खुशफहमी क्यों

जरूरी नहीं कि आर्थिक समृद्धि ही किसी देश की सबसे बड़ी ताकत हो। जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा व संतुष्टि जैसे पहलुओं का आकलन भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

By: सुनील शर्मा

Published: 15 Jul 2018, 12:01 PM IST

वर्ल्ड बैंक के हवाले से हाल ही खुशखबरी दी गई है कि भारत ने फ्रांस को पछाडक़र दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की हैसियत हासिल कर ली। यह आकलन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आधारित है। भारत की जीडीपी वर्ष 2017 के अंत तक 2.597 लाख करोड़ डॉलर जबकि फ्रांस की 2.582 लाख करोड़ डॉलर रही। भारत की आबादी 135 करोड़ और फ्रांस की करीब साढ़े छह करोड़ है। यानी इस कुल रकम में से प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी में भारी अंतर के बावजूद इतराने की वजह अबूझ है। एक दशक में भारत की जीडीपी 116 फीसदी से भी अधिक बढ़ गई लेकिन फ्रांस की जीडीपी इस अवधि में 2.8 फीसदी घटी। भारत का, विकसित फ्रांस से आगे निकलना, भारतीय शेयर बाजार सूचकांक का शीर्ष पर पहुंचना सरकारी प्रचार के लिहाज से अच्छी सामग्री हो सकती है। सवाल यह है कि जीडीपी के इस पहाड़ के बरक्स एक आम भारतीय के जीवन में कितना फर्क पड़ा। क्या हमारे गांवों में सौभाग्य व खुशहाली के गीत गाए जाने लगे हैं।

वर्ल्ड बैंक की ही रिपोर्ट से स्पष्ट है कि एक औसत भारतीय और एक औसत फ्रांसीसी की कमाई में बीस गुना से अधिक अंतर है। प्रति व्यक्ति क्रय शक्ति के आधार पर वर्ल्ड बैंक ने भारत को 123वें स्थान पर रखा है, जबकि फ्रांस 25वें स्थान पर है। अगर इन सभी पैमानों को शहरी और ग्रामीण भारत में विभाजित किया जाए तो हकीकत और तकलीफदेह दिखेगी। सरकार के आंकड़ों को ही उधेडक़र आर्थिक विशेषज्ञ मोहन गुरुस्वामी दिखाते हैं कि जीडीपी का यह पहाड़ कितना खोखला है, सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ाकर अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाया जा रहा है। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की चिमनियों में धुआं नहीं है, नतीजा - बेरोजगारी की स्थिति देश में भयावह हो चुकी है। फ्रांस को पछाडऩे वाले देश में मेक इन इंडिया का हश्र हमारे सामने है। पड़ोसी चीन हमें धूपबत्ती-अगरबत्ती से लेकर हैवी मशीनरी तक बेच रहा है। आंकड़े तो यह भी बता रहे हैं कि पड़ोसी बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति आय जिस रफ्तार से बढ़ रही है, दो साल में वे भारतीयों से आगे निकल जाएंगे।

बहरहाल, जीडीपी के आंकड़ों की हकीकत की विवेचना से परे, यह जरूरी नहीं कि आर्थिक समृद्धि ही किसी देश की सबसे बड़ी ताकत हो। जनता का स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन की समझ, संतुष्टि और इन पहलुओं पर उसके नागरिकों की स्थिति का आकलन आज के दौर में ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। वरना इसी देश में पंजाब, हरियाणा व कुछ अन्य क्षेत्रों में खेती से कमाई के उदाहरण दिए जाते थे, वहां अंधाधुंध रासायनिक खाद ने कृषि भूमि बंजर बनाकर कैंसर रोगियों की संख्या जिस रफ्तार से बढ़ाई है, हमारी आंखें खोलने के लिए क्या काफी नहीं? इसी साल संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट में कुल 156 देशों की लिस्ट में भारत 11 स्थान और फिसलकर 133वें नंबर पर था। अमरीका 18वें, फ्रांस 23वें और फिनलैंड पहले स्थान पर थे। समृद्धि के आर्थिक पैमाने इस खुशहाली के आगे बेमानी हैं।

सुनील शर्मा
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned