सरकार समान संकल्प शक्ति दिखाए

निगहबान

By: Sandeep Purohit

Updated: 28 May 2021, 12:43 PM IST

केन्द्र सरकार सोशल मीडिया पर लगाम के नए कानून, कश्मीर, एनआरसी और नागरिकता संशोधन बिल पर जो प्रयास किए, उसके आधे भी प्रयास अगर महिला आरक्षण बिल पर किए जाएं तो वह निश्चत तौर पास हो जाता। पर संकल्प शक्ति का अभाव स्पष्ट दिख रहा है इसलिए आधी आबादी को उसका हक नहीं मिल रहा है, सरकार को चाहिए कि वह समान संकल्प शक्ति दिखाएं इस बिल के लिए अन्य बिलों की तरह।
भारत में लोकतंत्र दिन प्रतिदिन पुष्पित और पल्लवित होता जा रहा है। हमें हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नाज भी है पर ये नाजुक वक्त है, पुरी दुनिया हमारी तरफ देख रही है, हम कोई ऐसा काम नहीं करें कि हमारी साख दांव पर लग जाए। भारत एक महान लोकतांत्रिक देश है पर ये सच है कि हम हमारी आधी आबादी के साथ अभी तक न्याय नहीं कर पाए। उनको संसद में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की सब पैरोकारी तो करते हैं पर हकीकत यह है कि सदन के भीतर जब भी महिला आरक्षण बिल रखा जाता है तो किसी न किसी न प्रकार से उसे अटका दिया जाता है। आज नरेंद्र मोदी सरकार चाहे तो यह बिल पास हो सकता है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो खुद कह चुके हैं कि भाजपा इस बिल को लोकसभा में लाएगी तो कांग्रेस इसका समर्थन करेगी। अगर दोनों दल ईमानदारी से तैयार हों तो कौन रोक सकता है महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण को? खास बात यह है कि इन दोनों ही दलों ने घोषणा पत्र में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात भी कही है। भाजपा ने चुनावों में वादा कि या था कि सरकार में हर स्तर पर महिला कल्याण और विकास सभी स्तर पर हमारी प्राथमिकता होगी।
संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को संविधान संशोधन के माध्यम से 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए बीजेपी कृतसंकल्प है। पर हकीकत यह है कि पार्टी अपने आंतरिक लोकतंत्र में भी महिलाओं की भागीदारी के मामले में बेहद फिसड्डी साबित हो रही है। भाजपा में राष्ट्रीय व प्रदेश स्तर पर महिलाओं को संगठन में कितना प्रतिनिधित्व है यह सबको मालूम है। निचले स्तर पर चले तो दस फीसदी महिलाएं भी मंडल अध्यक्ष अब तक नहीं बनी है, यही हाल कांग्रेस के आंतरिक संगठन का भी है, यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है।
सोनिया गांधी ने एक बार राज्यसभा में बिल पास करवाकर जरूर अपनी इच्छा शक्ति का प्रदर्शन किया था पर उसके बाद वही ढाक के तीन पात। हां, कांग्रेस के ही संगठन प्रोफेशनल कांग्रेस में जरूर महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया जा रहा है पर खुद कांग्रेस का हाल वही है, जो भाजपा और अन्य दलों का है। एचडी देवेगौड़ा की सरकार ने पहली बार 12 सितंबर 1996 को बिल पेश करने की कोशिश की थी। इस सरकार को कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था पर लालू और मुलायम को यह मंजूर नहीं था। इसके बाद फिर रखा गया तो शरद यादव ने भी इसका विरोध किया।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी इस बिल को सदन में रखा पर वह भी कामयाब नहीं हुई। अब भाजपा को अपने नेता अटल बिहारी वाजपेयी का अनुसरण करते हुए महिला आरक्षण बिल को नए सिरे से पेश करना चाहिए। भाजपा को लोकसभा में प्रचंड बहुमत हासिल है। राज्यसभा में भी उसे कोई दिक्कत नहीं आ रही है। बस जरूरत है मजबूत इच्छाशक्ति की। तमाम विरोधों को दरकिनार कर आजकल सरकार जिस तरह नए आईटी कानूनों की पैरोकारी कर रही है, अगर ऐसी ही पैरोकारी महिला अधिकारों की कर ले तो वह दिन दूर नहीं जब भारत की ससद में 33 फीसदी महिलाएं बैठी हुई दिखे। पर इसके लिए सरकार को संकल्प मजबूत राजनीतिक संकल्प शक्ति दिखानी होगी। जिस दिन महिला आरक्षण विधेयक पास होगा, सही मायने में उसी दिन आधी आबादी को सही प्रतिनिधित्व मिलेगा।

Sandeep Purohit
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