scriptWhy the wish for world peace is not coming to fruition | क्यों फलीभूत नहीं हो रही विश्व शांति की कामना | Patrika News

क्यों फलीभूत नहीं हो रही विश्व शांति की कामना

आखिर इतने प्रयासों के बावजूद वह क्या है, जो दुनिया में शांति की संभावना और अंतत: उसकी स्थापना के आड़े खड़ा हो जाता है? दूसरे शब्दों में कहें तो दुनिया के राष्ट्र-राज्यों और सरकारों की कथनी और करनी के बीच कोई तो ऐसा अंतर्विरोध है, जो शांति की कामना को फलीभूत नहीं होने देता। कहना न होगा कि यह अंतर्विरोध शक्तिशाली देशों द्वारा अपने आर्थिक-सामरिक हितों और स्वार्थों को सर्वोपरि रखने से पैदा होता है।

Published: September 21, 2022 04:23:56 pm

नरेश गोस्वामी
एकेडमिक फेलो,
डॉ. बीआर अंबेडकर
विवि, दिल्ली

आज अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस है। यानी शांति के आदर्श और अहिंसा के स्मरण का दिन। संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन की परिकल्पना वैश्विक शांति के प्रयासों को सांस्थानिक रूप देने के लिए की थी। यह बात वर्ष 1981 की है। शुरू में इसके लिए ३ सितंबर का दिन तय किया था, लेकिन 2001 के बाद २१ सितंबर की तारीख निश्चित कर दी गई। तारीख के इस बदलाव के साथ यह लक्ष्य भी स्पष्ट कर दिया गया कि आगे से इस दिन को वैश्विक युद्धविराम तथा अहिंसा दिन के रूप में मनाया जाएगा। तब से संयुक्त राष्ट्र की महासभा इस दिन के लिए हर वर्ष नए संकल्पों और कार्यक्रमों की घोषणा करती रही है। मसलन, 2009 में इस दिन परमाणु हथियारों के खतरे के प्रति सजगता पैदा करने का संकल्प लिया गया। 2010 में युवाओं को शांति और विकास के प्रति आकर्षित करने, 2011 में शांति और लोकतंत्र के लिए वैश्विक भागीदारी सुनिश्चित करने, 2012 में गैर-सरकारी संस्थाओं तथा दुनिया भर के छात्र-संगठनों को युद्धविराम की भावना से जोडऩे वाले कार्यक्रम तैयार किए गए। शांति की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए संकल्प-निर्धारण और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों की घोषणाओं का यह उपक्रम निरंतर चलता रहा है। इसे कभी शांति के अधिकार, कभी सार्वभौम गरिमा के साझे उद्यम, तो कभी टिकाऊ विकास के आकर्षक मुहावरों में व्यक्त किया जाता है।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि संयुक्त राष्ट्र ने 2016 की अपनी एक रिपोर्ट में स्वयं स्वीकार किया था कि दूसरे महायुद्ध के बाद दुनिया में शांति का ग्राफ एक बार फिर हिंसक तनावों और टकरावों का एक अबूझ पुलिंदा बनता जा रहा है। गौर करें कि पिछली सदी के आठवें दशक की शुरुआत में जब अंतरराष्ट्रीय दिवस जैसे प्रतीकात्मक उपायों पर विचार किया जा रहा था, तो दुनिया दो खेमों में बंटी थी- एक सोवियत खेमा, तो दूसरा अमरीका खेमा। उस समय दुनिया की शांति इन दो देशों की सामरिक प्रतिद्वंद्विता और समीकरणों से तय होती थी। तब वैश्विक जनमत को लगता था कि अगर इन दो मुल्कों के बीच चल रहा शीत-युद्ध थम जाए, तो दुनिया चैन की सांस ले। लेकिन, पिछले चार दशकों का इतिहास बताता है कि यह धारणा गलत थी। आज जब एक तरफ सोवियत संघ नक्शे से गायब हो चुका है और अमरीका का वर्चस्व भी उतना प्रभावी नहीं रह गया है, तब भी समकालीन दुनिया में शांति एक मृगमरीचिका बनी हुई है। मसलन, मौजूदा दुनिया में यूक्रेन, अफगानिस्तान, मध्य-पूर्व, म्यांमार और इथियोपिया सहित 27 क्षेत्र आज भी हिंसा, जातीय टकराव, युद्ध या गृहयुद्ध जैसी स्थितियों से ग्रस्त हैं।
