आपका हक : ताकि कोई भी नहीं रहे बेघर

- संयुक्त राष्ट्र तथा उसके विभिन्न घटक निकायों ने पर्याप्त आवास के अधिकार को बुनियादी मानवाधिकार के रूप में स्वीकृति प्रदान की है।

By: विकास गुप्ता

Published: 17 Mar 2021, 12:00 PM IST

विभूति भूषण शर्मा

किसी भी व्यक्ति या परिवार का एक महत्त्वपूर्ण सपना होता है कि उसके पास अपना आवास हो। आवास होना व्यक्ति या परिवार की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक सुरक्षा का द्योतक है। संयुक्त राष्ट्र तथा उसके विभिन्न घटक निकायों ने पर्याप्त आवास के अधिकार को बुनियादी मानवाधिकार के रूप में स्वीकृति प्रदान की है। आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र समिति ने भी रेखांकित किया है कि पर्याप्त आवास के अधिकार की व्याख्या करते समय संकीर्णता का भाव नहीं होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि पर्याप्त आवास के अधिकार को मात्र चारदीवारी और एक छत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

गौरतलब है कि भारत ने पर्याप्त आवास के अधिकार के संदर्भ में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके बावजूद देश में करोड़ों लोग अब भी खुले में रात बिताते हैं। पर्याप्त आवास में चार दीवारी और एक छत के अतिरिक्त बिजली एवं पानी की आपूर्ति के साथ स्वच्छता तथा सीवेज प्रबंधन जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी शामिल किया जाता है। भारत में उच्चतम न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत पर्याप्त आवास के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है। गौरतलब है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जनहित याचिका राजेश यादव बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के केस में कहा था कि, संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (इ) के तहत आश्रय का अधिकार मूल अधिकार है। अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार के तहत आवास का अधिकार भी शामिल है। सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि, वह गरीबों को आवास मुहैया कराए। कोर्ट ने कहा कि आवास का अधिकार केवल जीवन का संरक्षण ही नहीं है, बल्कि यह शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं धार्मिक विकास के लिए जरूरी है। आवास सभी मूलभूत सुविधाओं के साथ होना चाहिए। इन सब स्थितियों को देखते हुए आवास के अधिकार को कई अंतरराष्ट्रीय संधियों, भारतीय संविधान व उच्चतम न्यायालय ने अनिवार्य माना है। लोगों को आवास उपलब्ध करवाने के लिए सरकारें भी प्रयास कर रही हैं।

पूर्ववर्ती इंदिरा आवास योजना का पुनर्गठन कर इसे प्रधानमंत्री आवास योजना का नाम दिया गया। इस दिशा में अभी ठोस प्रयासों की जरूरत है। यदि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में हमें आवास असमानता को कम करना है तो इसके लिए एक 'एकीकृत आवासीय विकास' रणनीति अपनाने की आवश्यकता होगी। शासन के विभिन्न स्तरों पर सामाजिक अंकेक्षण के साथ-साथ इस तरह के मिशन को लागू करने के संबंध में जवाबदेही तय की जानी चाहिए। पेयजल आपूर्ति, घरेलू शौचालय, ऊर्जा और जल निकासी से संबंधित अन्य लागतों के अलावा नई आवासीय इकाइयों के पुनर्विकास को ध्यान में रखकर संसाधनों के सही आवंटन की आवश्यकता है।
(लेखक राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता हैं)

विकास गुप्ता
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