यह पुलिस क्यों सुधर नहीं पा रही

- सुधार के नाम पर, सरकारें पुलिस के बुरे प्रारूप पर काम कर रही हैं और उसे अपने हिसाब से अच्छा बनाने की कवायद कर रही हैं

By: विकास गुप्ता

Updated: 07 Apr 2021, 09:55 AM IST

विकास नारायण राय

कहने को मुंबई में पुलिस-राजनीति गठजोड़ के तीनों खलीफा ठिकाने लग गए हैं। असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाझे एंटीलिया बम धमकी और मनसुख हिरानी हत्या मामले में प्रमुख आरोपी के रूप में एनआइए की हिरासत में हैं। पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह को पद से हटाया गया। महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख को भी अंतत: इस्तीफा देना पड़ा, जब मुंबई हाईकोर्ट के आदेश से 100 करोड़ मासिक उगाही वाले 'लेटर बम' आरोपों की जांच भी सीबीआइ को सौंप दी गई। लेकिन, समय बताएगा, इससे पुलिस-राजनीति गठजोड़ कमजोर नहीं हुआ, बल्कि उसमें नए आयाम जुड़ गए हैं। इस बीच सामने आए नैरेटिव ने स्वायत्तता, पारदर्शिता, जवाबदेही, जो पुलिस सुधार के तीन अविछिन्न तत्व माने जाते हैं, की बिगड़ी को और बिगाड़ कर रख दिया है।

सचिन वाझे प्रकरण से शर्मसार हुए भारतीय पुलिस नेतृत्व ने 2006 सर्वोच्च न्यायालय के प्रकाश सिंह फैसले से निकली 'स्वायत्त पुलिस' अवधारणा की आड़ ले ली है। उधर, इस कीचड़ में संग-संग लिथड़े राजनीतिक नेतृत्व ने परस्पर एक-दूसरे पर भ्रष्ट पुलिस को संरक्षण देने के आरोपों का तिलिस्म खड़ा करना जारी रखा है। साथ ही पुलिस सुधार की पुरानी बहस नए सिरे से दोहरायी जाने लगी है - आइपीएस अफसरों को, बिना स्वयं लोकतांत्रिक मानदंडों पर खरा उतरे, उपरोक्त फैसले से राजनीतिक आकाओं और सिविल नौकरशाहों के अंकुश से मुक्ति नजर आने लगी थी। जबकि उत्तरोत्तर साफ होता गया कि शासन पर काबिज हर मंत्री-नौकरशाह टीम विरासत में मिले पुलिसिया 'टूलÓ की औपनिवेशिक प्रोफाइल को किसी भी हाल में खोना नहीं चाहती।

दरअसल, पुलिस के डीएनए से कानून के प्रति सम्मान प्राय: नदारद मिलेगा। उसकी ट्रेनिंग और रवायत में कानून एक राजकीय हथकंडा है, एक पेशेवर कौशल है। लोकतंत्र के प्रति समर्पण का अभाव, प्रशिक्षित पुलिस मानस का विशेष कमजोर पहलू और उसे संवैधानिक अनुकूलन से वंचित रखे जाने का ही एक हासिल है। लिहाजा, इन रास्तों पर चलती पुलिस का लक्ष्य 'कानून का शासन' से विचलित होकर सत्ताधारी आका का शासन चलाना बन चुका है। जैसे-जैसे उच्च अदालतें आम जीवन में संवैधानिक मूल्यों को प्रतिष्ठित करने में देरी या ढिलाई का शिकार हुई हैं, स्पष्टत: यह प्रवृत्ति भी निरंकुशता में ढलती चली गई।

पुलिस-राजनीति आपराधिक गठजोड़ के आज के दौर में पुलिस और राजनीतिक नेतृत्व की 'सचिन वाझे प्रक्रियाÓ पुलिस सुधार के निराशाजनक हश्र का पैमाना भी है। तो भी, कहना होगा कि मुंबई खुलासे से पुलिस का आइपीएस नेतृत्व स्तब्ध रह गया था और देश का राजनीतिक नेतृत्व बगलें झांकने लगा था। अनिल देशमुख, परमबीर सिंह और उन दोनों के मुंह लगे सचिन वाझे के बीच हुए वार्तालाप के सामने आने से उजागर हुआ कि मुंबई पुलिस को कानून व्यवस्था के कायदों से नहीं, बल्कि किसी क्राइम सिंडिकेट के तौर-तरीकों से चलाया जा रहा था। देशमुख का बचाव महाराष्ट्र की वर्तमान महा विकास अघाड़ी सरकार के प्रमुख किरदार शरद पवार तक ने सार्वजनिक रूप से किया। परमबीर सिंह की ख्याति उद्धव ठाकरे सरकार में ही नहीं, इससे पहले वाली देवेन्द्र फडणवीस सरकार में भी राजनीतिक अनुकूलन की रही, और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट सचिन वाझे एक फर्जी एनकाउंटर मामले में 16 वर्ष सक्रिय पुलिस से बाहर बैठने के बाद मार्फत शिव सेना नौकरी में वापस आया। लेकिन 'कमाऊ पूतों' और उनके संरक्षक आकाओं का गोटीबाज जमावड़ा अकेले मुंबई पुलिस की शोभा नहीं। आज, भारत की हर पुलिस का सत्ता-राजनीति से कमोबेश यही समीकरण मिलेगा। ऐसे में, बिना किसी व्यापक जन-दबाव के, जिसकी दूर-दूर तक संभावना बनती नहीं दिख रही, क्या पुलिस सुधर सकती है? क्या गारंटी है कि भारत जैसे कमजोर लोकतंत्र में, जहां नागरिक के मानवीय, कानूनी और संवैधानिक अधिकारों की संस्थागत रक्षा नहीं हो पा रही है, एक स्वायत्त पुलिस कहीं अधिक निरंकुश और भ्रष्ट सिद्ध नहीं होगी? 'पुलिस वर्दी में किसी को भी देखकर मुझे कभी भी सुरक्षा का भाव नहीं लगा,' जामिया मिलिया में इतिहास के एक प्रोफेसर मित्र से यह सार सुनना मुझे भी, 35 वर्ष पुलिस की नौकरी करने के बावजूद, अजीब क्यों नहीं लगता?

'पुलिस सुधार' को लेकर गलती कहां हो रही है? असल में हम पुलिस के अच्छे प्रारूप पर काम नहीं कर रहे हैं। सुधार के नाम पर, सरकारें पुलिस के बुरे प्रारूप पर काम कर रही हैं और उसे अपने हिसाब से अच्छा बनाने की कवायद कर रही हैं। आजादी से लेकर प्रकाश सिंह निर्णय तक यही दिखा है! आधुनिकीकरण के नाम पर पुलिस का उत्तरोत्तर सैन्यीकरण हुआ। बजाय लोक और लोकतंत्र उन्मुख बनाने के पुलिस को अधिकार और सत्ता उन्मुख किया गया। हमें नागरिक सशक्तीकरण में पुलिस की सामाजिक स्वीकार्यता और कानूनी सफलता की छिपी कुंजी ढूंढनी होगी, न कि पुलिस स्वायत्तता में। संवैधानिक अनुकूलन (कॉन्सटिट्यूशनल कंडीशनिंग) को हर पुलिसवाले की पेशेवर प्रोफाइल की पूर्व शर्त होना होगा।

(लेखक पूर्व डीजीपी-कानून व्यवस्था, हरियाणा और राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद के पूर्व निदेशक हैं)

विकास गुप्ता
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