एक साथ चुनाव का मुद्दा बेनतीजा क्यों

- राजस्थान में भी 12 जिलों में जिला परिषद व पंचायत चुनाव होने हैं। ये चुनाव महीनों से टलते आ रहे हैं। उम्मीद है राजस्थान भी मध्यप्रदेश व कर्नाटक सरकार की राह पर जाएगा।

By: विकास गुप्ता

Published: 20 Apr 2021, 06:57 AM IST

समझदार उसे कहते हैं जो समय पर चेत जाए। खासकर तब, जब हालात सामान्य न हों। कर्नाटक सरकार ने सोमवार को पंचायत चुनाव टालने का फैसला किया और पिछले महीने मध्यप्रदेश सरकार ने भी अदालत के दखल के बाद स्थानीय निकायों के चुनाव टाल दिए थे। राजस्थान में भी 12 जिलों में जिला परिषद व पंचायत चुनाव होने हैं। ये चुनाव महीनों से टलते आ रहे हैं। उम्मीद है राजस्थान भी मध्यप्रदेश व कर्नाटक सरकार की राह पर जाएगा। लोकतंत्र में चुनाव के महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन क्या जान की कीमत पर चुनाव कराने का जोखिम लिया जा सकता है? ताजा उदाहरण हमारे सामने है।

चुनाव के बाद केरल और तमिलनाडु में हुआ कोरोना विस्फोट चौंकाने वाला है। एक महीने पहले केरल में एक दिन में दो हजार मामले सामने आए थे। अब यह संख्या बढ़कर 18 हजार पार हो गई। ऐसे ही एक महीने पहले तमिलनाडु में एक हजार मामले, अब दस हजार पार हो चुके हैं। पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी की तस्वीर भी इनसे अलग नहीं है।

बीमारी के कारण चुनाव टालने का मामला पहले कभी सामने नहीं आया। पंजाब और कश्मीर में हिंसा के चलते पहले चुनाव टाले जा चुके हैं। कोरोना महामारी को अलग भी कर दिया जाए, तो देश हर छह महीने में चुनाव का सामना करता है। राजस्थान में डेढ़ साल के भीतर चार बार स्थानीय निकाय व पंचायत चुनाव हो चुके हैं, लेकिन 12 जिलों के पंचायत चुनाव अब भी बाकी हैं। चुनाव एक साथ एवं कम समय में कराने को लेकर अनेक बार चर्चा तो चली, पर किसी मुकाम तक न पहुंच सकी। सवाल उठना लाजिमी है कि इस मुद्दे पर सहमति क्यों नहीं बन पा रही? ऐसे मुद्दों पर राजनीति तो होती है, लेकिन राजनीतिक दल किसी नतीजे पर पहुंचते नहीं दिखते। चुनाव सुधारों को लेकर चुनाव आयोग भी सरकारों से अनुरोध करता रहा है, लेकिन बात है कि बन नहीं पा रही। एक साथ सभी चुनाव की बात तो दूर, क्या राज्य में स्थानीय निकाय व पंचायत चुनाव एक साथ नहीं हो सकते। हर छह माह के भीतर चुनाव कौन-सी समझदारी है? इन चुनावों को तो दो-चार माह आगे किया जा सकता है। इसके लिए जिस इच्छाशक्ति की जरूरत है, वह सरकारों के पास नजर नहीं आती।

सरकारें इस दिशा में पहल नहीं करेंगी, तो क्या स्थिति और खराब नहीं होगी? बार-बार आचार संहिता सरकारी काम को तो बाधित करती ही है, जनता का पैसा भी बर्बाद होता है। अच्छा हो कि इस मुद्दे पर सहमति बनाने की पहल केंद्र सरकार करे। ईमानदार प्रयास होंगे तो नतीजों की उम्मीद की जा सकती है। चुनाव जरूरी हैं, लेकिन कब और किस कीमत पर, इसका फैसला तो हमें ही करना होगा।

विकास गुप्ता
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