क्यों चाहिए 'ग्लोबल कॉर्पोरेट मिनिमम टैक्स' ?

दुनिया भर में सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कम्पनियां आसानी से कर भार से बच निकलती हैं। चार महाद्वीपों से पांच अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वित्त मंत्री बता रहे हैं...
वैश्विक कॉर्पोरेट कर की न्यूनतम दर के निर्धारण से कम्पनियों के बीच अत्यधिक व न्यूनतम कर की प्रतिस्पद्र्धा समाप्त होगी, वे नवाचार और कुशलता के आधार पर प्रतिस्पद्र्धा करेंगी।

By: विकास गुप्ता

Published: 11 Jun 2021, 08:49 AM IST

अचानक आए प्रौद्योगिकीय परिवर्तन, बड़ी कम्पनियों के बाजार में बढ़ते प्रभुत्व और पूंजी के चलायमान होने के चलते कड़ी प्रतिस्पद्र्धा के बीच आज प्रत्येक राष्ट्र असमानताओं की समस्या का सामना कर रहा है। सदी का सबसे बड़ा स्वास्थ्य संकट पहले ही विश्व की अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौती बना हुआ है, खास तौर पर लोक वित्त के संदर्भ में, वह भी असाधारण रूप से। कुछ देश कोरोना संकट से उबरने लगे हैं, जबकि अब भी कई देश इस महामारी का मुकाबला करने में जुटे हैं। विभिन्न राष्ट्रों के वित्त मंत्रियों की दो प्रमुख चिंताएं हैं, जो उनके देशों की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा साबित हो सकती हैं, भले ही ये अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से भिन्न प्रकृति की हैं।

पहली, समृद्ध लोग और कॉर्पोरेट घराने उन लोगों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में हैं, जो अर्थव्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर हैं। निम्न आय वर्ग के कर्मचारी और अभिभावक अपने स्वास्थ्य व बच्चों की सुरक्षा और आजीविका में से किसी एक को चुनने की जद्दोजहद को मजबूर हैं। इसीलिए महामारी से हुए आर्थिक नुकसान की मार भी उन्होंने असंगत रूप से झेली है। छोटे कारोबार बंद होने से कारोबारियों के सामने अपने समुदायों के संरक्षण का संकट आ खड़ा हुआ है। इस बीच, कॉर्पोरेट जगत के राजस्व में उछाल देखा गया और उच्च आय वर्ग के कर्मचारी व शेयरहोल्डर इस संकट से अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति के साथ उबरे।

दूसरी चिंता को दरअसल पहली का ही अगला चरण कहा जा सकता है। सरकारों को अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए इस वक्त राजस्व की सख्त जरूरत है। इससे वे छोटे व्यापारों, कर्मचारियों और जरूरतमंद परिवारों की सहायता कर सकेंगी। महामारी संकट खत्म होते-होते सरकारों को और अधिक राजस्व की जरूरत होगी जो जलवायु परिवर्तन और लम्बे समय से चले आ रहे संरचनात्मक मुद्दों के समाधान में काम आएगा। इसलिए राजस्व हासिल होना महत्त्वपूर्ण है, चाहे वह कहीं से भी हो। लम्बे समय से कर्मचारियों की आय ही राजस्व का माध्यम बनती आई है, क्योंकि उनकी आय का पता लगाना और उसकी गणना आसान है। पूंजीगत आय पर कर लगाना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि पूंजी गतिशील है और आय, लेखांकन के परिष्कृत तौर-तरीकों से ज्यादा प्रभावित होती है।

इन तरकीबों का इस्तेमाल कर अक्सर कार्पोरेट्स की आय भी कम कर वाले अधिकार क्षेत्रों का रास्ता तलाश लेती है, क्योंकि दुनिया की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कम्पनियां बड़ी आसानी से अपना कर भार कम करने में सफल हो जाती हैं। इसके अलावा सरकारों को यह डर सताता रहता है कि कहीं वे इन कॉर्पोरेट्स पर अधिक कर न लगा दें और कम्पनियां अपना व्यापार और रोजगार के अवसर लेकर किसी दूसरे देश का रुख न कर लें। पिछले पचास सालों में अर्थव्यवस्था में यही अजीबोगरीब बदलाव देखा गया है कि उद्योगों पर लगने वाले कर की दर कम होती चली गई है।

