आपकी बात, क्या किसान आंदोलन का राजनीति पर प्रभाव होगा

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

By: Gyan Chand Patni

Published: 15 Sep 2021, 04:47 PM IST

सरकार को आंदोलनों की परवाह नहीं
धीरे-धीरे किसान आंदोलन पूरे देश में फैलता जा रहा है। सरकार किसान बिल को लेकर अपनी सफाई ही देती है। सरकार का जो रवैया है उससे साफ जाहिर होता है कि उसे जनता के आंदोलनों की परवाह नहीं। वह सिर्फ अपनी मनमर्जी करना चाहती है। लोकतंत्र में सरकार बना लेने का यह मतलब नहीं कि मनमाने ढंग से निर्णय लिए जाएं। कृषि प्रधान देश में किसानों में आत्मविश्वास भरना होगा। ऐसे बिल न लाए जाएं, जिससे लोग खेती करना ही छोड़ दें। अगर यह आंदोलन चलता ही रहा, तो देश में बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिलेगा।
-नटेश्वर कमलेश, चांदामेटा, मध्य प्रदेश
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राजनीति पर प्रभाव
प्रत्येक आंदोलन का कोई न कोई प्रभाव होता है । प्रश्न यह है कि क्या किसान आंदोलन का राजनीति पर प्रभाव होगा? उत्तर है, हां। सरकार ने किसानों के लिए तीन कानून बनाए हैं। इन कानूनों का किसान यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि ये कानून उद्योगपतियों के हित साधने के लिए बनाए गए हैं। किसान चाहते हैं कि सरकार इन कानूनों को रद्द कर दे। इसके लिए किसान लगभग 9 माह से आंदोलनरत हैं, लेकिन सरकार अपने निर्णयों पर अड़ी हुई है। सरकार के अनुसार इन कानूनों के माध्यम से किसानों की सभी समस्याओं का अंत हो जाएगा। किसान कहते हैं कि जमीन और खेती उनके हाथों से निकलकर उद्योगपतियों के हाथों में चली जाएगी और वे श्रमिक बन कर रह जाएंगे।
-भूमिका, जयपुर
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उप्र के चुनाव पर होगा असर
लम्बे समय से चल रहे किसान आंदोलन ने बहुत हलचल मचाई है। विपक्षी राजनीतिक दलों के समर्थन से आंदोलन मजबूत हो गया है। अगले बरस उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में आंदोलन राजनीतिक दलों की नींद उड़ा रहा है। किसान नेता राकेश टिकैत पश्चिम उत्तर प्रदेश से हैं। उस क्षेत्र में टिकैत की सियासी पकड़ काफी मजबूत है। वहां जाट-मुस्लिम के बीच बढ़ती नजदीकियां भाजपा के साथ अन्य राजनीतिक दलों को भी परेशान कर रही हैं।
-नरेश कानूनगो, बैंगलूरू, कर्नाटक

बदल गया आंदोलन का स्वरूप
किसान आंदोलन का स्वरूप जिस तेजी से बदल रहा है, उससे इसके राजनीतिक इस्तेमाल की आशंका बढ़ गई है। सरकार की जिद से भी स्थिति खराब हुई है। किसान पहले केवल एमएसपी की लिखित गारंटी चाहते थे, लेकिन अब तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर कुछ राजनीतिक दल इस बात से खुश हैं कि किसान आंदोलन की गूंज कनाडा और संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच गयी है। किसान आंदोलन की लहर विदेशों तक पहुंचाने का क्या औचित्य है?
अजिता शर्मा, उदयपुर
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राजनीतिक महत्वाकांक्षा
यह आंदोलन मुख्य रूप से राजनीतिक प्रभाव के विस्तार के लिए ही किया जा रहा है। आन्दोलन का केन्द्र पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तरप्रदेश ही है। ये वही क्षेत्र हैं जहां आने वाले समय में विधानसभा होने हैं। आंदोलन के नेतृत्वकर्ता किसान आंदोलन में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं।
सुभाष चंद्र जोशी
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किसानों का इस्तेमाल
निश्चित ही किसान आंदोलन का राजनीति पर गहरा प्रभाव होगा। कुछ महत्वाकांक्षी नेता किसान आंदोलन की आड़ में अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसानों के विशाल जनसमूह का इस्तेमाल कर रहे हैं। आंदोलन समाप्त नहीं हुआ, तो राजनीति में बड़े परिवर्तन देखने को मिलेंगे।
- रोहित महावर खटनावलिया, कोटा
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भाजपा को नुकसान
यदि किसान आंदोलन खत्म नहीं हुआ, तो यूपी और उत्तराखंड दोनों ही जगहों पर विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए आंदोलनकारियों से बातचीत जरूरी है।
-वीरेंद्र टेलर, पीपलखूंट, प्रतापगढ़
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चुनावों पर असर पड़ेगा
किसान आंदोलन प्रमुख मुद्दा है। सरकार ने किसानों को कभी खालिस्तानी बताया, तो आंदोलनजीवी। किसान भी सरकार के खिलाफ डटे हुए हैं। इसका असर जरूर चुनावो में देखने को मिलेगा
-दीपक गर्ग, रेलमगरा, राजसमन्द
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किसान आंदोलन नहीं
अब यह किसान आंदोलन नहीं बचा, यह तो केवल राजनीतिक मुद्दा बन चुका है, महीनों से चक्काजाम, ओर सरकार को धमकी देना आम किसान की विचारधारा नहीं हो सकती। यह नेताओं का षड्यंत्र है।
-शुभम् दुबे, इंदौर, मध्य प्रदेश
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भाजपा को नुकसान
किसान आंदोलन अब पूरी तरह से राजनीति में ढल चुका है। हर पार्टी इसके जरिए अपना स्वार्थ सिद्ध करने का जुगाड़ कर रही रही है। किसान आंदोलन से बीजेपी को जरूर नुकसान होने की संभावना है।
-प्रकाश चन्द्र राव, भीलवाड़ा
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छोटे किसान आंदोलन से दूर
भारत के अधिकांश आम किसानों के पास इतना वक्त नहीं है कि वे अपनी रोजी-रोटी को छोड़कर राजनीति में अधिक दिलचस्पी लें। राजनीति में तो आज भी बड़े किसान ही महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका अदा करते हैं।
-एकता शर्मा, गरियाबंद, छत्तीसगढ़

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