वैश्विक तनावों पर नजर रखने वाली एक संस्था के अनुसार इन क्षेत्रों में फिलहाल सुधार का ऐसा कोई लक्षण दिखाई नहीं देता कि हम एक बेहतर भविष्य की कल्पना कर सकें। खुद संयुक्त राष्ट्र अपने एक आधिकारिक वक्तव्य में कह चुका है कि दुनिया में देशों-समुदायों के बीच आपसी टकराव और हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। इस जन-त्रासदी को आंकड़ों में रखकर देखें, तो दुनिया की एक-चौथाई आबादी हिंसा और टकराव के माहौल में जी रही है। पिछले साल विश्व में लगभग आठ करोड़ चालीस लाख लोगों को हिंसक संघर्ष और मानवाधिकारों के उल्लंघन के चलते विस्थापित होना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक इस बरस भी तकरीबन 27 करोड़ लोगों को जीवन जीने की बुनियादी सुविधाएं प्रदान करनी पड़ेंगी।
ऐसे में, यह सवाल पूछना लाजमी हो जाता है कि आखिर इतने प्रयासों के बावजूद वह क्या है, जो दुनिया में शांति की संभावना और अंतत: उसकी स्थापना के आड़े खड़ा हो जाता है? दूसरे शब्दों में कहें तो दुनिया के राष्ट्र-राज्यों और सरकारों की कथनी और करनी के बीच कोई तो ऐसा अंतर्विरोध है, जो शांति की कामना को फलीभूत नहीं होने देता। कहना न होगा कि यह अंतर्विरोध शक्तिशाली देशों द्वारा अपने आर्थिक-सामरिक हितों और स्वार्थों को सर्वोपरि रखने से पैदा होता है। जवाहरलाल नेहरू ने इस विरोधाभास की निशानदेही उसी समय कर ली थी, जब संयुक्त राष्ट्र एक तरफ मनुष्य के मूलभूत अधिकारों का चार्टर तैयार कर रहा था और दूसरी तरफ दुनिया शीतयुद्ध के शिविरों में बंटती जा रही थी। नेहरू का कहना था कि 'हम अंतर्विरोधों के युग में जी रहे हैं। हम बात तो शांति की करते हैं, लेकिन तैयारी युद्ध की कर रहे होते हैं। हम चर्चा अंतरराष्ट्रीयता की करते हैं, लेकिन हम अपने संकीर्ण राष्ट्रवाद से परे नहीं देख पाते।Ó इस विचार के मर्म को कई दशक बाद मिखाइल गोर्बाचोव ने एक अलग संदर्भ में प्रस्तुत किया था। 1991 में शांति का नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते समय गोर्बाचोव ने शांति की अवधारणा को और विस्तृत करते हुए कहा था कि आज शांति का अर्थ केवल राष्ट्रों के सहअस्तित्व तक सीमित नहीं किया जा सकता। अब शांति के आशय में वैश्विकता और सभ्यता की सार्वभौमिकता का समावेश करना होगा। और उसे अलग-अलग खंडों में देखने की बजाय भिन्नताओं, मतभेदों और विविधताओं के अखंड तालमेल के रूप में व्याख्यायित करना होगा। कहना न होगा कि यह दिवस दुनिया के तमाम देशों को यह याद दिलाने का दिन भी है कि जब तक निजी हितों को वैश्विक कल्याण के अधीन नहीं रखा जाएगा, तब तक विश्व-शांति का लक्ष्य हमारी जद से दूर ही रहेगा।
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