इस समस्या का समाधान एकजुट होकर करना होगा जो कि वैश्विक न्यूनतम कॉर्पोरेट कर लागू कर हासिल किया जा सकता है। प्रत्येक सरकार को अपनी कर नीति निर्धारित करने का अधिकार है, लेकिन इन अधिकारों का एक साथ मिल कर प्रयोग कर हम सभी देश अपनी-अपनी अर्थव्यवस्था को उस पटरी पर लाने में सक्षम होंगे जो स्थायी और समावेशी बहाली का मार्ग प्रशस्त करे। यह एकल प्रयास से कहीं अधिक प्रभावी समाधान होगा। हमारी कोशिशों से वैश्विक अर्थव्यवस्था के रास्ते की अड़चनें दूर होनी शुरू होंगी, जिसकी समृद्धि के दायरे से कितने ही देश बाहर हो चुके हैं।

इस साल राष्ट्रों के पास मौका है कि वे कॉर्पोरेट्स पर निम्नतम स्तर की ओर जाते करारोपण का रुख बदलें ताकि सरकारी संसाधनों को उस वक्त बहाल किया जा सके जबकि उन्हें बहाल करने की जरूरत सर्वाधिक है। ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डवलपमेंट (ओईसीडी) और ग्रुप ऑफ 20 इन्क्लूसिव फ्रेमवर्क के तत्वावधान में 139 देश राष्ट्र अनुसार कॉर्पोरेट कर के वाजिब वितरण और न्यूनतम वैश्विक कॉर्पोरेट कर निर्धारण की कोशिश में जुटे हैं। इससे प्रतिस्पद्र्धा पर तो विराम लगेगा ही, विभिन्न कॉर्पोरेट ईमानदारी से अपना कर चुकाएं, यह भी सुनिश्चित होगा।

पांच अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वित्त मंत्रियों ने २१वीं सदी के कर तंत्र को मजबूत बनाने के लिए इन प्रयासों का समर्थन करना स्वीकार किया है। खास तौर पर हम बड़ी और अच्छा लाभ कमा रही कम्पनियों पर समुचित कराधान के पक्ष में हैं, क्योंकि विगत वर्षों से बिना समन्वय चल रहे एकल उपायों के चलते अंतरराष्ट्रीय कर तंत्र अस्थिर हो गया है। न्यूनतम वैश्विक कॉर्पोरेट कर लगाने से देशों की कॉर्पोरेट कर से प्राप्त आय कम से कम एक न्यूनतम स्तर पर आएगी। इससे सरकारों को इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सेवा, शिशु देखभाल, शिक्षा, नवाचार और अन्य महत्त्वपूर्ण सरकारी जरूरतों में निवेश करने में मदद मिलेगी। इस प्रकार बहुपक्षवाद बहाल कर हम कम्पनियों को स्थायित्व का अनुकूल माहौल प्रदान कर सकते हैं और सभी नागरिकों को समृद्ध बना सकते हैं। न्यूनतम वैश्विक कर दर निर्धारण के लिए प्रारंभिक सहमति के तौर पर 15 प्रतिशत से शुरुआत की जा सकती है, जिस पर हाल ही जी-7 देशों के समूह ने सहमति जताई थी। फिलहाल न्यूनतम वैश्विक कर शून्य है। संभव है कुछ देश 15 प्रतिशत से अधिक दर पर सहमत हो जाएं। इससे कम्पनियों के बीच अत्यधिक व न्यूनतम कर की प्रतिस्पद्र्धा समाप्त होगी, वे नवाचार और कुशलता के आधार पर प्रतिस्पद्र्धा करेंगी। सरकारें भी उत्पादकता बढ़ाने और बेहतर परिणामों पर फोकस कर सकेंगी। इससे सकारात्मक माहौल बनेगा, भले ही नवाचार कहीं भी हो।

मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कर व्यवस्था से विश्वभर के मध्यमवर्गीय और कामकाजी वर्ग प्रभावित होते हैं। हम सब मिल कर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वैश्विक पूंजीवाद समुचित कर व्यवस्था के अनुकूल हो और सरकारें बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशंस पर कर लगा सकें। उम्मीदें कहीं ज्यादा हैं, हम सभी देशों का आह्वान करते हैं कि अगले माह होने वाले जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों के सम्मेलन से पहले अंतरराष्ट्रीय वार्ता कर इस पर एक राजनीतिक समझौता करें। इससे विश्व अर्थव्यवस्था समृद्ध होगी और समेकित आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।

लेखक - आरतुरो हिरेरा गुतियरेज (मेक्सिको), श्री मुल्यानी इंद्रावती (इंडोनेशिया), टीटो म्बोवेनी (दक्षिण अफ्रीका), ओलाफ शोल्ज (जर्मनी), जैनेट एल. येलन (यूनाइटेड स्टेट्स)

द वॉशिंगटन पोस्ट

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