कांग्रेस के हाथ आई गठजोड़ की डोर

भाजपा ने फिलहाल वह मौका खो दिया है जो 2014 में बहुमत के आधार पर उसे हासिल हुआ था। कांग्रेस ने 1977 में पच्चीस वर्षों के शासन के बाद सत्ता को खोया था, लेकिन उसे जल्दी ही वापस प्राप्त कर लिया। 2019 के लोकसभा चुनाव इस दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं।

By: dilip chaturvedi

Published: 18 Dec 2018, 02:31 PM IST

संजय लोढ़ा, राजनीतिक विश्लेषक

प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइजक न्यूटन ने यह शाश्वत नियम दिया कि जो ऊपर जाता है उसे नीचे आना ही पड़ता है। हम उसमें यह भी जोड़ सकते हैं कि जो जितना जल्दी ऊपर जाता है, उसे उतना ही जल्दी नीचे आना पड़ता है। यह नियम विज्ञान के साथ ही साथ समाज पर भी लागू होता है। वर्तमान भारतीय राजनीति में इसका सबसे ज्वलंत उदहारण देखने को मिल रहा है।

2013 में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों के बाद तीनों ही राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। तत्पश्चात तत्कालीन यूपीए-2 सरकार की अकुशलता और व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण 2014 में लोक सभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन को अप्रत्याशित सफलता हासिल हुई। चुनाव प्रचार के दौरान कहा गया कि भारत को एक ओर कांग्रेस पार्टी से और दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों से मुक्त किया जाएगा। इसके लिए जिन दावंपेचों का प्रयोग किया उनसे धीरे-धीरे जन का तंत्र में विश्वास क्षीण होने लगा। यह स्पष्ट होने लगा कि भारतीय मतदाता शक्तिशाली नेतृत्व को पसंद तो करता है लेकिन यदि वह नेतृत्व आचरण में दम्भ और अहंकार का परिचय दे, चुनावी वादों को पूरा करने की जगह 'जुमलेबाजी' करे और चिरस्थापित सामाजिक मूल्यों की अनदेखी करे तो मतदाता उस नेतृत्व को बेदखल कर सकते हैं।

राजनीति के विश्लेषक पिछले दिनों यह कहने लगे थे कि देश में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है। टीकाकारों ने कहा कि यह दौर 'उत्तर-कांग्रेस राज्य व्यस्था' का है, लेकिन दिसंबर 2017 के गुजरात और मई 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद देश की राजनीतिक फिजां बदलने लगी। इस बीच बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में हुए उप-चुनावों में भी स्पष्ट संकेत मिलने लगे कि भाजपा का विजयी रथ दलदल में धंस गया है।

ऐसे में नवंबर-दिसंबर 2018 में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को मई 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों का 'सेमी-फाइनल' कहा गया। परिणामों से स्पष्ट है कि भाजपा 'सेमी-फाइनल' में पराजित हो चुकी है। लेकिन अब फाइनल का खेल सत्तारूढ़ दल के लिए सरल नहीं रहा।

कर्नाटक चुनाव के बाद देश में जो नया राजनीतिक ध्रुवीकरण शुरू हुआ, अब इन चुनावों के बाद उस ध्रुवीकरण को और अधिक स्थिरता और मजबूती मिलेगी। अब यह स्पष्ट है कि विपक्षी दलों के 'महागठबंधन' का नेतृत्व कांग्रेस के हाथों में रहेगा। इस 'महागठबंधन' में कौन-कौन से दल सम्मिलित होंगे, यह भी नजर आने लगा है। इसकी एक झलक नवगठित कर्नाटक सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में देखने को मिली थी, जिसमें जनता दल(एस) के साथ कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी आदि के शीर्ष नेताओं ने शिरकत की। आज 17 दिसम्बर को राजस्थान, मप्र और छत्तीसगढ़ के शपथ ग्रहण समारोह में इन दलों की सहभागिता तो होगी ही, द्रमुक, नेशनल कांफ्रेंस, राष्ट्रीय जनता दल, असम गण परिषद भी इस समारोह में शामिल हो रहे हैं। यह ध्रुवीकरण इस तथ्य को रेखांकित कर रहा है कि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल 'मुक्त' भारत की योजना न केवल ध्वस्त हो गई है, बल्कि इस योजना के रचनाकारों ने कांग्रेस को जीवंत तो किया ही, साथ ही क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस के गठबंधन को भी एक चमकती हुई थाली में परोस कर दे दिया है। यदि गठजोड़ के भौगोलिक विस्तार को देखा जाए तो निस्संदेह इसमें पूरा देश समाहित है।

दूसरी ओर यदि हम भाजपा-नीत एनडीए गठबंधन को देखें तो एक विपरीत स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। 2014 में हुए इस गठबंधन के कुछ साथी तो पहले ही इसे छोड़ चुके हैं। शिव सेना, अकाली दल, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी एवं अन्य दल भाजपा से आंखे तरेर रहे हैं। कोई नया क्षेत्रीय दल इस गठबंधन से जुड़ता नजर नहीं आ रहा है। स्वयं भाजपा में अजीब अंदरूनी खामोशी नजर आ रही है। पार्टी के भीतर शीर्ष नेतृत्व के अहंकार और अलोकतांत्रिक व्यवहार से जो असंतोष प्रस्फुटित हो रहा था, अब संभावना है कि वो खुल कर बाहर आएगा। अर्थात जिस शक्तिशाली नेतृत्व के बल पर भाजपा आगामी लोकसभा चुनावों में ताल ठोकने वाली थी, अब वह असमंजस की स्थिति में है।

यह भारतीय लोकतंत्र का एक उभय संकट है कि जहां हमारा मतदाता एक ओर स्थिर और दमदार नेतृत्व की चाह रखता है, वहीं उसे ऐसा नेता पसंद नहीं आता जो सहिष्णुता, सौम्यता और जवाबदेही के लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास करे। जिस तरह हम भारतीय राजनीति की कल्पना कांग्रेस के अभाव में नहीं कर सकते, उसी तरह आज भाजपा के बिना भी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अधूरी है। यह सही है कि दोनों दल भारतीय राजनीतक व्यवस्था की मुख्य धुरी हैं जिनके इर्द-गिर्द क्षेत्रीय दल परिक्रमण करते रहेंगे। भाजपा ने फिलहाल वह मौका खो दिया है जो 2014 में बहुमत के आधार पर उसे हासिल हुआ था। कांग्रेस ने 1977 में पच्चीस वर्षों के शासन के बाद सत्ता को खोया था, लेकिन उसे जल्दी ही वापस प्राप्त कर लिया। 2019 के लोकसभा चुनाव इस दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। क्या भाजपा अपनी सरकार को बचा पाएगी? या कांग्रेस और 'महागठबंधन' पुन: सत्ता पर काबिज होंगे? पांच राज्यों के जनादेश आने वाले कल को प्रशस्त कर रहे हैं।

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