आपका हक : जरूरी है ओटीटी पर नियंत्रण

'ओटीटी' अर्थात 'ओवर द टॉप' अर्थात मोबाइल पर उपलब्ध मनोरंजन के साधनों की मांग एकाएक लॉकडाउन के एक माह के अंदर ही पूरी दुनिया में शिखर पर पहुंच गई।

By: विकास गुप्ता

Updated: 24 Feb 2021, 07:37 AM IST

सिद्धार्थ राधेलाल गुप्ता

कोविड-19 महामारी की वजह से जहां एक ओर सिनेमा हॉल एवं थिएटर बंद हुए, वहीं दूसरी ओर यह महामारी इंटरनेट के लिए एक वरदान साबित हुई। 'ओटीटी' अर्थात 'ओवर द टॉप' अर्थात मोबाइल पर उपलब्ध मनोरंजन के साधनों की मांग एकाएक लॉकडाउन के एक माह के अंदर ही पूरी दुनिया में शिखर पर पहुंच गई। 'ओटीटी' में भारत आज पूरे विश्व में दसवें स्थान पर है।

अत: यह अति आवश्यक है कि ऑनलाइन कंटेंट पर वैधानिक नियंत्रण हो। टीवी, डीटीएच, सिनेमा हाल जैसे मनोरंजन माध्यम अधिसूचित नियमों के अंतर्गत सेंसर बोर्ड, सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण जैसी कई वैधानिक संस्थाओं से नियम अनुसार नियंत्रित होते हैं। दुर्भाग्यवश कोई भी संस्था अथवा अधिनियम ओटीटी को नियंत्रित नहीं करता। टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में जहां मदिरापान, धूम्रपान एवं किसी भी तरह की अश्लीलता या फूहड़पन पर नियामक एजेन्सियां रोकने की कोशिश करती हंै, कड़े प्रतिबन्ध लगाए जाते हैं, लेकिन ओटीटी के लिए ऐसे कोई प्रावधान नहीं हैं। ओटीटी 'मदमस्त हाथी' की तरह हो चुका है, जिसका न तो कोई महावत है और न कोई ठिकाना। वह जहां चाहे, जैसा चाहे विचरण कर सकता है। वैधानिक प्रश्न यह भी उठता है जिस प्रकार से फेसबुक, ट्विटर या अन्य सोशल मीडिया मंच के पास सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के अंतर्गत यह बचाव उपलब्ध होता है कि उन पर आने वाली संपूर्ण विषय सामग्री उनके नियंत्रण के बाहर है। यह बचाव किसी भी परिस्थिति में ओटीटी मंच जैसे अमेजन, नेटफ्लिक्स, ऑल्ट बालाजी के पास उपलब्ध नहीं हो सकता, क्योंकि इन पर प्रसारित एवं प्रदर्शित होने वाला कंटेंट पूर्णतया इनके नियंत्रण में रहता हैं। अतएव भारतीय दंड संहिता की धारा 292 एवं उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के महत्त्वपूर्ण न्याय दृष्टांत 'रंजीत डी. उदेशी विरुद्ध महाराष्ट्र राज्यÓ के संदर्भ में केंद्र शासन को ओटीटी में प्रसारित होने वाली अश्लीलता, बेहूदगी पर नकेल डालने के लिए अधिनियम बनाना चाहिए।

जब तक अश्लीलता पर अंकुश लगाने के लिए अधिनियम नहीं बनेगा, तब तक न्यायालय भी समाज में इससे होने वाले प्रदूषण एवं अनैतिकता को रोक नहीं सकते। इस तरह के ओटीटी मंच युवा मस्तिष्क में विकृत भावनाएं जागृत करते हंै। इसका असर यह होता है कि वे नारी को मात्र भोग की वस्तु समझ कर अपराध करने के लिए प्रेरित होते हैं। न्यायालयों में जिस तरह के यौन शोषण संबंधी आपराधिक प्रकरण आ रहे हैं, उन सभी में एक सामान्य बात है कि अभियुक्त पीडि़त नारी को अपनी शारीरिक क्षुधा को शांत करने की वस्तु समझता है। अतएव ओटीटी जैसे 'मदमस्त हाथी' को नियंत्रित करना अति आवश्यक है। अन्यथा हालात विकट हो जाएंगे।
(लेखक सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं)

विकास गुप्ता
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