scriptWhy polarization in the name of caste and religion is not stopping ? | आपकी बात, चुनावों में जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण क्यों नहीं रुक रहा? | Patrika News

आपकी बात, चुनावों में जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण क्यों नहीं रुक रहा?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

Published: January 12, 2022 05:12:23 pm

सत्ता प्राप्ति ही है लक्ष्य
भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है। यहां विभिन्न धर्म और जाति के लोग रहते हैं। राजनीतिक दल क्षेत्रवाद व जातिवाद में बंटे हुए हैं । ऐसे में वे जाति व धर्म के आधार पर ही टिकट वितरित करते हैं, चाहे प्रत्याशी की छवि धूमिल ही क्यों न हो। राजनीतिक दलों का लक्ष्य सिर्फ सत्ता पाना रह गया है। सत्ता का लालच राजनीतिक दलों को इस तरह के कृत्य करने के लिए बाध्य करता है।
-जे.के. कसेर, दुर्ग
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अंकुश की जरूरत
चुनावों में जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण के बीज राजनीतिक वर्चस्व को कायम रखने के लिए राजनीतिक आका ही बोते हैं। नेता चुनाव में जाति और धर्म के नाम पर वोट हासिल करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। चुनाव में जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण कर राजनीतिक लाभ लेने की यह घातक परंपरा नेताओं की ही देन है। इस पर अंकुश जरूरी है।
-सतीश उपाध्याय, मनेंद्रगढ़ कोरिया, छत्तीसगढ़
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आपकी बात, चुनावों में जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण क्यों नहीं रुक रहा?
आपकी बात, चुनावों में जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण क्यों नहीं रुक रहा?
नेता हैं जिम्मेदार
चुनावों में जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण नहीं रुक रहा है। इसका मुख्य कारण नेता ही हैं। नेता अपने निहित स्वार्थों के कारण अब चुनावों में जाति और धर्म का उपयोग ज्यादा करने लगे हंै। जीतने के लिए ये नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। आम जनता को जाति और धर्म के आधार पर लड़ा कर चुनाव जीतना नेताओं को मुख्य लक्ष्य हो गया है। इसके कारण ही आजकल चुनावों में जाति और धर्म का ध्रुवीकरण नहीं रुक रहा है ।
-आशुतोष शर्मा, जयपुर
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जनता को देना होगा जवाब
हमारे देश की अधिकांश जनता धर्म में आस्था रखने वाली है। लगभग सभी राजनीतिक दल इसका लाभ अपने स्वार्थ के लिए उठाते हैं। वे धर्म का नाम लेकर जनता को मूर्ख बनाने का प्रयास करते हैं, उनकी भावनाओं को भड़काते हैं और अन्य धर्मों के मानने वालों को शत्रु के रूप में पेश करते हैं। इसी प्रकार जाति विशेष के लोगों को अलग-थलग करके उन्हें दूसरों से श्रेष्ठ बताते हैं और अधिक सुविधाएं दिलाने का वादा करते हैं। इस प्रकार धर्म एवं जाति के नाम पर ध्रुवीकरण करते हैं। वे अपने स्वार्थ के लिये लोगों को हिंसा की आग में झोंकते हैं, राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान कराते हैं। अब समय आ गया है कि जनता एकजुट होकर नफरत फैलाने वालों को करारा जवाब दे।
-डॉ. मुहम्मद इकबाल सिद्दीकी
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भूल जाते हैं मूल मुद्दे
चुनावों में जाति और धर्म से जुड़े मुद्दे उठाए जाते हैं, जिससे मतदाता मूल मुद्दे भूल जाते हैं। इससे वे उम्मीदवार की योग्यता का आकलन नहीं कर पा पाते हैं।
-ललित पुनाडिया, रानी, पाली
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संख्या बल हासिल करना है लक्ष्य
राजनीति के लिए समाज का जाति और धर्म का ही ध्रुवीकरण किया जाता है। लोकतंत्र में सत्ता में वही आता है, जिसके पास संख्या बल होता है। जाति और धर्म के आधार पर राजनीतिक दल टिकट देते हैं । इसी आधार पर वोट भी दिए जाते हैं। इसलिए चुनावों में जाति के नाम पर ध्रुवीकरण नहीं रुक रहा है।
-दिव्या खोबरे, इंदौर, मध्यप्रदेश
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जाति और धर्म के आधार पर मतदान न करें
भारत की जनता बहुत ही ज्यादा भावुक है। इसलिए नेता चुनावों में धर्म और जाति के नाम पर ध्रुवीकरण करके अपना उल्लू सीधा करने में सफल हो जाते हैं। इसलिए चुनावों में जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण नहीं रुक पा रहा है। मतदाता जाति और धर्म को चुनावों पर हावी न होने दें और जाति-धर्म से निरपेक्ष रहकर मतदान करें। ऐसा होने पर ही ध्रुवीकरण रुक सकता है।
-कैलाश चन्द्र मोदी, सादुलपुर, चूरू
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निर्वाचन आयोग निभाए जिम्मेदारी
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं जाति और धर्म की राजनीति शुरू हो जाती है। देश का वोटर भी जाति और धर्म के आधार पर विभाजित हो जाता है, जिसका लाभ राजनीतिक दल उठाते हंै। इसलिए निर्वाचन आयोग को इस मामले में नेताओं और राजनीतिक दलों पर लगाम लगानी चाहिए। वोटर को भी जाति और धर्म से ऊपर उठ कर देश के बारे में सोचना होगा।
-राजेंद्र कुमार शर्मा, मीठापुर, गुजरात
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नेताओं को होता है फायदा
राजनीति तो सदैव ध्रुवीकरण पर ही आधारित रही है। जाति और धर्म के नाम पर लोगों को बांटना एक पुरानी कला है। लोगों को बरगला कर, उनकी भावनाओं का फायदा उठाकर नेता चुनाव जीतना चाहते हैं। जनता यही सोचती है कि हमारे धर्म या जाति का नेता होगा, तो हमको ही फायदा होगा, जबकि ऐसा होता नहीं। नेता केवल अपना लाभ देखता है।
-मधुरा व्यास, उदयपुर
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सत्ता पाने के लिए
नेता धर्म व जाति के आधार पर समाज का ध्रुवीकरण करने में लगे रहते हैं। नेताओं का लक्ष्य आम आदमी की भलाई या राष्ट्र का विकास नहीं। इनका मकसद केवल सत्ता हासिल करके अपने स्वार्थ पूरे करना है। इसीलिए वे जाति व धर्म के नाम पर आमजन की भावनाओं को भड़काते हैं और चुनाव जीत जाते हैं।
-लता अग्रवाल, चित्तौड़गढ़

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