीय सिविल सेवा (न्यायिक) को आमतौर पर न्यायिक सेवा परीक्षा के रूप में जाना जाता है।

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एआइजेएस का प्रस्ताव क्यों?
सबसे पहले विधि आयोग की 1958 की 'रिपोर्ट ऑन रिफॉम्र्स ऑन ज्यूडिशियल एडमिनिस्ट्रेशन' में केंद्रीकृत न्यायिक सेवा का विचार सामने आया था। विधि आयोग की 1978 की रिपोर्ट में इस विचार को फिर प्रस्तावित किया गया। 2006 में, कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसदीय स्थाई समिति ने अपनी 15वीं रिपोर्ट में एआइजेएस के विचार का समर्थन करते हुए एक मसौदा विधेयक भी तैयार किया। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में केंद्र सरकार को एआइजेएस के गठन का निर्देश दिया। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने जिला जजों की नियुक्ति मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिया और केंद्रीय चयन तंत्र का प्रस्ताव रखा। वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने अलग राज्यों की परीक्षा की बजाय एक आम परीक्षा आयोजित करने की सिफारिश की। दातार ने कहा कि यह संवैधानिक ढांचे को नहीं बदलेगा। राज्यों या हाईकोर्ट की शक्तियों पर भी असर नहीं पड़ेगा।

क्यों हो रहा विरोध?
केंद्रीकृत भर्ती प्रक्रिया को संघवाद के अनादर और राज्यों की शक्तियों के अतिक्रमण के रूप में देखा जा रहा है। कई राज्यों का तर्क है कि केंद्रीय भर्ती उन विशिष्ट चिंताओं को दूर करने में सक्षम नहीं होगी, जो अलग-अलग राज्यों की है। उदाहरण के तौर पर क्षेत्रीय भाषाओं में होने वाला कामकाज केंद्रीय भर्ती से प्रभावित हो सकता है। राज्यों का जातिगत आरक्षण भी उनका प्रमुख तर्क है। कानूनी विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि एआइजेएस से निचली अदालतों के संरचनात्मक मुद्दों का समाधान नहीं हो सकेगा।

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